सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 403, कुल 418 में से
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भावेश का भिन्न-भिन्न भावों में फल : ३८७
बिकास कर्ते की बुद्धि वाला, ग्राम जन का अति कष्ट दायक नगर दाख की खान होता
है नाभि में दृढ रोग (जा० सं०) क्रोघो, बठहोन, भाई का नु, क्रूर नोकर वाला
(go पा०) ।
४--चतुर्थ में-पुत्र पिता में परस्पर वेमनस्य, पिता रोगी, वह और उसके लड़के बहुत
समय तक लक्ष्मी को प्राप्त (मान>) । पिता पुत्र में परस्पर वैर, संकर जाति का पुत्र
होकर बहुत कालीन पिता की लक्ष्मी को प्राप्त करता है (जा० सं०) । मातु सुख से हीन
मनमाना काम करने वाला, चुगुक खोर, द्वेषो, चंचल, अधिक घनवान् (go पा०) ।
५--पंचम में-क्रर हो तो पिता पुत्र में वेर, अपने पुत्र के कारण मरण पाने वाला,
शुभ हो तो निर्धन, पदवी पाकर दुष्ट स्वमाव, कपटी (मान०) । पापग्रह हो तो-पिता-
पुत्र में वैर बुद्धि, शुभग्रह हो-निर्धन, षदवी द्वारा दुष्ट होता है । (जा० सं०) । घन
आदि स्थिर नहीं रहता, पुत्रादि से शत्रुता, स्वयं सुखी, स्वार्थी, दयालु (वृ० पा०) ।
६--षष्ठ में-रोग रहित, बहुतों से वैर, सुखी, बड़ा कृपण, जन्म से सुख युक्त,
कुस्थान बासी (मान०) । ॥
रोग होन, कर्ता, सुखी, कृपण, दुःखी नहीं होता, अ पने स्थान में बास, सहोदर ç
विरोध अन्यजनों के साथ शुभ, मित्र जोर वाहन की वृद्धि, नीच जनों की वृद्धि (जा०
सं०) । रोगी व वेरी से युक्त न होकर सुखी व कृपण होगा (जा० लं०) ।
अपने गोत्रियों से शत्रुता, दूमरों से मैत्रो, घन आदि जन्य मध्यम सुख (वृ० पा०) ।
७--सप्तम में षष्ठेश-विरोघ करने वाली, क्रोधी, संताप हारी स्त्री मिले यदि क्रूर
ग्रह हो । शुभ हो तो स्त्री बंध्या या गर्भपात कराने में प्रवृत्त (मान०) ।
शुभ ग्रह हो तो स्त्रो बंच्या गर्भ गिराने में तत्पर, पाप ग्रह हो तो स्त्री विरोध करने
चाली बड़ी प्रचंड, संताप हरने वाली हो (जा० सं०) 1
स्त्री सुख से रहित, यशस्वी, गुणी, मानी, साहसी, घनी हो (go पा०) 1
८--अष्टम में-संग्रहणी रोगी । ग्रह के अनुसार, षष्ठेश सूर्य-सिह से, चन्द्र-तत्काल
मृत्यु, मंगल-सपं से, बुच्र-विष दोष से, गुरुबुद्धि की खराबी या पागलपन से, शुक्र
नेत्र रोग से मृत्यु हो (मान०) । 3
पष्ठेश मंगल हो तो सपं से स्त्री की मृत्यु, बुध हो तो विष से स्त्री की मृत्यु, चद्र
व सूर्य--राजा व सिंह से, गुरु घ शुक्र गान पीड़ा या नेत्र से, शनि हो तो संग्रहणी
रोग व वात रोग से स्त्री का मरण (जा० सं०) ।
बहुत मेहरती, व्याधि रहित सुखी (जा० लं०) । रोगी पंडितों का शत्रु, दूसरे के
घन का लोभी, परस्त्री गामो तथा अशुचि (वृ० पा०)।
९--नवम में-क्रूर, लंगडा, भाई बंधु से विरोध करे, शास्त्र को नहीं माने, भिक्षुक
(मान०) ।
वाप ग्रहृ हो तो-भ्रष्ट हो, देव विरोधी और क्रूर होकर याचक और गुरु को मानता
है । काष्ठ शिला आदि बेचने वाला व्यापार में कहीं हानि कहीं वृद्धि (जा० सं०) ।