सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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भावेश का भिन्न-भिन्न भावों में फल : ३८९
हठी मंगल हो तो कंठ में, बुघ-नाभि, | गुरु-नाक, शुक्र- शुक्र-नेत्र, शनि-ओर — ` में ब्रण
८--मुख में ब्रण-छन्नेश मंगल की राशि १-८ में या बुध की राशि ३-६ में या
किसी भाव में बुघ से दृष्ट हो तो मुख में qa हों (qo पा०) 1
९--ब्रण-अष्ठेश पापयुक्त लग्न या अष्टम में हो तो व्रण करे (जा० सं०)। ऐसा
योग माता पिता पुत्र आदि की उनके सम्बन्धी भाव से विचारना जैसे चतुर्थश पापयुक्त
रूरन या अष्टम में हो तो माता के शरीर में व्रण हों (जा० सं०) ।
१०--व्रण स्थान-पापयुक्त लग्न या अष्ठम में षष्ठेश सूर्य हो-शिँर में, चन्द्र-मुख,
मंगल-गछा, बुघ- हृदय, गुरु-कटि, शुक्र-नेत्र, शनि-प्रांव, राहु या केतु हो तो-ओठों में
स्रण हो (जा० सं०) ।
११--शत्रु भय-पष्ठेश शुभ युक्त या दृष्ट हो तो शत्रु मय हो, अन्य प्रकार से हो
तो शत्रु भय न हो (जा० सं०) ।
१२- शत्रु से रोग-षप्ठेश उच्च राशिगत या विषम राशि में होकर पष्ठ में हो
तो शत्रु से भी गूढ़ रोग होता है (जा० सं०) 1
१३-- हृदय में रोग-षष्ठेश सूर्य के नवांश में हो ।
१४--गुप्त रोग-पष्ठेश वृरिचिक या कर्क के नवांश में हो मंगल से दृष्ट हो तो गुप्त
रोग से अंग पोड़ा ।
१५--पवन और रुघिर विकार-षष्ठेश वृष्चिक या ककं के नवांश में शनि से दृष्ट
` हो तो पवन ओर रुधिर विकार से पीडा हो 1
१६--पष्ठेश भिन्न भिन्न ग्रहों के साथ रहने का फल-षष्ठेश चंद्रमा मंगल से
युक्त-शस्त्र प्रहार, अग्नि रोग, दाह से संतप्त देह । शनि से युक्त-पवन, पत्यर चोपायों
से चोट । मंगल से युक्त-रुधिर और शस्त्र प्रहार से संतप्त देह, देशाटन करने में राजदर्शन करने में युक्त करता है, भूख से संतप्त, पत्थर, पक्षी तथा पवन इनसे प्रहार । बुघ
से युक्त दृष्ट-गिरने व लोह प्रहार से विदीणं अंग वाला, जीते हुए शत्रु वाला । शुक्र गुर
युवत-विख्यात, शत्र, के वर के भय से युक्त, स्वस्थ देह (जा० सं०) ।
७--सप्तमेश का भिन्न-भिन्न भाव में फल
१--लग्न में सप्तमेश--पर स्त्री से प्रीत न करे, अनेक भोग भोगे, रूपवान्, अपनी
स्त्री में मन (मान०) । अति तुच्छ तथा स्नेह रहित, अन्य स्त्री से युक्त, भोगी, रूपवान्
तथा अच्छी पत्नी से युक्त और जनों के प्रति चंचल चित्त (ste सं०) पर स्त्री गामी,
दुष्ट, चतुर, अधीर, वात रोगी (बु० पा०) ।
q— म सप्तमेश-दुष्ट भार्या, पुत्रों की इच्छा करने वालो, स्तरो के द्वारा घन
प्राप्त, स्वतः भी स्त्री के संग से होन होकर रहता है (मान०) । स्त्री अति दुष्ट ओर पुत्र
हीन, स्त्री के हाथ उसका घन उसे निरन्तर दुखानुषंगी करता है (जा० सं०) । बहुत
पत्नी वाला, स्त्री द्वारा घन लाभ, दीर्घसूत्री (a° पा०) 1