भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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३९० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

३--सहज में सप्तमेश-स्वबल युक्त, बन्धु स्नेहो, बडा दुःखी । पापग्रह हो तो स्त्री

देवर के साथ रहे, वह स्त्री रूपवती और मित्रो के घर रहने वाली होती है (मान०) ।

पुत्र बत्सल तथा दुःखी । क्रूर ग्रह हो तो स्त्रो रूपवती होकर देवर से भोग करती है

(ब्‌? पा०) ।

४--सुख में सप्तमेश-चंचल स्वभाव) पितृ वरी, उसका पिता भो खोटे वाक्य

कहे । उसकी भार्या का पालन पोषण ।पता करता हैँ अर्थात्‌ मायके में जाकर जीवन

निर्वाह करे (मान०) । चंचल, पिता से बैर कर्ता, स्नेह युक्त, पिता खोटे वचन कहने

वाला, पिता उसक्ष्त्री का पालन करता है (जा० सं०) । उसकी स्त्री वश् में नहीं रहती,

स्वयं वह सत्यवादी, वुद्धिमान्‌ धर्मात्मा और दन्त रोगो (वृ० पा०) ।

५--पंचम में सप्तमेश-सौभाग्य युक्त, पुत्रवान्‌, साहसप्रिय, दुष्ट बुद्धि, उस की

स्त्री को पुत्र पालन करता है (मान०) । सौभाग्य युक्त, पौत्रवान्‌, प्रिय साहस, दुष्ट

बुद्धि, उसका पुत्र उसको स्त्रो का पालन करता है (जा० सं०) । मानी, सब गुणों से

युक्त, सदा हर्षित, सब धन से युक्त (वृ० पा०) ।

६--षष्ठ मे सप्तमेश-स्त्रो से वेर करने वाला, स्त्रो रोगिणी । पाप गुहू--स्त्री के

साथ अधिक संभोग करने से क्षय रोग, शीघ्र मृत्यु (मान०) । स्त्री के साथ वर, रोगिणी

स्त्री, स्त्री के संग से क्षय रोग, पाप गृह हो तो, उसे मृत्यु के आश्रय करता है (जा०,,

सं०) । रोगणी स्त्रियाँ, स्त्री से शत्रुता, स्वयं क्रोधी ओर सुखहीन (qo पा०) १ अ

७--सप्तम में सप्तमेश-दोर्घायु, सब के साथ प्रीति, अच्छा स्वभाव, तेजस्वी

(मान०) । दीर्घायु, प्रसन्नचित्त, कृपा युक्त, स्नेही, निर्मल शोल, तेजस्वी (जा० सं०) ।

स्त्री सुख से युक्त, धीर, चतुर, बुद्धिमान्‌, वात रोगी (qo पा०) ।

८--अष्टम में सप्तमेश-वेद्या गामी, विवाह स रहित, नित्य चिन्तायुक्त, दुःखी

(मान०) । वेश्या से भोग, अपनी स्त्री से प्रेम वर्जित, विदुषी द्वितीय स्त्री में आसक्त,

स्त्री को सेवा नहीं करने वाला (जा० सं०) । स्त्रो सुरत से होन, स्त्री रोग युक्त, दुष्टा

मोर वश्च में नहीं रहने वाली (qo पा०) ।

९--नवम में सप्तमेश-बड़ा तेजस्वी, शोलवान्‌, स्त्री सुशीला तेज युक्त । क्रूर गृह

हो तो नपुंसक या कुरूप 1 यदि लग्नेश देखे तो नीति शास्त्र में प्रवीण (मान०) 1 तेजस्वी,

शिल्प (कारीगरो) युक्त उसको स्त्री भी उसो प्रकार की होती ६ । क्रूर गत हो तो,

स्त्री खण्ड रूप वाली होतो है । लग्नेश से दृष्ट हो तो तप से अधिक बल पाता है

(जा० सं०) । अनेक स्त्री से संग, स्त्री में आसक्त, बहुत कायं आरम्म करने वाला

(वृ० पा०) । :

१०-“दशम में सप्तमेश-राजा से दोष युक्त, अति कामी, कपटो, । क्रूर गृह हो

तो, अति दुःखी और शत्रु के आघीन (मान०) । राज रोग वाला, व्यभिचारो, लंपट,

क्रूर । यदि पाप गृह हो, इवसुर बडा दुष्ट और विदिशाओ में विख्यात होता है । (जा०

सं०) । स्त्री वश में नहीं होती । स्वयं धर्मात्मा और घन शत्रु से युक्त (q o पा०) 1