सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 408, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ें३९२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड
६--षष्ठ में-राजा का विरोधी हो 1 यह गुरु हो तो अंग में कष्ट पावे । शुक्र नेत्र
रोगी, चन्द्र-रोग युक्त । मंगल-कोप युक्त, बुघ-डरपोक । शनि-मुख में कष्ट । चन्द्र या
सोम्य ग्रह उसे देखे तो अनेक अरिष्ट हो (मा०) सुयं-राजा से विरोध । चंद्र-रोग युक्त ।
मंगल, क्रोधी । बुध-भयभीत, गुरु-अंग में कष्ट । शुक्र-नेत्र रोग, शनि-दुःखी। राहु
बुध-कष्ट । षष्ठ स्थित चन्द्र शुभग्रह से दृष्ट हो तो कुछ भी नहों होता (जा० सं०) शत्रु
को जीते, रोगी, वाल्यावस्था में सर्प या जल का भय ( qo पा० ) 1
७--सप्तम में अष्टमेश-उदर में रोग, दुष्टों से स्नेह, बडा दुष्ट । पाप ग्रह हो तो.
भार्या से द्वेष करने वाला । स्त्री के द्वेष से मृत्यु पाने पाने वाला ( मान० ) गुदा में व्याधि,
दुष्ट कुळ की स्त्री का प्रिय हो, क्रूर ग्रह हो तो स्त्रो से वेर कर्ता, स्त्री के दोष से मरण
( जा० सं० ) दो पत्नी हो । यदि पापयुक्त हो तो व्यापार में हानि ( वृ० पा० ) 1
८--अष्टम में-व्यवसाय करने वाला, रोगों से रहित, निरोग, कपट विद्या जानने
वाला, कपटो कुछ में जन्म, प्रसिद्ध ( मान० ) 1 व्यसनी, व्याधि हीन, रोग होन, कपट
कला से युक्त, कपट कुल में विख्यात (जा० सं०).। दीर्घायु, यंदि अष्टमेश निबेल. हो तो
मध्यमायु, चोर, स्वयं मिंदनोय 2\र पर निंदक (qo पा०) 1
९--नवम में-दुष्ट संग रहित, जीव हिसक,-पापो, _बन्बु रहित, स्नेह रहित, शत्रु
पक्ष में पुजनोय, मुख में व्यंग ( झांईं ) ( मान०) । संग हीन, जीव घाती, पापी बन्धु
होन, स्नेह रहित, पुज्य के सेवन में विमुख । सुख में-अंग होन . ( व्यंग ) ( जा० सं&) ।
घर्म निदक, नास्तिक, दुःशीला स्त्री वाला, परघन हर्ता (व.० पा०) ।
१०--इश्षम में-राजा के कर्म करनेवाला, नोच कमंकर्ता । क्रूर ग्रह हो तो आलसी
पुत्र तथा माता न जीवे ( मान० ) राज कमे करने वाला, नोच कर्म में युक्त, आलसी
क्रूर, अन्य पुरुष से उत्पन्न, पुत्र वानू, उसको माता नहीं जीती ( जा० qo ) । पिता
के सुख से होन, यदि शुभग्रह से य॒त्र व दृष्ट न हा तो चुगल खोर और कमं हीन होता है (वृ पा० ) ।
११--छाम में-बालपन में दुःखो पश्चात् सुखो, दीर्घायु । पापग्रह हो तो अल्पायु
( जा० सं० ) ( मान० ) । पापयुक्त हो तो.धन हीन, बाल्यावस्था में दुःखी पीछे सुखी ।
शुभग्रह हो तो दीर्घायु । ( qo पा० ) ।
१२--व्यय में-क्रर वाक्य कहने .वाला, चोर, शठ, निर्दय, सर्वत्र स्वतन्त्र रहने
वाला, भंग होन, काक गोघ आदि का भक्षो ( मान० ) क्रूर, चोर, व नोच, अत्मज्ञान
से हीन, अंग हीन शरोर, काक आदि पक्षियों से भक्षण करने योग्य (जा० सं०) | कुकाय
में खच 1 पाप युक्त हो तो अल्पायु (वृ०-पा०) ।
८--अष्टमेश का विशेष फल
(१) दोर्घायु चिता रहित--अष्टमेश केन्द्र छोड़ कर ओर किसी स्थान में हा ओर
बल हीन भो हो जो लग्नेश के बळ से वळ में कम हातो दोर्घायु, चिता रहित, विष्त
ओर क्लेश रहित हो (फल०) ।