भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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( ख )

किये दैव भी फल नहीं देता। जैसे खेती आदि का कर्म न करोगे तो फल कहीं से प्राप्त होगा। इस जन्म के ऐसे कर्म को ही पुष्पार्थ कहते हैं और पूर्व जन्म में जो कर्म किये हैं वही दैव अर्थात् माय है। दैव और पुष्पार्थ ही इस शरीर रूपी गाड़ी के दो पहिये हैं। जिस प्रकार बिना एक दूसरे के परस्पर सहयोग से गाड़ी नहीं चल सकती, इसी प्रकार जीवन का पूर्व संचित कर्म जिसे दैव कहेंगे उसके फलित होने को पुष्पार्थ की आवश्यकता है। पुष्पार्थ मुख्य है। माय के अनुसार पुष्पार्थ फलीभूत होता है। पूर्व जन्म में जो शुभाशुभ कर्म किये हैं उनका फल कर्मानुसार इस जन्म में मिलता है। वह फल ग्रहों की स्थिति पर विचारने से ऐसा प्रगट हो जाता है जैसे अंधकार में दीपक का प्रकाश। ये पूर्व जन्म के कर्म दो प्रकार के होते हैं ( १ ) दृढ़ कर्म ( २ ) अदृढ़ कर्म। दृढ़ कर्म—का प्रभाव अधिक रहता है। जप दान आदि करने पर भी जिसका प्रभाव अधिकतर नहीं घटता। अदृढ़ कर्म—जप दान पूजन आदि कर्म द्वारा शांति कराने से इसका बुरा प्रभाव निवारण हो जाता है। इसी कारण जब कुण्डली में अरिष्ट समय का बोध हो तब उस समय जप दान आदि द्वारा शांति कराने से कष्ट का निवारण हो जाता है और जब शुभ समय प्रगट हो तब शुभ कार्य करने से कार्य में सफलता होती है। दृढ़ कर्माधारित जो दशाफल है उस समय दशा शुभ जान कर शुभ कर्म करता चाहिये। अशुभ समय जान कर शुभ कर्म नहीं करता। जो अदृढ़ कर्माधारित है उनको अष्टक वर्ग गोचर फल वतलाता है। अशुभ समय जानकर शुभ कर्मों के करने से पूर्व जन्म के बुरे प्रभाव कुछ कम हो जाते हैं या मिट जाते हैं, जैसे छाता लगाने से तेज घूष का प्रभाव कम हो जाता है या मिट जाता है।

फलित में कुछ लोग अविश्वास करते हैं। विचारणीय बात यह है कि फलित में कुछ भी सत्यता नहीं होती तो इस विद्या का अधिक प्रचार न होता और प्रभाव घट जाता। परन्तु सत्यक्ष देखने में आता है कि इसका प्रभाव बढ़ ही रहा है जिससे लोगों की रुचि इस विद्या के अध्ययन की ओर बढ़ रही है। विदेश में भी इसका अधिक प्रचार हो रहा है।

आज कल केवल एक दो पुस्तकें पढ़ कर लोग ज्योतिषी बन जाते हैं उनकी क्या योग्यता हो सकती है? डाक्टरों विद्या पढ़ने को कितने वर्ष अंग्रेजी पढ़ कर फिर वर्षों डाक्टरी पढ़ कर एवं प्रत्यक्ष क्रिया द्वारा अनुभव प्राप्त कर डाक्टर बनता है तब भी वह अधूरा ही रहता है। जब वह कई वर्षों तक प्रेक्टिस द्वारा अनुभव बढ़ा लेता है तब वास्तविक डाक्टरी करने की योग्यता पा सकता है। इसी प्रकार ज्योतिष विद्या का वर्षों तक पूरा अध्ययन एवं अनुभाग प्राप्त किया जाय तब उसे उचित फल कथन की योग्यता आ सकती है तब एकाग्रचित्त से आत्मविभोर होकर चेतना की परिधि में उपस्थित समस्या से सम्बन्धित प्रत्येक फल के निर्णय करने योग्य मानसिक अवस्था आने पर पूर्व अनुभव द्वारा संगृहीत उपयुक्त सामग्री के आधार पर योग्यता