सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 59, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रह, उनके नाम ओर गुण-धर्म : ४३
अन्यमत--पूर्ण बल-चन्द्र कृष्ण १ से ५ तक और शुक्ल ११ से १५ ( पूर्णिमा ) तक ।
मध्यम वल-कृष्ण ६ से १० तक्र और शुक्ल ६ से १० तक. र
क्षीण वल-कृष्ण ११ से ३० अमावस्या तक और शुक्ल ? से ५ तक ।
पाप ग्रह--शनि, मंगल, सूर्य, क्षीण चन्द्र.:पाप ग्रह युत बुध 1
तम ग्रह--(अन्धकार रूप)-राहु केतु साहचर्य R फल देते हैं ।
राहु-केतु--शुभ हैं-जब किसी शुभ ग्रह की राशि में हों या शुभ ग्रह के साथ हों ।
अशुभ हूँ-” ” अशुभ " अशुभ "
प्रकाशित ग्रह--सूर्य चन्द्र ( जो प्रकाश देते. हँ)
तारा ग्रह--मंगल, बुघ, गुरु, शुक्र, शनि। . !
पाप ग्रह में बल--सूयं, मंगळ, शनि, राहु क्रम से पापत्व में अधिक बली हैं अर्थात् qq
से अधिक पापत्व मंगळ में हे, उससे अधिक शनि में, शनि से अधिक पापत्व राहु में प्रत्रल है । _ f
शुभत्व में बलो--बुध, शुक्र, केतु, गुरु ये उत्तरोत्तर शुभत्व में बली हैं शुभ ग्रह की राशि
में या शुभ युक्त या अपने उच्च में बुघ शुभ है । यहाँ केतु का शुभत्व
जब qg शुभ युक्त या शुभ राशि में हो तभी विचारना । जब यह
शुभ हैं तो शुक्र से अधिक शुभता जैमिनी ने बताई € 1
चन्द्रमा पूर्ण हो या शुभ ग्रहों से युत दृष्ट हो तो शुभ माना जाता है, ऐसा जातक
पारिजात का मत है । * १
शुक्र और गुरु के शुभत्व पर विचार
शुक्र से--सांसारिक सुख और व्यौहारिक सुखों का विचार होता है । शुक्र से सांसारिक,
उन्नति होती है न कि आत्मोत्नति। शुक्र के प्रभाव से मनुष्य स्वार्थी होता है ।
गुरु--से पारलौकिक एवं आध्यात्मिक सुखों का विचार होता है । गुरु सम्पूर्ण आत्म
उन्नति का कारक और पारलौकिक बुद्धि की उत्तेजना देने वाला है गुरु परमार्थी
होता है ।
मंगल और शनि के पापत्व में अन्तर
शनि--यद्यपि दोनों पाप ग्रह हैं परन्तु अन्तर यही है कि शनि बहुत क्रूर होने पर भी
अन्तिम परिणाम में मुख देता है । जैसे स्वर्ण को जलाकर अग्नि शुद्ध कर
त्य है। उसो प्रकार शनि मनुष्य को दुर्भाग्य और दुःख देकर शुद्ध बना
1 है । š नारा x
मंगल--परन्तु मंगल उत्तेजना देने वाला, उमंग और तृष्णा से परिपूर्ण कर देने के
कारण संदा दुःख कारक होता है ।
तात्कालिक शुभ ग्रह
(१) बुध राहु केतु--जब शुभ ग्रह की राशि में हों या शुभ ग्रह युक्त हों!
(२) सूर्यं चन्द्र--जब अष्टम स्थान के स्वामी हों । Ç
(३) अष्टमेश--जब लग्नेश भी हो ।