भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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४८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

ग्रहों का भाग्योदय काल

जब ग्रह कुडली में उच्च फल दायी होता हे तो अपनी दशा काल में. उच्च फल

देता है । परन्तु भाग्य के उदय करने का समय भी विचारणीय है ।

वह भाग्योदय समय इस प्रकार हे--

ग्रह सूर्य चंद्र मंगल बुध गुरु शुक्र हानि राहु केतु

भाग्योदय २२ ५ २८ ३२ १६ २५ ,३६ ४२ ४८

का वर्ष

२४ `" aq ३६ २२ २८ ४२ ४८ ५४

कोन ग्रह क्या रोग कहते हैं

१ सूर्य--पित्तोष्ण ज्वर, देह ताप, मृगी, हृदय रोग, नेत्रव्याधि, शत्रु से भय, चमंरोग,

काष्ठ, अग्नि, शस्त्र, विष, स्त्री, संतान, चौपाया, चोर, राजा, यम, सर्प,

पित्त रोग, क्षय, अतिसार, नौकरों से चित्त में व्यसन, अग्नि भय, राजा देव

ब्राह्मण इनके सम्बन्ध से संकट, दिव से भय ।

२ चन्त्र--संन्यास रोग, निद्रा के रोग, निद्रा, आलस्य, कफ रोग, अतिसार, पिटिका (पीठ का फोड़ा), शीत ज्वर (मलेरिया ज्वर), सींग वाले भौर जल जन्तु से

भय, मंदारिन अरुचि, योषिद्व्यथा (स्त्रियों से पीड़ा), कामला (पीलिया),

नपुंसकता, रक्त दोष, जल से भय, बाल ग्रह, दुर्गा, किन्नर, यम, सप, स्त्री,

यक्ष से भय, वात कफ रोग, जल दोष, स्त्री से उत्पन्न दोष, पांडू रोग, पीनस,

देवी से भय, कालिका, असुर और स्त्रोगण से व्याकुलता ।

३ मंगल--तृष्णा (अधिक प्यास), त्रिदोष, पित्त ज्वर, अरिन, विष अस्त्र से भय, नेत्र

रोग, गुल्म, मृगी, मज्जा दोष, चमं, विचचिका ( वामा ), देह भंग (शरीर

में कुरूपता), राजा शत्र, चोर से पीड़ा, भाइयों से, पुत्र और मित्रों से झगड़ा,

प्रेत, गन्धर्व धोर ग्रह से भय, शरीर के ऊपरी अंग से सम्बन्ध रखने वाले रोग जैसे फेफडा, गला, जीभ, आंख, कान नाक आदि के रोग, कफ, शस्त्र अग्नि

इनसे गांठ या ब्रण, दारिद्रज रोग से भय, देवी, वीर, शैव गण, भैरव इनसे

भय। प्लेग की गिल्टी ।

४ बुघ--भ्रांति ( मानसिक रोग ), दुर्वचन भाषण, नेत्र रोग, गले और नाक से होने

वाले रोए, ज्वर, वात रक्त (पांडु), दुःस्वप्न, विचाचिका ( चर्म रोग ) अग्नि

में पतन, कठोर बन्धन, और इसी प्रकार के कष्ट, गृह्य रोग, उदर, कुष्ठ रोग,

मंदार्नि, शूल, ग्रहणी आदि रोग, समाने व विष्णु भक्त इनसे दुःख, गन्धवं

के स्थान में रहने वाळे असुर और अग्नि कुड जहाँ बहुधा ये बुरे प्रेत रहते है

इनसे उत्पन्न दोष ।

५ गुरु- गुल्म ( आंतों का रोग ), आंत्र ज्वर, हरनिया, शोक, मोह, कफ, रोग, कर्ण

रोग, चक्कर आना, वायु कफ, देवस्थान सम्बन्ध से पीड़ा, या जमा किया