भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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प्राक्कथन

फलित ज्योतिष में ग्रहों का फल विचारने के लिये ग्रहस्पष्ट, भावस्पष्ट, ग्रहवल, स्थिति आदि जानकर ग्रहों के गुण धर्म दृष्टि स्थान आदि अनेक बातों पर पूर्ण रूप से विचार कर, ग्रहों की स्थिति आदि द्वारा बनने वाले अनेक योगों पर ध्यान देकर, देश काल अवस्था आदि पर ध्यान रखते हुए फल कहना चाहिये। परन्तु उसके लिये भी अनुभव की नितांत आवश्यकता है। अनेक कुण्डलियों का अध्ययन करते-करते अनुभव बढ़ता है, अनुभव बढ़ने से ही ज्ञान की बुद्धि होकर फलित कथन करने की योग्यता बढ़ती है। जैसे नया डाक्टर या वकील डाक्टरों या वकीली पासकर लेने पर एकदम अपने पेशे की पूर्ण योग्यता नहीं प्राप्त कर लेता। जैसे-जैसे उसका अनुभव बढ़ता जाता है वैसे-वैसे योग्यता भी बढ़ती जाती है। अनुभवों डाक्टर या वकील कठिन से कठिन परिस्थितियों में रोग या मामले को पूर्ण रूप से समझ लेता है और अपने कार्य में सफलता प्राप्त करता है। इस कारण सदा पूर्ण अध्ययन द्वारा अनुभव बढ़ाने की आवश्यकता है।

फल कभी-कभी सत्य क्यों नहीं उतरता, इसका कारण अल्पज्ञता और फल कथन करने में उसकी पूर्ण परिस्थितियों पर विचार का अभाव या किसी सूक्ष्म का अभाव रहता है। जैसे-जैसे अनुभव बढ़ता जायेगा त्यो-त्यो फल-कथन की योग्यता बढ़ती जायेगी।

ज्योतिष शास्त्र केवल किसी फल की ओर संकेत करता है। परन्तु उक्त संकेत पाकर वहाँ अपनी बुद्धि से विचारना पड़ता है कि वास्तविक क्या बात हो सकती है। जैसे कहीं घुआँ देखकर अग्नि का अनुमान होता है, वह वास्तव में क्या है अग्नि की भाष है या कुहरा मात्र है, बुद्धि से ही विचारना पड़ता है। इसके लिये अनुभव के अतिरिक्त सूक्ष्म अंतर्ज्ञान (Institution) या दृष्टि की आवश्यकता है। एकाग्र चित्त से कुंडली द्वारा प्राप्त संकेत को आधार मानकर उसके भिन्न-भिन्न विषयों पर शांति पूर्वक विचार करने से आत्मशक्ति जागृत होकर अंतर्ज्ञान उत्पन्न होता है। इसके लिये साहित्यिक मनोवृत्ति, धर्मनिष्ठता और ईश्वर पर पूर्ण विश्वास होना आवश्यक है जिससे इच्छा शक्ति प्रबल होकर निश्चय पूर्वक विचारने की शक्ति उत्पन्न होती है।

कोई ऐसी शंका करने लगते हैं कि जब ऐसा फल होना ही है तो क्यों प्रयत्न करे क्यों हाथ पैर चलावे। इसके लिये यह ध्यान रखना चाहिये कि बिना पुरुषार्थ