भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

प्राक्कथन

फलित ज्योतिष में ग्रहों का फल विचारने के लिये ग्रहस्पष्ट, भावस्पष्ट, ग्रहवल, स्थिति आदि जानकर ग्रहों के गुण धर्म दृष्टि स्थान आदि अनेक बातों पर पूर्ण रूप से विचार कर, ग्रहों की स्थिति आदि द्वारा बनने वाले अनेक योगों पर ध्यान देकर, देश काल अवस्था आदि पर ध्यान रखते हुए फल कहना चाहिये। परन्तु उसके लिये भी अनुभव की नितांत आवश्यकता है। अनेक कुण्डलियों का अध्ययन करते-करते अनुभव बढ़ता है, अनुभव बढ़ने से ही ज्ञान की बुद्धि होकर फलित कथन करने की योग्यता बढ़ती है। जैसे नया डाक्टर या वकील डाक्टरों या वकीली पासकर लेने पर एकदम अपने पेशे की पूर्ण योग्यता नहीं प्राप्त कर लेता। जैसे-जैसे उसका अनुभव बढ़ता जाता है वैसे-वैसे योग्यता भी बढ़ती जाती है। अनुभवों डाक्टर या वकील कठिन से कठिन परिस्थितियों में रोग या मामले को पूर्ण रूप से समझ लेता है और अपने कार्य में सफलता प्राप्त करता है। इस कारण सदा पूर्ण अध्ययन द्वारा अनुभव बढ़ाने की आवश्यकता है।

फल कभी-कभी सत्य क्यों नहीं उतरता, इसका कारण अल्पज्ञता और फल कथन करने में उसकी पूर्ण परिस्थितियों पर विचार का अभाव या किसी सूक्ष्म का अभाव रहता है। जैसे-जैसे अनुभव बढ़ता जायेगा त्यो-त्यो फल-कथन की योग्यता बढ़ती जायेगी।

ज्योतिष शास्त्र केवल किसी फल की ओर संकेत करता है। परन्तु उक्त संकेत पाकर वहाँ अपनी बुद्धि से विचारना पड़ता है कि वास्तविक क्या बात हो सकती है। जैसे कहीं घुआँ देखकर अग्नि का अनुमान होता है, वह वास्तव में क्या है अग्नि की भाष है या कुहरा मात्र है, बुद्धि से ही विचारना पड़ता है। इसके लिये अनुभव के अतिरिक्त सूक्ष्म अंतर्ज्ञान (Institution) या दृष्टि की आवश्यकता है। एकाग्र चित्त से कुंडली द्वारा प्राप्त संकेत को आधार मानकर उसके भिन्न-भिन्न विषयों पर शांति पूर्वक विचार करने से आत्मशक्ति जागृत होकर अंतर्ज्ञान उत्पन्न होता है। इसके लिये साहित्यिक मनोवृत्ति, धर्मनिष्ठता और ईश्वर पर पूर्ण विश्वास होना आवश्यक है जिससे इच्छा शक्ति प्रबल होकर निश्चय पूर्वक विचारने की शक्ति उत्पन्न होती है।

कोई ऐसी शंका करने लगते हैं कि जब ऐसा फल होना ही है तो क्यों प्रयत्न करे क्यों हाथ पैर चलावे। इसके लिये यह ध्यान रखना चाहिये कि बिना पुरुषार्थ

( ख )

किये दैव भी फल नहीं देता। जैसे खेती आदि का कर्म न करोगे तो फल कहीं से प्राप्त होगा। इस जन्म के ऐसे कर्म को ही पुष्पार्थ कहते हैं और पूर्व जन्म में जो कर्म किये हैं वही दैव अर्थात् माय है। दैव और पुष्पार्थ ही इस शरीर रूपी गाड़ी के दो पहिये हैं। जिस प्रकार बिना एक दूसरे के परस्पर सहयोग से गाड़ी नहीं चल सकती, इसी प्रकार जीवन का पूर्व संचित कर्म जिसे दैव कहेंगे उसके फलित होने को पुष्पार्थ की आवश्यकता है। पुष्पार्थ मुख्य है। माय के अनुसार पुष्पार्थ फलीभूत होता है। पूर्व जन्म में जो शुभाशुभ कर्म किये हैं उनका फल कर्मानुसार इस जन्म में मिलता है। वह फल ग्रहों की स्थिति पर विचारने से ऐसा प्रगट हो जाता है जैसे अंधकार में दीपक का प्रकाश। ये पूर्व जन्म के कर्म दो प्रकार के होते हैं ( १ ) दृढ़ कर्म ( २ ) अदृढ़ कर्म। दृढ़ कर्म—का प्रभाव अधिक रहता है। जप दान आदि करने पर भी जिसका प्रभाव अधिकतर नहीं घटता। अदृढ़ कर्म—जप दान पूजन आदि कर्म द्वारा शांति कराने से इसका बुरा प्रभाव निवारण हो जाता है। इसी कारण जब कुण्डली में अरिष्ट समय का बोध हो तब उस समय जप दान आदि द्वारा शांति कराने से कष्ट का निवारण हो जाता है और जब शुभ समय प्रगट हो तब शुभ कार्य करने से कार्य में सफलता होती है। दृढ़ कर्माधारित जो दशाफल है उस समय दशा शुभ जान कर शुभ कर्म करता चाहिये। अशुभ समय जान कर शुभ कर्म नहीं करता। जो अदृढ़ कर्माधारित है उनको अष्टक वर्ग गोचर फल वतलाता है। अशुभ समय जानकर शुभ कर्मों के करने से पूर्व जन्म के बुरे प्रभाव कुछ कम हो जाते हैं या मिट जाते हैं, जैसे छाता लगाने से तेज घूष का प्रभाव कम हो जाता है या मिट जाता है।

फलित में कुछ लोग अविश्वास करते हैं। विचारणीय बात यह है कि फलित में कुछ भी सत्यता नहीं होती तो इस विद्या का अधिक प्रचार न होता और प्रभाव घट जाता। परन्तु सत्यक्ष देखने में आता है कि इसका प्रभाव बढ़ ही रहा है जिससे लोगों की रुचि इस विद्या के अध्ययन की ओर बढ़ रही है। विदेश में भी इसका अधिक प्रचार हो रहा है।

आज कल केवल एक दो पुस्तकें पढ़ कर लोग ज्योतिषी बन जाते हैं उनकी क्या योग्यता हो सकती है? डाक्टरों विद्या पढ़ने को कितने वर्ष अंग्रेजी पढ़ कर फिर वर्षों डाक्टरी पढ़ कर एवं प्रत्यक्ष क्रिया द्वारा अनुभव प्राप्त कर डाक्टर बनता है तब भी वह अधूरा ही रहता है। जब वह कई वर्षों तक प्रेक्टिस द्वारा अनुभव बढ़ा लेता है तब वास्तविक डाक्टरी करने की योग्यता पा सकता है। इसी प्रकार ज्योतिष विद्या का वर्षों तक पूरा अध्ययन एवं अनुभाग प्राप्त किया जाय तब उसे उचित फल कथन की योग्यता आ सकती है तब एकाग्रचित्त से आत्मविभोर होकर चेतना की परिधि में उपस्थित समस्या से सम्बन्धित प्रत्येक फल के निर्णय करने योग्य मानसिक अवस्था आने पर पूर्व अनुभव द्वारा संगृहीत उपयुक्त सामग्री के आधार पर योग्यता

(ग )

पूवंक फळ कथन कर सकता है । डाक्टर तो यंत्रों द्वारा बहुत कुछ शरीर के रोगों का निदान कर लेता है परन्तु ज्योतिषी को तो केवल अनुमान से हो. काम लेना पड़ता है ।

इससे प्रगट होगा कि ज्योतिष कितनो कठिन विद्या है जिसके लिये निरंतर अभ्यास की

आवश्यकता है। परन्तु यह एक जनप्रिय एवं मनउल्लास विद्या भो है । जिसके कारण

यह जनता के आकर्षण का विषय बनो हुई है । जब कोई कुण्डली या वर्षफल बनवाते

हैं और उसकी अधिकांश बातें सत्य निकलती हैं वव इस विद्या पर लोगों का विश्वास

बढ़ कर इसके अव्ययन की ओर रुचि बढती है । और इसके अध्ययन में आनंद आता

हे और जब फल ठोक उतरता हूँ तब प्रसन्नता होती है ।

कई मनुष्यों को शंका है कि भविष्य का फल जाना नहों जा सकता । इसके विषय

में कुछ घटनाएँ लिखूगा । कई स्वप्न भो भविष्य-दर्शंक होते हैं जिनका कई लोगों ने

अनुभव किया होगा 1 यहाँ भविष्य दशक स्वप्न की एक घटना का वर्णन करूंगा ।

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले में चन्द्रभूषण त्रिवेदी ने, जो नरसिंहपुर पुलिस

लाइन्स के लाइन आफीसर हो गये थे, सन्‌ १९२१ में प्रातःकाछ स्वप्न देखा कि एक

ब्राह्मण की श्वेत गाय जो कुछ दिन में व्याने वाली थी उसको शेर ने मार डाला ।

श्री बद्रीप्रसाद शुक्ल डिस्ट्रिक्ट सुपरिन्टेन्डेन्ट पुलिस नरसिंहपुर के गोटे गाँव थाने के दोरे

पर, जाने वाले थे । उनके रोडर श्री मुहम्मद अब्बास से त्रिवेदी जी ने अपने स्वप्न का

हाल बताया और यह भी वताया कि साहिब वहाँ गये हैं और उस शेर को साहिब ने

मार डाला हे ऐसा भी स्वप्न में देखा गया है । वहाँ दोरे पर साहब के रीडर ने स्वप्न

का हाल साहव को बताया उस समय साहब लाहगांव में ठहरे थे । साहब ने अपने केम्प

में चंद्रभूषण त्रिवेदी को बुलाकर स्वप्न का पूरा हाल सुनाः। दूसरे दिन ही सूचना

मिली कि : मील पर मोजा मंजनी में शेर ने एक घोड़ा मार डाला है जहाँ शिकार के

लिये घोड़ा बॅधवाया गया था । साहब वहाँ गये शेर का हांका कराया परन्तु शेर नहीं

मिला । दूसरे दिन साहब का केम्प पहाड़ी खेड़ा था जहाँ दूसरे दिन साहब जा रहे थे ।

मार्ग में हयात खाँ मालगुजार मिले उन्होंने साहब से बताया कि मोजा मवई की एक

ब्राह्मण को स्वेत गाय जो हाळ में व्याने वालो थी आज प्रातःकाल उसे शेर ने मार

डाला । तुरन्त हांका का प्रबन्ध हुआ शेर निकला जिसे साहब ने मार डाला । वह स्वप्न

पूरा सत्य निकला 1

अनेक भविष्यवक्ता हो गये हूँ जिनका भविष्य कथन सत्य, निकला उनमें से एक

दो लोगों का यहाँ वणंन-कर देना उचित समझता हूँ । सुतान मालिक शाह के समय

में खुरासान में प्रसिद्ध शायर उमर खैयाम सन्‌ १०२५ में उत्पन्न हुआ था जिसकी

शायरी प्रसिद्ध है । -वह अद्भुत प्रतिभाशाली और बड़ा विद्वान्‌ था । वह ज्योतिष का

भी पुर्ण विद्वान्‌ था। इसने अपनी मृत्यु के ११ वर्ष पूवं अपनी मृत्यु की ठीक तिथि

.

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समय स्थान आदि ज्योतिष के आधार पर निकाल कर रख दिया था ठीक उसी स्थान

तिथि और समय में उसकी मृत्यु सन्‌ ११२३ में हुई ।

अभी लन्दन के जन्मे एक भविष्य वक्ता ( Elair voyance ) मारिश उड￾रफ नाम के व्यक्ति ने अमेरिका में सन्‌ ६१ में १२ बातों की भविष्यवाणी की थी

जिनमें से कई बातें सत्य निकल चुकी हैं । अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव के ६ मास

पहिले बता दिया था कि जान केनेडी प्रेसीडेन्ट होंगे । प्रिन्स एन्डू के जन्म के ६ मास

पहिले हो उसकी जन्म तिथि बतला दी थी कि इग्छैण्ड की रानी की बहिन प्रिसेस

भारग्रेट को पुत्र होगा 1 ये सब बातें सत्य निकलीं और भी कई भविष्य वाणी उसने

की हैं यह नागपुर के दिनवाद २९-१०-६१ में प्रकाशित हुआ था । शैरो का नाम

प्रसिद्ध है जिसने हस्तरेखा पर पुस्तकें लिखी हैं वह बड़ा. हस्तरेखा विशारद था

उसका असली नाम लुइस इम्मन ( Louis Hammon Cheiro ) था । उसने बम्बई

आकर हस्तरेखा और योग सीखा था जिसके द्वारा भविष्य वता देता था, उसने क्वीन

विक्टोरिया का मृत्यु समय व किंग एडवडं सप्तम के मृत्यु का वर्ष मास वता दिया

था। रसिया के जार तथा इटली के किंग हमवटं की मृत्यु कतल द्वारा होना व झाडं

किचनर की मृत्यु युढक्षेत्र में होना बता दिया था जिसका लाडे किचनर को विशवास

नहीं था परन्तु हुआ वैसा ही जैसा बताया गया था। रसिया में जार के यह! रहने

वाला रास पुटिन जो अपने को रसिया का रक्षक बतळाता था उसके वारे में शैरो ने

बताया कि उसकी मृत्यु जहर, छुरी या गोली से होगी और मृत्यु वाद उसका, शरीर

बर्फलि जल में फेंक दिया जायगा उसी प्रकार उसकी मृत्यु हुई उसने स्वतः की मृत्यु

का ठीक समय भी बता दिया था । सन्‌ १९२८ में उसने World Pridiction

( दुनिया की भविष्यवाणी ) नाम की पुस्तक प्रकाशित की थो उसमें लिखा था कि भारत

का विभाजन मुसलमान और हिन्दू में होकर. ब्रिटेन भारत को स्वतंत्रता दे देगा ।

इस प्रकार के अनेक उदाहरण मिलेंगे । अब मैं यहीं के कुछ ज्योतिषियों के फला-

देश पर कुछ प्रकाश डाळूंगा । नरसिंहपुर के प्रसिद्ध स्वगंबासा एडवोकेट श्री रामेश्वर

दयाळ वर्मा को ज्योतिष अध्ययन का बड़ा प्रेम था उन्होंने अपनी कुंडली पर से मारक

दशा a कर मृत्यु का समय नोट कर लिया था ठोक उसी समय पर उनकी

मृत्यु हुई।

नरसिंहपुर के स्थानिक ज्योतिषियों के फल कथन का संक्षित उल्लेख करूँगा।

पं० रामलाल दूबे ने गौरीशंकर तिवारी म्युनिसपळ हेड क्लकं की कुंडली' देखकर

मारकेश का समय विचार कर मृत्यु समय बता दिया था उनकी कॅन्सर से मृत्यु हुई ।

दिल्ली पटेल ग्राम सुपछा का छड़का पटेल भाई की कुंडली देखकर बता दिया था

उसके पीठ की सन्तान पुत्र होगा पुत्र ही हुआ श्री द्वारका प्रसाद पटेल के लड़के

( = )

विश्वनाथ की कुण्डली में योग देखकर लिख दिया था कि विकलांग होगा उसे लकवा मार

गया जिससे Ser हो गया । यह पदपुर के धनीराम लोधी के लड़के की कुण्डली में

लिख दिया था विकलांग होगा । वह लेंगड़ा हो गया । मंगली प्रसाद मास्टर के छड्के

जगन्नाथ प्रसाद श्रीवास को कुण्डली में लिख दिया था संतान नहीं होगी संतान नहीं

हुई । और भी कइयों को जैसा रिख दिया वैसा हुआ । नरसिंहपुर संस्कृत पाठशाळा के

प्रधान अध्यापक पं० श्री नमंदाप्रसाद शास्त्री से श्रीत्र्यम्बक राय: वैद्य: वकील ने अपने घर

से गुमी हुई सोने की साँकल के सम्बन्ध में विचारने का प्रश्न पूछा । शास्त्रीजी ने बताया

कि घर के पश्चिम में जो दार है, उसको सोढ़ी के किनारे पड़ो मिलेगी । वहाँ देखा

तो नहीं मिली ! दुबारा फिर पूउने पर बताया वहाँ रेता मट्टी आदि हटाकर खोजो ।

वैसा क रने से रेत में दबी हुई मिल गई । नरसिंहपुर के श्री चन्द्रभान सर्राफ के यहाँ

बहुत बड़ी चोरी हो गई थी । पंडित जो ने प्रश्‍न कुण्डली पर से विचार कर बताया कि

लगभग ५ मील पदिचम में नदी के किनारे माल गड़ा है ओर ३६ दिन. के भीतर माल

मिल जायगा चोर पकड़ जायगा। लगभग ३०वें दिन पश्चिम में दारुरेवा नदी के

किनारे चोर पकड़ा गया और वहाँ माल गा हुआ मिल गया । चोर लोग मीना जाति

के राजपुताने के रहने वाले थे । '

ऐसी अनेक घटनायें हैं यदि ऐसी घटनाओं का संग्रह किया जाय तो एक बड़ा

पोथा बन जायगा । ऐसे प्रत्यक्ष प्रमाण देखकर ही लोग ज्योतिष विद्या का मान करते

हैं और उसकी ओर आकर्षित होते हैं। इन सर्व बातों से विश्‍वास कर लेना चाहिये

कि भविष्य फल अवश्य जाना जा सकता है। इसके विषय में शंका करना व्यर्थ दै ।

पाठक स्वतः जब अनेक कुंडलियों का अध्ययन करेंगे तो उनके प्रत्यक्ष फल देखकर इसमें

विश्वास अवश्य बढ़ेगा और ज्यो तिष शास्त्र के अध्ययन में आनन्द आयेगा और रुचि

बढ़ेगी । ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक रूप से अध्ययन की अत्यन्त आवद्यकता है। |

अध्ययन के निमित्त यहाँ एक प्रकार के विषय के योगों को एकत्र कर दिया है

जिससे वैसे मनुष्यों की कुण्डलियों में उन योगो के अध्ययन में सहायता मिले । विषय￾वार फल देने से कहीं-कहीं विषय बदलने से उस फल की पुनरावृत्ति हो गईहै।

ज्योषित शास्त्र में भी अनेक मतांतर हैं. कहीं उन मतांतरों को भी अध्ययन के

निमित्त दे गया दिया है । जिसका अध्ययन कर पाठक लाभ उठायेंगे । ज्योतिष के

योगो में कई ऐसे योग दिये हैं जो आजकल होना असम्भव है परन्तु अध्ययन हिताथं

उन्हें भी दे दिया है 1

इस पुस्तक के लिखने में या कापी करने में या छापने में अशुद्धियाँ हो जाना

सम्भव है । प्राथना है कि कोई अशुद्धियाँ या भूल जो दृष्टिगोचर हो कृपा कर सुधार

कर लेखक को सूचित करने का कष्ट करेंगे तो मैं बड़ा अनुगृहीत होऊँगा । मूल हो जाना

मानवीय है, पाठक इसके लिए क्षमा करेंगे । ज्योतिष शास्त्र $ फलित ज्ञान का विस्तार

करने के निमित्त यह पुस्तक लिखी गई है 1 जिससे फलित के अध्ययन करने में सहायता

( <)

«मिलेगी 1 इसके पहिले इस ग्रंथ का ज्ञान एवं गणित खंड. अवश्य अध्ययन कर लेना

चाहिये जिससे फळित खंड के समझने में सुगमता ' प्राप्त होगी । इस प्रकार इसके

अध्ययन द्वारा अपने ज्ञान. को विस्तीणं कर पाठकगण अपना अनुभव बढ़ाने के लिए

ज्योतिष शास्त्र रूपी सागर के पार जाने एवं कथन करने के लिये इसे नोका के रूप में

सहायक पायेंगे । र

ज्योतिष के ग्रन्य अधिकतर संस्कृत में होने से उनके अध्ययन में: कठिनाई होती है

.इस कारण सुगम बोध के विचार से यह राष्ट्रभाषा हिन्दी में लिखा गया है । इसके

अध्ययन से पाठको का प्रेम एवं झुकाव इस विद्या की ओर बढा तो मैं अपना उद्देश्य

सफल समझूंगा ।

भवदीय

विजयादशमी _ : बी० एल० ठाकुर

सं० २०१८ ` : ज्योतिषाचायं

दिनांक १९-१०-६१ सिंह-सदन

पो० नरसिंहपुर (म० प्र०)

विषय-सूची

अध्याय विषय

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G X४१ &260 ८6 :४ १०

. राशि एवं नक्षत्र गुणघमं

. भाव और उनके गुण-घम

« ग्रह उनके नाम और गुण-धमं

. मैत्री, दृष्टि आदि

ग्रहों की अवस्थाएँ और चन्द्र-क्रिया

ग्रह कारक

. गुलिक आदि विचार

ग्रहों का रदिम फल विचार

. फल का स्थूल विचार

. निषेक अध्याय

« युगसंवत्सरादि फलाध्याय

. कालांग विचार

. भिन्न-भिन्न राशि में ग्रहों का फल

. द्वादश भावों में भिन्न-भिन्न राशियों का फल

. भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल

  • फलित में ग्रहों के फल का विचार

. भावेश का भिन्न-भिन्न भावो में फल

Page 12 Illustration

(चित्र / चक्र पृष्ठ 12)

संकेत-सूची

यह फलित खंड अंग्रेजी, मराठी, हिन्दी और संस्कृत के अनेक ग्रन्थों के अध्ययन

मान० = मानसागरी पद्धति

मध्य प० = मध्य पराशरी

सर्व चि० = सर्वाथे चितामणि

gá सं० = सर्वं संग्रह

शंमु० = शंमुहोरा प्रकाश

ज्यो० शा० = ज्योतिष शास्त्र

ज्यो० रत्ना० =ज्योतिष रत्नाकर

ज्यो० २० = ज्योतिष रहस्य

ज्यो० पा० = ज्योतिष पाठमाला

जैसिनी० = जैमिनी सुत्र

जा० सं० = जातक संग्रह

के पश्चात्‌ लिखा गया है 1 इसमें कुछ ग्रंथों का प्रमाण देकर उनमें नाम दिये हैं वे इस

प्रकार संकेत अक्षरों में है--

जा० भ० = जातका भरण

जा० So = जातकालंकार

श्री० qo =श्रीषर पद्धति

शीघ्र०5 शीघ्र बोघ

प्रा० यो० = प्रारब्ध योग

फल० = फल दीपिका

नील० = नोलकठी

go चं० = लग्नचंद्रिका

वृ० जा० = वृहज्जातक

qo पा० = वृहत्पाराशरी

जा० पारि० = जातक पारिजात

Page 14 Illustration

(चित्र / चक्र पृष्ठ 14)

संकेत-सूची

यह फलित खंड अंग्रेजी, मराठी, हिन्दी और संस्कृत के अनेक ग्रन्थों के अध्ययन

मान० = मानसागरी पद्धति

मध्य To = भच्य पराशरी

सर्व चि० = सर्वाथे चितामणि

सर्वे सं० = सवं संग्रह

शंभु० = शंभुहोरा प्रकाश

ज्यो० शा० = ज्योतिष शास्त्र

ज्यो० रत्ना० =ज्योतिष रत्नाकर

ज्यो० २० = ज्योतिष रहस्य

ज्यो० पा० = ज्योतिष पाठमाला

जैमिनी ० = जैमिनी सूत्र

जा० सं० = जातक संग्रह

के पश्चात्‌ लिखा गया है 1 इसमें कुछ ग्रंथों का प्रमाण देकर उनमें नाम दिये हैं वे इस

प्रकार संकेत अक्षरों में है--

जा० भ० = जातका भरण

जा० So = जातकालंकार

श्री qo «श्रीधर पद्धति

शीध्र०ञ्म्शीघ्र बोघ

प्राण यो० = प्रारब्ध योग

फल० = फल दीपिका

नील० = नीलकंठी

ल० चं० = लग्नचंद्रिका

वृ० जा० ७ वृहुज्जातक

qo पा० = वृहुत्पारादरी

जा० पारि० = जातक पारिजात

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(चित्र / चक्र पृष्ठ 16)

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श्री गणेशाय नमः

ज्योतिष-शिक्षा

तृतोय ( फलित } खण्ड

ध्याये पाये शक्ति जिन, पूवं ज्योतिषाचार॥

शिव शंकर सुमरन किये; कीना फलित विचार॥ १॥

उन्हीं भोलानाथ का, भजू गणप सह गौर ।।

सुमति शक्ति सामथं दो, होहु सहायक आर ॥ २॥

प्रबल तकंना-शक्ति दो, बढ़े त्रिकालिक : ज्ञान ॥

अनुभव और विचार से, बुद्धि होय बलवान॥ ३॥

दिव्य-दुष्टि दीजे प्रभू, धरूं तुम्हारा ध्यान॥

फित कथन प्रत्यक्ष हो, कुरा करो भगवान॥ ४॥

अध्याय १

राशि एवं नक्षत्र गुणघर्से

इस फित खण्ड का अध्ययन करने से पूवं इसका प्रथम ज्ञान खंड, एवं द्वितीय

गणित खंड अध्ययन कर लेना आवश्यक है जिसके पश्चात्‌ इस तृतीय फरित खंड के _

अध्ययन में सुगमता प्रतीत होगी ।

फलित ज्योतिष अध्ययन करने के लिये प्रारम्भ में जो बातें जानने योग्य हैं

यहाँ पहिले ही दे दी गई हैं और स्थूल रूप से फल का संक्षिप्त विचार भी पहले दै

दिया गया है ।

पृथक्‌-पृथक्‌ प्रसंग आने पर विषयों को समझाने के लिए कई स्थानों में पुनरा- र

वृत्ति भी हो गई है और कहीं-कहीं भिन्नता ( मतभेद ) भी जान पड़ेगी, परन्तु ये सब, . ह

बातें अध्ययन कर लेने पर आगे फल विचारने में बहुत सहायक होंगी। किसी-किसो —

प्रसंग में अच्छा और बुरा दोनों प्रकार का फल बताया है, इस पर अच्छी परिस्थिति,मे |

अच्छा फळ, बुरी परिस्थिति में बुरा फल ग्रहण करना । >

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२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

सारांश यह है कि यहाँ बताये विषय आगे बताये जाने वाले विषयों के फल-निर्णय

में सहायक होंगे । इनसे उनका अच्छी प्रकार से विचार कर उपयोग करना ।

राशि के भिन्न-भिन्न नाम-क्षेत्र, गृह, वृक्ष, म, राशि

१ चेष-अज, वस्त, प्रथम, क्रिय, विदव, तुंबुर, आद्य ।

३ बृष-उद्षा, गो, ताबुरि, शुक्रम, गोकुल ।

३ सिथुन-बोध,नृयुग्म, जितुम, तृतीय, इन्द्र, यम, युग ।

४ फर्क-चान्द्र, कुलीर, चतुर्थ, कर्काटक, कर्कट

ष्‌ [सिह-कंठीरव, लेय, मुगेन्द्र 1

६ कत्या-पाथोन, षष्ठी, अबला, तन्वी, रमणी, तरुणी ।

७ तुला-जूक, वणिक, वोलि, सप्तम, घट ।

द बुश्चिक-कोप्यं, कौज, अलि, अष्टम, कीट ।

९ घनु-जैव, घनु, तौदिक, चाप, घन्वी, शरासन ।

१० मकर-आकेकर, चक्र, दशम, मृग, मृगास्य, नक्र ।

११ कुम्भ-ह॒द्गोग, घटे, तोयघर ।

) १२ मोन-रिष्फ, झष, अंतिम, अन्त्य, मत्स्य, पृथुरोम ।

राशियों का आकार

१ मेष-मेढ़ा ।

२ बुष-सांड ।

३ मिथुन-चोणा लिए स्त्री और गदा लिए पुरुष एक-दुसरे को हृदय छगाए ।

४ क्के-केकडा । ५ सिह-सिंह | .

६ कन्या-जल में तैरतो नाव पर बैठी कुमारो हाथ में घान और प्रकाश लिए

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हुए।

७ तुला-तुला लिए हुए मागं में बैठा पुरुष ।

द वृश्यिक-बिच्छू ।

९ घन-सामने की ओर घनुष-बाण लिए योद्धा, पीछे का भाग घोड़े का ।

१० मकर-पगर का शरोर, हिरन का मुख ।

११ कुष्म-पानो का घडा सिर पर लिए मनुष्य 1

१२ मोन-दो मछलियाँ प्रत्येक की पूंछ दूसरे के मुख में ।

राशि एवं नक्षत्र-गुणधमं : ३

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६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

राशियों का स्वभाव

१ श्रेष साहसी, अभिमानी, मित्रों पर कृपा रखने वाला । यह पहले नवांश में अपने

स्वभाव को विशेष रूप से प्रकट करता है 1 यह पाटल देश का स्वामी है ।

३ युष-स्वार्थी, समझ-वूझ कर काम करने वाला, परिश्रमी; सांसारिक कार्यों में दक्ष,

पंचम नवां में यह स्वभाव पूर्ण रूप से प्रगट होता है । कर्नाटक ( मैसूर)

आदि देशों का स्वामी ë ।

३ मिथुन-विद्याष्ययनी, शिल्पी, पंचम नवांश में पुर्ण प्रभाव प्रकट हो । यह चेरा

देश का स्वामी है ।

४ कर्को सांसारिक उन्नति में प्रवृत्ति, लज्जावान, कार्य करने में स्थिरता, समय

अनुयायी का सूचक है 1 पहले नवांश में पूर्ण प्रभाव हो। चोल देश का स्वामी ।

५ सिह-मेष के समान स्वभाव, परन्तु स्वतंत्रता प्रेमी और उदार चित्त । पंचम

नवांश में पूरा प्रभाव । पांड्य देश, त्रिचनापल्ली, मदुरा, तंजौर, विजगा-

पट्टम आदि का स्वामी । d

६ 'कन्या-मिथुन का-सा स्वभाव, परन्तु अपनी उन्नति और मान पर पुर्ण ध्यान,

नंबम नवांद में पूर्ण प्रभाव, केरल, (त्रावनकोर) देश का स्वामी ।

७ तुला-विचारशील, ज्ञानप्रिय, कार्यसम्पन्न और राजनीतिज्ञ । पहळे नवांश में पूर्ण

प्रभाव । कोल्लास देश का स्वामी ।

६ वृश्चिफ-दंभी, हठी, दृढ्-प्रतिज्ञ, स्पष्टवादी, निर्मल चित्त । पंचम नवांश में-पुरा

प्रभाव । मलय देश (त्रिचनापल्ली और कोयंबटूर) का स्वामी ।

९ घन-अघिकार-प्रिय, करुणामय, मर्यादा का इच्छुक । नवम नवांश में पूरा प्रभाव ।

सेंघव (सिंघ) देश का स्वामी ।

१० मकर-उच्च पदाभिलाषी । प्रथ तवांश में पूरा प्रभाव | पंचाल देश (उत्तर

प्रदेश का मध्य भाग) का स्वामी ।

११ कुम्भ-विचारशोल, शांत चित्त से नई बात पैदा करने वाला, घर्मारूढ़, पंचम

नवांश में पूर्ण प्रभाव । यवनदेश (कश्मीर से काबुल तक) का स्वामी 1

१२ मोन-स्वभाव उत्तम, दानी, कोमल चित्त । नवम नवांश में पुर्ण प्रभाव । कौशल

  • देश (संयुक्त प्रान्त का पुर्व भाग जिसकी राजधानी अयोध्या थी) का स्वामी ।

द्रव्य आदि के ज्ञान में राशियों का अंश

राशि-मेष वृष मिथुन ककं सिंह कन्या तुला वृश्चिक धन मकर कुंभ मीन

अंश-१० २४ २८ ३२ ३६ ४० ४० ३६ ३२ २८ २४ २० ये केवल नष्टादि द्रव्य चिता, द्रव्य परिज्ञान, पुरुष अवयव ज्ञान आदि के किये . हैं॥ इसे पूर्वाद्धे के ५-६-७-८-९-१० को ५४० पल = २००-२४०-२८०-३२०-३६०

“४०० पल लेना

राशि एवं नक्षत्र-गुणघर्म : ७

राशि मेष वृष मिथुन कर्के सिंह कन्या

१२ मीन कुम्भ मकर घन वृश्चिक तुला

पल २०० २४० २८० ३२० ३६० ¥oo

उपयोग :--राशि की छुटाई-बड़ाई के अनुसार शरीर के अंग की छुटाई बड़ाई

कालांग संबंध से अनुमान करना ।

चंद्र की राशि के अंशानुसार शुभाशुभ विचार

राझि-मेष वृष मिथुन कर्क सिंह कन्या तुला वृश्चिक घन मकर कुम्भ मीन

शुभ अंश-२१ १४ १८ ८ १९ ९ २४ ११ २३ १४ {९ ९

अशुभमंद्-८ २५ २२ २२ २१ १ ४ २३ १८ २० २० १०

चंद्र के अंश मुहूतं और जन्मकाल में जो अशुभ बताये हैं वे मरण तुल्य सूचक हुँ ! वे मुहुर्त पुष्कर नाम के हुँ जो जन्म ओर मुहूर्त में शुभसूचक हैं जैसे जन्म चन्द्र

मेष के ८वें अंश पर हो उसका ¿í वर्ष मरण या अरिष्ट विचारना । इसी प्रकार

दूसरी राशियों का भी विचारना ।

किसी राझि से ४-८-१२ की राशि अशुद्ध अर्थात्‌ खराब होती है । जैसे :--

इन राशि वालों को ये राशियाँ अशुद्ध हैं इन अशुम स्थानों में चन्द्र हो

१-५-९ ४-८- १२ तो उक्त राशि वालों को शुभ

२- ६- १० ५-९- १ कार्य करना वर्जित है। अर्थात्‌

३-० ७- ११ ६-१०- २ वह समय खराब समझना ।

४- ८- १२ ७-१ १- ३

शून्य राशि ( इन महीनों में ये राशियाँ हों तो अशुभ हैं )

राशि--कुम्भ, मीन, वृष, मिथुन, मेष कन्या

मास--चैत्र वैशाख ज्येष्ठ आषाढ़ श्रावण भाद्रपद

राशि-वृश्चिक, तुला, घन, कर्क, मकर, सिंह

मास--आदिवन, कातिक मागे पौष माघ. फाल्गुन

शून्य लग्न ( इन तिथियों में ये लग्न अशुभ हैं )

तिथि--प्रतिपदा तृतीया पंचमी सप्तमी नवमी एकादशी त्रयोदशी

लग्न--'७-१० ५-१० ३-६ ४-९ ४-५ ९-१२ २-१२

तारक-मारक राशि

(१) मेष, सिंह, घन-ये परस्पर सहायक राशि हैं। इन राशियों में यदि बलवान्‌

ग्रह हो तो मनुष्य सत्ताघारी होता है । ये महत्त्वदर्शक, उत्कर्षदायक, उच्च-नीच

स्थिति निर्माण करने वाळी हैं 1

( २) वृष, कन्या, मकर-ये सामान्य राशि ë । इस राशियों वाळे स्वार्थी होते हैं । इस

राशि वाळे से उच्च कोटि के सार्वजनिक कार्य होना बहुघा असम्भव है ।

८: ज्योतिष-शिक्षा, तृयोय फलित खण्ड

(३) मिथुन, तुला, कुम्म-ये राशि बौद्धिक हैं। ये राशियाँ प्रगति की दृष्टि से

सामान्यतः स्थिर हैं परन्तु चिकित्सक एवं वाद-विवाद करने की दृष्टि से

उत्तम हैं ।

(४) कर्क, वृश्‍चिक, मोन-इन राशियों वाले सार्वजनिक आंदोलन में भाग छेने वाले,

समाज पर प्रभाव रखने वाले, नेता, मागंदर्शंक, सलाहकार, चतुर मनुष्यों

की अनुकूलता प्राप्त करने वाले, स्वतन्त्र वृत्ति वाले एवं मार्मिक ग्रन्थकर्ता

होते हैं ।

इन राशियों में चन्द्र स्थित हो और अन्य ग्रहों की युति या दृष्टि न हो तभी इनका

फल मिलना सम्भव है । अन्यथा कुछ अन्तर पड़ जाता ë!

अभिजित्‌ संज्ञक राशि-सूयं जिसमें हो उससे चौथी राशि अभिजित्‌ संज्ञक ë

हार राशि-जिस राशि को दशा वर्तमान हो वह द्वार राशि है 1

बाह्य भोग्य-प्रथम दशापति राशि से द्वार राशि जितनी संख्या पर वर्तमान हो द्वार से

उतनी संख्या गिनने पर जो राशि मिले वह बाह्य राशि है। बाह्य को भोग्य

राशि भी कहते हैं ।

जन्‍्मराशि-जन्म समय चन्द्र जिस राशि पर हो वह जन्म राशि कहलाती है ।

बक्काद्ध-१२ राशि का एक चक्र होता Š । इसके २ भाग पुर्वाद्ध और पराद्ध हैं ।

पूर्घाघं-मेष से कन्या तक उत्तरार्घ तुछा से मीन तक ।

विलोम-'गणना से-७ से १२- पूर्वार्ध, १ से ६-उत्तराघं ।

भसंघि-ऋक्ष संधि-वृश्चिक, मीन, ककं ।

राशि प्रभाव से रोग एवं विशेष परिस्थिति से मृत्यु

( १ ) बेष-उष्णता, जठराग्नि या पित्त ज्वर से मृत्यु ।

(२) वृष-त्रिदोष से, अग्नि या शस्त्र से 1

( ३ ) मिथुन-जुकाम, श्वास, शूल से ।

( ४ ) कर्क- पागलपन, वातरोग, अरुचि से ।

(५ ) खिह-जंगली पशु, ज्वर, व्रण या शत्रु से 1

( ६) कन्या-स्त्रियों द्वारा, वीर्य संबंधी रोग से, ऊँचे से पतन से ।

(७ ) तुला-सन्निपात, मस्तिष्क ज्वर से ।

( ८) वृश्चिक-पांडु रोग, संग्रहणी, तापतिल्ली के रोग से ।

( ९ ) घनु-वृक्ष, जळ, काष्ठ या शस्त्र से ।

(१०) मकर-पेटदर्द, मंदारिन, भ्रम से ।

(११) कुम्भ-कफ, ज्वर और क्षय से ।

(१२) भोन-जल में इब कर या कोई जल के रोग से ( जैसे जलोदर ) ।

लग्न से अष्टम गिनने पर जो राशि वहाँ हो उसके बुरे प्रभाव से उपरोक्त प्रकार से

मृत्यु हो या अष्टमेश के नवांश की राशि के बुरे प्रभाव से उपरोक्त फल हो ।