भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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ग्रह, उनके नाम और गुण-घमं : ४९

हुआ धन ( निधि ) निकालने का कष्ट, ब्राह्मण, देव के शाप से रोग, किन्नर,

यक्ष, गंघवं, विद्याधर की पीडा से विद्वान या गुरुजनों के सम्बन्ध में वड़ा

अपराध करने के कारण पीडा ।

६ झुन्न--पांडु रोग, कफ से उत्पन्न रोग, बात व्याधि, नेत्र पीड़ा, मूत्रकुच्छ रोग,

गुप्तेन्द्रिय में रोग, वात कफ, भोग में पोड़ा, वीयंपात, देह कांति रहित, वेश्या

के समागम के कारण शोष, स्त्रियों से उत्पन्न मेह आदि रोग, अपनी या दूसरे

को स्त्री से भय, योगिनी भय, यक्षी, मातु गण का भय, असुर भय, परम

मित्र की मित्रता भंग ।

७ शनि--कफ और बात रोग, पाद पीडा, अभाग्य, श्रम, तंद्रा, भ्रांत, कुक्षि रोग; अति

उष्ण, भृत्य त्याग, पसली में चोट, स्त्रो और संतान को भय, कोई अंग में

चोट, हृदय ताप, काष्ठ या पत्यर से चोट, वात प्रघान रोग, दरिद्र, अपने

कर्म, पिशाच और चोर से पीडा ।

८ रघु--हृदय की घड़कन, कुष्ठ, विमति, कृत्रिम विष से भय, पैर में पोडा; पिशाच भोर

नाग की पीड़ा, स्त्री और संतान को आपद, नेत्र रोग, बात, भूत ज्वर, फांसो,

संक्रामक रोग, शीतला, अपस्मार, क्षुधा, कृमि, अरुचि, कुष्ट से भय, प्रेत भूत

पिशाच, बंधन (कारागार) से भय ।,

९ क्षेतु- ख्राह्माण और क्षत्रिय से विरोध की पीड़ा या शत्रु विरोध से पीड़ा, संघि रोग,

कंडु (खाज), आघार हीन व नीच जातिवाछों से भय, शीतलता, दाद, वात,

भूत ज्वर ।

१० भांदि--(गुलिक) प्रेतभय, विषभय, शारीरिक पीड़ा, समीप के कुटुम्बी की मृत्यु से

शोक ।

कौन ग्रह किस रोग से मृत्यु करते Š

१ सूयं--अग्नि, पित्तज्वर, पित्त, शस्त्र शे । सूर्यं स्वक्षेत्री या उच्च का हो तो सोख्य

अन्यराशि का हो तो दुःख, शत्रुक्षेत्रो हो तो बिजली गिरे, सर्प काटे 1

२ चन्द्र--विसूचिका, जलरोग जैसे जलोदर आदि या. साघारण प्रकार के कफके रोग से

पाप ग्रह की राशि में हो तो श्वास या त्रिदोष ज्वर से ।

३ मंगल--अचानक अग्नि, क्षुद्र अभिचार टोना और ser से, कुष्ट और स्त्री जनित

रोग होकर शल्य चिकित्सा से मरतः है । सकि

Y बुघ--पांडु रोग, रक्त हीनता, और इसी प्रकार के रोग, भ्रमज (चक्कर आना), ज्वर

ताप, शूल होकर मरे । तीर्थ में मरता है मरते समय श्रद्धा रहे ।

५ गुरु--सुख पूर्वक मृत्यु या कफ से, रोग का ज्ञान नहीं होता परन्तु सावधान होकर

मरता है । I र ;

६ शुक्र--वीर्य जनित रोग से जो स्त्रो सम्बन्ध से प्राप्त हो या प्यास से व्याकुल होकर

तीर्थ में मरे । ! 5

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