भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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४४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(४) धनेश ओर व्ययेश--जब किसी शुभ ग्रह के घर में हों या शुभ ग्रह युक्त हों ।

(५) त्रिकोणेश- चाहे पाप या शुभ ग्रह हो तो शुभ है ।

(६) केम्द्रेश--पाप ग्रह हो तो शुभ है ।

अन्य ग्रह परिस्थिति वश इस प्रकार शुभ हो जाते हैं :—

` (१) उच्च का ग्रह, (२) स्वस्थानी ग्रह, (३) मित्रक्षेत्री ग्रह, (४) त्रिकोण में स्थित ग्रह,

(५) राज योग कारक ग्रह और इनके सम्बन्धी ग्रह (६) १-४-१० भाव में ग्रह (७)

त्रिकोणेश ओर उनसे सम्बन्ध रखने-याले ग्रह (८) केन्द्रेश जो शुभ माने गये हों और

उनसे सम्बन्ध रखने वाले ग्रह (९) षडवर्ग में बली ग्रह अर्थात्‌ स्वगृही, उच्च या मित्र के

वर्ग में ग्रह (१०) किसी प्रकार से शुभ ग्रह से सम्बन्ध रखने वाळा ग्रह (११) वे ग्रह

जो ३-६-११ या २-८-७ घर के स्वामी न हों (१२) शुभ ग्रह जो केन्द्र के स्वामी न हों

(१३) १-४-१०-११ घर के ग्रह जिन्हें हषं बल प्राप्त हो (१४) लग्न में १-८-३-४ राशि

का राहु (१५) मेष का राहु शुभ युक्त हो तो अति शुभ राज योग कारक होता ë । शुभ ग्रह का फल

शुभ ग्रह अपनी दशा में प्रत्येक भाव के सम्बन्ध से जो उत्तम फल होंगे उनको उत्तमता

से प्रकट करेगा । जैसे :—

लगन से-आरोग्यता प्रसन्नता शक्ति स्वभाव शारीरिक बल, संतोष वृद्धि आदि ।

घनभाव से-धन वस्त्र उत्तम भोजन आदि |

सहज भाव से-भाई बहन या सुहूदजनों की सहानुभूति और प्रसन्नता ।

चतुर्थ भाव से —8 बाग बगीचा, वाहन, माता की प्रसन्नता, घन प्राप्ति आदि । इसी

प्रकार अन्य भावों के सम्बन्ध से शुभ ग्रह शुम फल देता है ।

परिस्थिति वश अशुभ ग्रह

(१) नीच का ग्रह (२) अस्त ग्रह (३) ६-८-१२ के स्वामी ग्रह (४) शुभ ग्रह जो

केन्द्र के स्वामी हों (५) धड़बल में निर्बल शत्रु क्षेत्री आदि ग्रह (६) सप्तमेश (७)

किसी प्रकार से अशुभ ग्रह से सम्बन्ध रखने वाला ग्रह (८) योग भंग कारक ग्रह का

संबन्धी ग्रह (९) ग्रह के स्वस्थान से सप्तम घर का स्वामी (१०) अशुभ ग्रह जो केन्द्र

त्रिकोण के स्वामी न हों अति अशुभ हैं (११) शुक्र भी सूयं से ५ अंश के भीतर हो,

अशुभ नवांश में हो शत्रु गृही या नीच गृही हो तो अशुभ हो जाता है ।

बृहज्जीव संज्ञा--शनि, मंगल यक्त राहु को वृहुज्जीव कहते हैं ।

अघोमुखग्रहृ सूर्य से प्रथम ६ राशियों में स्थित ग्रह--१,२,३,१०, ११, १२ भाव में ।

ऊर्ध्वं मुख-सूर्य से द्वितीय ६ राशियों में ग्रह--४, ५, ६, ७, ८, ९ भाव में, ये सुख

वित्त देते हूँ ।

ग्रहों का प्रदेश f ग्रहों के देश

` सूर्य--देवभूमि (मेर) प्रदेश सुयं--कलिग

चन्द्र--जल (समुद्र) चन्द्र--यवन