भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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भावेश का भिन्न-भिन्न भावों Š फल : ३९ १

११--लाम में सप्तमेश-स्त्री पति भक्ता, रूपवती, सुशक्ति, दुर्वलांग, (मान०) ।

डळ द व्य ज्पवती, शुभ शक्ति युक्त विवाहिता स्त्री हो, वह स्त्री सस्तान उत्पन्न हे वे i अधिक कन्या Ce पावे (जा० सं०) । स्त्री के द्वारा धनलाभ, पुत्र सुख अल्प,

१२--ज्यय. में सप्तमेश-कुटुम्व के काम काज में लगा रहे । स्त्री बडो, नवीन,

चंचल, दुष्टों के साथ रहने वालो, पति को छोड़कर हर जगह रहने वाली वेश्या सदृश

(मान०).। चंचल पुरुष को स्त्री, गृह बन्धनों से हीन चंचल तथा दुष्ट ( जा० सं० ) 1

a m. उसकी स्त्री बहुत खच करने वाली होतो है, वस्त्र के व्यापार से लाभ qo सं०..) । प

(७) सप्तमेश का विशेष फल

१--स्षी सत गुणो-सप्तमेश बली हो मौर सप्तम घर का सम्बन्ध शुभ गृह से

हो चाहे शुभ युक्त या दृष्ट से हो तो उसकी स्त्री सतगुणी होतो है। पति के साथ

आनन्द पूर्वक रहेगी । सन्तान होंगे और वह अच्छे गुण वाली होगी (फल०) ।

२--स्त्रो रोगिणी-सप्तमेश ६-८-१२ स्थान में हो और अपने घर का न हो तो

स्त्री रोगिणी हो । यदि सप्तमेश उच्च घरों का हो तो यह फल नहीं होता हैं 1

८--अष्टमेश का भिन्न-भिन्न भावों में फल

१--छरन में अष्टमेश-प्रत्येक कायं में विघ्न, बहुत काल तक रोगो, चोर निदनीय

कार्य, किसी राजा की आज्ञा से लक्ष्मो प्राप्त ( मान० ) बहुत से विष्नों से युक्त, दोघं

रोगी, चोर, इष्टानुवाद में युक्त, राजा के संग से लक्ष्मी प्राप्त ( qo पा० ) ।

२--घन में अष्टमेश-कऋर ग्रह हो तो-थोड़े दिन तक जीने वाला, शत्रुओं से युक्त,

चोर, शुम ग्रह हो अति शुम कारक होता है परन्तु किसी राजा द्वारा मृत्य पावे (मा०) ।

पाप ग्रह-धन लाभ न हो चोर होवे, शुभग्रहू-शुभ फल, अत में राजा के प्रकोप से मरण

( जा० सं० ) भुज बल से हानि, थोड़ा घन वाळा उसका जो कुछ नष्ट होता है वह

मिलता नहीं ( qo पा० )।

३--तृतीय में-बन्धु विरोधी, सुहृदजनों का विरोधी, अंगहीन, दुर्वाक्य कहने वाला,

बड़ा चंचल, सहोदर भाई से रहित ( मान० ) बन्धुजनो के विरोध से मित्रजनों से

बिरोध करता है, अंगहीन, दुर्बल, चंचल, सहोदर भ्राता से वंचित ( जा० सं० ) भाइयों के सुख से होन, नोकर और बल से हीन ( qo पा० )।

४--चतुर्थ में-पिता का वैरी, पिता से घन पाने वाला, पिता से लड़ने वाला

पिता रोगी ( मान० ) पिता से अन्याय पूर्वक पिता की लक्ष्मी को प्राप्त करता है,

पिता पुत्र दोनों का परस्पर युद्ध, पिता रोगी ( जा० सं० ) माता से होन, घर जमोन

रा रहित, मित्र द्रोही (qo पा०) ।

५--पंचम मे-क्र्रग्रह-पुत्र रहित । शुभग्रह हो तो शुभ फल । जातक अधिक नहों

जीता शांति आदि कराने से जीवे, कपट कर्म में तत्पर (मान०) । क्र्र-पुत्र हीन, शुभ

अह हो तो पुत्र युक्त होता है। प्रथम तो उत्पन्न होकर पुत्र जोता नहीं यदि जिये तो

कपटी हो (जा० सं०) मूर्खं, थोड़े पुत्र वाला, दीर्घायु घनी ( qo पा० ) । i

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