भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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३८८ ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

पत्थर और लकड़ी बेचने वाला, व्यापार में कहीं हानि कहीं वृद्धि भो होती है

(ge पा०) ।

१०-दशम में षष्ठेश-क्र्र ग्रह-माता से वेर करे, दुष्ट स्वभाव, धर्म और पुत्र के

  • पालने में बुद्धि, माता के दोष से उसका बैरी वना रहता है । (मान०) ।

पाप ग्रह--अति दुष्ट, माता से वेर करे, घमं और पुत्र को पालन करने में बुद्धि,

मातु द्वेषो (जा० सं०) ।

कुछ में श्रेष्ठ, पिता का अभक्त, वक्ता और विदेश जाने में सुखो (qo पा०) ।

११--छाभ में पष्ठेश-करर ग्रह शत्रु के द्वारा मृत्यु, सबका वेरो, चोरों के द्वारा

हानि, घोड़ा भेस आदि चतुष्पद के निमित्त से लाभ (मान०) ।

पाप ग्रह-शत्रु से मरण, चोर द्वारा हानि, चौपाये से लाभ (जा० सं०) ।

शत्रु से घन पाने वाला, गुणी, साहसी, मानो, कितु पुत्र सुख से रहित (वृ० पा०) ।

१२--व्यय में षष्ठेश-व्यापार में द्रव्य हानि, विदेश आदि में जाने से घन को हानि,

भाग्य से होता है ऐसा मानने वाला (मान०) ।

चौपाये, घन धान्य से युवत, चपल भौर लक्ष्मो से मदान्ध, लक्ष्मो के आनन्द से

युक्त (जा० सं०) ।

व्यसन में खर्च करने वाला, विद्वानों का द्वेपी, जोव हिंसक (qo पा०) 1

षष्ठेश का विशेष फल 2

१--शत्र से पीड़ा--षष्ठेश केन्द्र में पापयुक्त या दृष्ट हो तो शत्रु से लगातार बड़ी

पोड़ा हो जिसका वह सरलता पूर्वक परिहार न कर सके (फल०) ।

२--श त्रुनाश-षष्ठेश दुःस्थान में हो और नीच में या शत्रुगृही या अस्त भी हो,

और यदि लग्नेश बली हो और यदि सुर्य नवम घर में हो तो शत्रु का नाश हो (फळ०)

३--निरोग सुखी-षष्ठेश से लग्नेश बली हो और शुभग्रह की राशि या अंश में

हो शुभ दृष्टि भी हो ओर यदि चतुर्थेश बली होकर केन्द्र या कोण में हो तो निरोग 8

शरीर हो सब सुख व आराम भोगे (फ&०) ।

४- जातक वी शुभता बढ़े-(१) जिस भाव का स्वामी पष्ठेश युक्त हो (२) षष्ठेश

से जो भावयुक्त हो । (३) षष्ठ भाव में जो ग्रह है उसका स्वस्थान हो । ये भाव जातक

की शुभता को बढ़ावेंगे (फल०) ।

५--दौर्घायु-षष्ठेश ६ या १२ स्थान में हो। व्ययेश ६ या १२ स्थान में हो या लग्न या अष्टम स्थान में हो ।

६--व्रण-षष्ठेश, ६, १ या ८ भाव में हो तो शरीर में व्रण कारक हो (वृ० पा०) | षष्ठ भाव में जो राशि हो उस राशि के आधित अंग में विशेषकर व्रण होंगे (वृ० पा) । इसो प्रकार पिता आदि (१० स्थानादि) भावो के स्वामी पष्ठेश से युक्‍त हां ६-८ भाव में हों तो पिता आदि को भो व्रण हो (वृ पा०) 1

७--ज़ण स्थान--षष्ठेश से युक्त होकर उक्त स्थान में यदि चन्द्र हो तो-मुख में,