सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
४८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
ग्रहों का भाग्योदय काल
जब ग्रह कुडली में उच्च फल दायी होता हे तो अपनी दशा काल में. उच्च फल
देता है । परन्तु भाग्य के उदय करने का समय भी विचारणीय है ।
वह भाग्योदय समय इस प्रकार हे--
ग्रह सूर्य चंद्र मंगल बुध गुरु शुक्र हानि राहु केतु
भाग्योदय २२ ५ २८ ३२ १६ २५ ,३६ ४२ ४८
का वर्ष
२४ `" aq ३६ २२ २८ ४२ ४८ ५४
कोन ग्रह क्या रोग कहते हैं
१ सूर्य--पित्तोष्ण ज्वर, देह ताप, मृगी, हृदय रोग, नेत्रव्याधि, शत्रु से भय, चमंरोग,
काष्ठ, अग्नि, शस्त्र, विष, स्त्री, संतान, चौपाया, चोर, राजा, यम, सर्प,
पित्त रोग, क्षय, अतिसार, नौकरों से चित्त में व्यसन, अग्नि भय, राजा देव
ब्राह्मण इनके सम्बन्ध से संकट, दिव से भय ।
२ चन्त्र--संन्यास रोग, निद्रा के रोग, निद्रा, आलस्य, कफ रोग, अतिसार, पिटिका (पीठ का फोड़ा), शीत ज्वर (मलेरिया ज्वर), सींग वाले भौर जल जन्तु से
भय, मंदारिन अरुचि, योषिद्व्यथा (स्त्रियों से पीड़ा), कामला (पीलिया),
नपुंसकता, रक्त दोष, जल से भय, बाल ग्रह, दुर्गा, किन्नर, यम, सप, स्त्री,
यक्ष से भय, वात कफ रोग, जल दोष, स्त्री से उत्पन्न दोष, पांडू रोग, पीनस,
देवी से भय, कालिका, असुर और स्त्रोगण से व्याकुलता ।
३ मंगल--तृष्णा (अधिक प्यास), त्रिदोष, पित्त ज्वर, अरिन, विष अस्त्र से भय, नेत्र
रोग, गुल्म, मृगी, मज्जा दोष, चमं, विचचिका ( वामा ), देह भंग (शरीर
में कुरूपता), राजा शत्र, चोर से पीड़ा, भाइयों से, पुत्र और मित्रों से झगड़ा,
प्रेत, गन्धर्व धोर ग्रह से भय, शरीर के ऊपरी अंग से सम्बन्ध रखने वाले रोग जैसे फेफडा, गला, जीभ, आंख, कान नाक आदि के रोग, कफ, शस्त्र अग्नि
इनसे गांठ या ब्रण, दारिद्रज रोग से भय, देवी, वीर, शैव गण, भैरव इनसे
भय। प्लेग की गिल्टी ।
४ बुघ--भ्रांति ( मानसिक रोग ), दुर्वचन भाषण, नेत्र रोग, गले और नाक से होने
वाले रोए, ज्वर, वात रक्त (पांडु), दुःस्वप्न, विचाचिका ( चर्म रोग ) अग्नि
में पतन, कठोर बन्धन, और इसी प्रकार के कष्ट, गृह्य रोग, उदर, कुष्ठ रोग,
मंदार्नि, शूल, ग्रहणी आदि रोग, समाने व विष्णु भक्त इनसे दुःख, गन्धवं
के स्थान में रहने वाळे असुर और अग्नि कुड जहाँ बहुधा ये बुरे प्रेत रहते है
इनसे उत्पन्न दोष ।
५ गुरु- गुल्म ( आंतों का रोग ), आंत्र ज्वर, हरनिया, शोक, मोह, कफ, रोग, कर्ण
रोग, चक्कर आना, वायु कफ, देवस्थान सम्बन्ध से पीड़ा, या जमा किया
ग्रह, उनके नाम और गुण-घमं : ४९
हुआ धन ( निधि ) निकालने का कष्ट, ब्राह्मण, देव के शाप से रोग, किन्नर,
यक्ष, गंघवं, विद्याधर की पीडा से विद्वान या गुरुजनों के सम्बन्ध में वड़ा
अपराध करने के कारण पीडा ।
६ झुन्न--पांडु रोग, कफ से उत्पन्न रोग, बात व्याधि, नेत्र पीड़ा, मूत्रकुच्छ रोग,
गुप्तेन्द्रिय में रोग, वात कफ, भोग में पोड़ा, वीयंपात, देह कांति रहित, वेश्या
के समागम के कारण शोष, स्त्रियों से उत्पन्न मेह आदि रोग, अपनी या दूसरे
को स्त्री से भय, योगिनी भय, यक्षी, मातु गण का भय, असुर भय, परम
मित्र की मित्रता भंग ।
७ शनि--कफ और बात रोग, पाद पीडा, अभाग्य, श्रम, तंद्रा, भ्रांत, कुक्षि रोग; अति
उष्ण, भृत्य त्याग, पसली में चोट, स्त्रो और संतान को भय, कोई अंग में
चोट, हृदय ताप, काष्ठ या पत्यर से चोट, वात प्रघान रोग, दरिद्र, अपने
कर्म, पिशाच और चोर से पीडा ।
८ रघु--हृदय की घड़कन, कुष्ठ, विमति, कृत्रिम विष से भय, पैर में पोडा; पिशाच भोर
नाग की पीड़ा, स्त्री और संतान को आपद, नेत्र रोग, बात, भूत ज्वर, फांसो,
संक्रामक रोग, शीतला, अपस्मार, क्षुधा, कृमि, अरुचि, कुष्ट से भय, प्रेत भूत
पिशाच, बंधन (कारागार) से भय ।,
९ क्षेतु- ख्राह्माण और क्षत्रिय से विरोध की पीड़ा या शत्रु विरोध से पीड़ा, संघि रोग,
कंडु (खाज), आघार हीन व नीच जातिवाछों से भय, शीतलता, दाद, वात,
भूत ज्वर ।
१० भांदि--(गुलिक) प्रेतभय, विषभय, शारीरिक पीड़ा, समीप के कुटुम्बी की मृत्यु से
शोक ।
कौन ग्रह किस रोग से मृत्यु करते Š
१ सूयं--अग्नि, पित्तज्वर, पित्त, शस्त्र शे । सूर्यं स्वक्षेत्री या उच्च का हो तो सोख्य
अन्यराशि का हो तो दुःख, शत्रुक्षेत्रो हो तो बिजली गिरे, सर्प काटे 1
२ चन्द्र--विसूचिका, जलरोग जैसे जलोदर आदि या. साघारण प्रकार के कफके रोग से
पाप ग्रह की राशि में हो तो श्वास या त्रिदोष ज्वर से ।
३ मंगल--अचानक अग्नि, क्षुद्र अभिचार टोना और ser से, कुष्ट और स्त्री जनित
रोग होकर शल्य चिकित्सा से मरतः है । सकि
Y बुघ--पांडु रोग, रक्त हीनता, और इसी प्रकार के रोग, भ्रमज (चक्कर आना), ज्वर
ताप, शूल होकर मरे । तीर्थ में मरता है मरते समय श्रद्धा रहे ।
५ गुरु--सुख पूर्वक मृत्यु या कफ से, रोग का ज्ञान नहीं होता परन्तु सावधान होकर
मरता है । I र ;
६ शुक्र--वीर्य जनित रोग से जो स्त्रो सम्बन्ध से प्राप्त हो या प्यास से व्याकुल होकर
तीर्थ में मरे । ! 5
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५० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड
७ शनि--बात रोग, भयानक ज्वर जैसे टाई फाईड आदि | या भूख से परदेश में मरे ।
क्षुधा तृषाकी पीड़ा से या शत्रु हारा विष या सपं या अग्नि में जलकर ।
८ राहु--कोढ़, विषयुक्त अन्नपान से, विषेले कीड़ों के काटने से या चेचक या इसी
प्रकार के रोग से । :
९ क्ेतु- अस्वाभाविक मृत्यु हो जैसे अपघात आदि जो रिपु विरोध से या कीट के
कारण हो ।
ये अष्टम स्थान के अधिकारी होने या उनके संबन्ध में अपने रोग से मरण
करते हैं |
ग्रहों के स्थान
१ सूयं--शिव मंदिर, खुला स्थान अर्थात् खुली जगह जहाँ प्रकाश है, जल रहित स्थान,
पूर्व दिशा ।
२ चन्द्र-दुगदिबी का स्थान, स्त्रियों के आघोन स्थान, जल औषधि (जड़ी बूंदी आदि)
I जहाँ है वह स्थान, मधु या शराब रखने का स्थान, उत्तर पश्चिम दिशा ।
३ मंगल--चोरों के अड्डे का स्थान, नीच लोगो के आश्रित स्थान, अग्नि का स्थान,
"` युद्ध स्थान, दक्षिण दिशा ।
४ बुंध--विद्वान् पुरुषों की जगह, विष्णु स्थान, सभा स्थान, विहार स्थान, गणक स्थान,
और उत्तर दिशा ।
गुरु--कोष स्थान पीपल वृक्ष, देव ब्राह्मण गृह, उत्तर पूर्व दिशा ।
६ शुक्र वेश्या, शयन स्थान, नृत्य स्थान, स्त्रियों के रहने का स्थान, अवरोध स्थान
वेश्या का. स्थान, दक्षिण पूर्व दिशा ।
७ दनि--नीच श्रेणी के लोगों का स्थान, अपवित्र स्थान, शास्ता (वरुण) देव का मन्दिर
पश्चिम दिशा ।
८ राहुकेतु--वल्मीक (बमीठा), काले छिद्र जिनमें सपं रहते हैं, दक्षिण पढ्चिम दिसा ।
किस ग्रह से क्या प्रकट होता है
१ सूर्य-- शिव का उपासक, भित्रक (वैद्य), राजा यज्ञ आदि कृत्य करने वाला, मंत्री
बाघ, हिरन, चक्रवाक (चकवा) ।
२ चंद्र- शास्ता, देवी का उपासक, स्त्री, रजक, कृषक जल के जीव, खरगोश, हरिन,
चक, (सारस), चकोर |
३ मंगल--रसोइया (रसोई घर में): आयुधः भूत (जिरहवख्तर अस्त्र आदि ले चलने
वाला) सुअर, मेढा, कुक्कुट, श्युंगाल (सियार), गिद्ध, चोर ।
४ बुघ--गोप (गौ चरवाहा), विद्वान्, शिल्पी, गणक (चतुर हिसाबी), विष्णुदास, गरुड़
` ' चातक पक्षी, तोता, बिल्ली ।
५ गुरु-दैवज्ञ (ज्योतिषी) मंत्री, गुरु, विप्र, सन्यासी का नेता, कबूतर, घोड़ा, हंस ।
ग्रह, उनके नाम और गुण-धमं : ५१
६ शुक्र--गाने बजाने वाला, घनो पुरुष, वणिक, नट (नृत्यक), बिट, तंतुवाह (जुलाहा),
वेश्या, मोर, महिष, तोता, गाय ।
७ शनि--तेलो, दास, नीच, शिकारो, लोहा र, हाथी, कोवा, कोयल ।
८ राहु केतु --बौद्ध, सपं पकड़ने वाळा, गधा, मेढा, मेडिया, ऊंट, सपं, अंघक्रार में रहने
वाला स्थान या इसो प्रकार के स्थान मच्छड, खटमल, कीट उल्लू ।
साधारणतः ग्रहों को इस प्रकार बलो समझना
१ सुर्य-स्वगृहो, उच्च राशि, स्वहोराद्रेष्काण में या नवांश में, रविवार, उत्त रायण, दिन
के मध्याह्नं में, रात्रि के आदि में, मित्र के नवांश आदि में और लग्न से दशम
भाव में बलवान् होता हू ।
२ चंव्र--कर्क राशि में, वृष राशि में, अपने दिन, होरा द्रेष्काण नवांश आदि में, राशि
के अन्त में, शुभ ग्रहों से दुष्ट राशि में, चतुर्थ भाव में, दक्षिणायन में बली
होता है । ऋक्ष संधि को छोड़कर प्रत्येक स्थान में पूणं बिम्ब ओर बली, चन्द्र
यदि प्रत्येक ग्रहों से देखा जाता हो तो राजयोग कारक है अर्थात् इस योग में
जन्म हो तो राजा हो । I š
३ संगल-अपने बार में, अपने नवांश द्रेष्काण आदि अपने वर्ग में, मोन, वृचिक, कुम्भ,
मकर और मेष राशि में, रात्रि में, वक्रता पर, दक्षिण दिशा में राशि के आदि
में बली होता है । दशम भाव में ककं में रहने पर सुख देता है ।
४ बुघ--कन्या और मिथुन राशि में, अपने दिन में, अपने वर्ग में, घनुष राशि में रविवार
के अतिरिक्त दिन रात ( सवंदा ) और उत्तरायण में बली होता हैं। यदि
राशि के मध्य का होकर लग्न में हो तो सदा यश और बल देता है ।
५ गुरु---मीन, वृश्चिक, घन, कर्के राशि में, अपने वर्ग ओर अपने बार में, मध्य दिन में,
उत्तरायण में, राशि के मध्य में, कुम्भ राशि में बली होता है, नीच में भी
यदि लर्न, चतुर्थ ओर दशम भाव में हो तो बहुत घन देता है ।
६ शुक्र--उच्च राशि ( मीन ) अपने वर्ग तथा वार में, राशि के मध्य में षष्ठ, द्वादश,
तृतीय और चतुथं स्थान में, अपराह्न में, युद्ध के समय, चन्द्र के साथ रहने
वर वक्री होने पर, यदि सूर्य के आगे रहे तो शुभ होता है ।
७ शनि-तुला, मकर ओर कुम्भ में, सप्तम भाव में, दक्षिणायन में, अपने द्रेष्काण आदि
तथा अपने वार ( शनिवार ) में, राशि के अंत में, संग्राम में बली होता है
यदि कृष्ण पक्ष में वक्री हो तो समस्त राशि में बलवान् होता है ।
८ राहु--मेष, वृष, कुम्भ, कन्या, वृश्चिक ओर कक में, दशम स्थान ñ!
९ केतु--मीन, वृष तथा धनु में, रात्रि में, उत्पात में, केतु उदय में चलो होता है।
ऊपर बताये प्रकार के ग्रह के वल हैं परन्तु भाव फल आदि के प्रभाव से इनमें
अन्तर पड़ जाता है। इस कारण भाव में, योग में, दशा फल में उनके सब फल प्राप्त
नहीं होते ।
५२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
१ रुद्र प्रह निख्यण--( १ ) लग्न और सप्तम स्थान से जो अष्टम स्थान के स्वाभी हों
उन दोनों में जो बली हो वह रुद्र ग्रह Š ।
( २ ) इन दोनों अष्टमेशों में दुब भी पाप ग्रह से देखा जाता हो तो वह रुद्र
ग्रह कहलाता है ।
( ३.) बलवान् रुद्र ग्रह की दृष्टि हो तो अल्पायु होती है ।
२ महेश्वर ग्रह--( १ ) आत्म कारक से अष्टम स्थान का स्वामी महेश्वर ग्रह है ।
(२) यदि आत्म कारक अपने उच्च या स्वगृह में हो तो आत्मकारक से
द्वादश और अष्टमेश इन दोनों में जो बली हो वही महेश्वर ग्रह होता है |
( ३ ) यदि राहु या केतु से आत्मकारक युक्त हो या आत्मकारक से अष्टम
घर में राहु या केतु हो उनसे अष्टमेश और द्वादशेश इन दोनों में जो बली हो
वही महेश्वर होता है ।
३ ब्रह्म प्रह--( १ ) लग्न और सप्तम इन दोनों में जो बली हो उससे षष्ठेश, अष्टमेश
और द्वादशेश इन तीनों में जो बली हो वह लग्न और सप्तमें जो वली
हो उसके पृष्ठ राशि में स्थित होकर विषम राशि में हो तो वह ब्रह्म ग्रह
कहलाता हे ।
पृष्ठ--सप्तम भाव के भोग्यांश से लान के भुक्तांश तक लग्न का पृष्ठ और
लग्न के मोग्यांश से सप्तम के मुक्तांश तक सप्तम का पृष्ठ समझना ।
४ ब्रह्मा प्रह--( १ ) शनि और राहु या केतु को ब्रह्मत्व प्राप्त हो तो उससे षष्ठेश
ब्रह्मा समान होता है ।
( २) यदि एक से अधिक ग्रह में ब्रह्मत्व प्राप्त हो तो उनमें अधिक अंश वाला
ब्रह्मा होगा ।
( ३ ) राहु का योग होने पर बिपरीत ब्रह्मा ग्रह होता है अर्थात् सबमें अल्प
अंश वाला ग्रह ब्रह्मा होता है ।
(८) एवं मल्पकारक से अष्टमेश और अष्टम स्थान में स्थित ग्रह भी ब्रह्मा होता है।
( ५ ) जहाँ विवाद हो तो सबसे बली ग्रह ब्रह्मा होता है ।
५ आरोही प्रह-3च्च की ओर जाने वाला ग्रह--शुभदायक है ।
( उच्च अभिलाषी ग्रह )
६ अवरोहो ग्रह--नोचे को ओर जाने वाला ग्रह--अशुभ कारक है ।
जैसे सूयं मीन पर, चन्द्र मेष में, मंगल घन में, बुध सिह में, गुरु मिथुन में,
शुक्र कुम्भ में, शनि इन्या में उच्चाभिळाषी होता है अर्थात् आगे बढ्ने पर वह
उच्च राशि में चला जायगा ।
फल - उच्चाभिलाषी ग्रह से राज पुज्य और अपने वंश में राजा समान होता है । इसके
बिपरीत फल नीच की ओर जाने वाले ग्रह का होता है ।
ग्रह, उनके नाम और गुण-धर्म : ५३
लग्न से भो आरोहो अवरोहो का इस प्रकार विचार होता है ।
आरोही --कोई ग्रह या लग्न १५० पहुँचने तक आरोही,
अवरोही-इसके पश्चात अवरोही कहलाता है ।
दुःस्थ ग्रह---अस्त, नीच राशि का या अंश में, शत्रु स्थानी या ६-८-१२ घर का ग्रह ।
सुस्थ ग्रह--चन्द्र १२, ११, १, ६, या ऽवं घर में ।
पीड़ित ग्रह--प्रह युद्ध में पराजित ग्रह, केतु से घुमिल ग्रह, उल्कापात वाला ग्रह, सूर्य
चन्द्रमा-पाप युक्त या ग्रहण से युक्त ।
सूयं ग्रस्त-सुयं अमावस्या के दिन राहु केतु युक्त हो तो ग्रस्त कहलाता हूँ ।
उत्तमांश--मूल त्रिकोण, स्वोच्च ( परमोच्च ) स्वक्षेत्री और केन्द्र में ।
ग्रह युवत या दृष्ठ---किंसी ग्रह से युक्त हो या किसी ग्रह से दुष्ट हो ।
ग्रह युक्त या एकत्र-ग्रहो के एक राशि पर होने से यह नहो होता, लगभग एक से उनके
अंश हों तो प्रभाव शील फड होता हे ।
दृष्टि--दृष्टि में अंश लगभग समान हों या दीप्तांश के भीतर हों जैसे मेष के ७° पर
चन्द्र हो और उस पर शनि को दृष्टि हो शनि तुला राशि के ७° के लगभग
हो तब उसकी दृष्टि संमझी जायगी । यदि शनि तुला के २५० पर हो तो उस
दृष्टि का प्रभाव नहों होगा ।
कर्तरी प्रह-शुभ ग्रह के द्वादश और द्वितीय भाव में जब अशुभ ग्रह हो तो उसे अशुभ
कर्तरी योग कहेंगे जिसका फल अनिष्ट कारक होता है।
पाप ग्रह--पाप ग्रहों के स्वस्थान की राशियाँ ।
शुभ प्रहनशुभ ” ” "'
दो शुभ या पापग्रहों के मध्य का स्पष्टीकरण
कोई ग्रह कोई शुभ या पाप ग्रहों के बीच उस समय कहा जाता हैँ जब कि दोनों
ओर ३०० के भीतर कोई ग्रह न हो । जैसे चन्द्र मेष के १२० पर है इसमे दोनों ओर
३०० लेना । मेष के १३वें अंश से वृष के १२वें अंश तक कोई पाप ग्रह नहीं होता यह
आगे का हुआ । इसी प्रकार मोन के १३० से मेष के १२ अंश तक कोई पाप ग्रह नहीं
होता । मान लो चन्द्रमा मीन के १” में और मंगल मेष के ५९ अंश में है दोनों का
अन्तर ५८ अंश हुआ इसी प्रकार शनि मकर के २ अंश पर है जो चन्द्र के पीछे है तो
चन्द्र से ५९ अंश अन्तर पर हुआ । यद्यपि यहाँ चन्द्र दो पाप ग्रहों के बीच में है परन्तु
उन का अन्तर ३० अंश से अधिक हो जाने के कारण बुरा फल नहीं दंगा |
मध्य का अर्थ है दो ग्रहों के बीच में । शुभ ग्रहों के बीच कोई ग्रह हो तो शुभ फल,
पाप ग्रहों के बीच में होने से बुरा फल और एक पाप दूसरा शुभ ग्रह हो तो मिश्र फल
होता है । जैसे चन्द्र के एक ओर गुरु दूसरी ओर शुक्र हो और यह अन्तर ३० अंश के
भीतर हो तो कहा जायगा चन्द्र दो शुभे प्रहों के बीच में 8!
अदाकत ग्रह- चन्द्र के साथ ग्रह हो चाहे वह उच्च में हो, मित्र गृही स्वराशि या
५४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड `
स्वनवांश में हो जब उसकी किरणें दवी हुई हों तो वह अशक्त समझा जाता है ।
स
तारक मारक ग्रह
| मारक ग्रह तारक ग्रह रा सबका [आन र केस जयातु पक नं गर सुक्र वृय के
२ | चन्द्र „ | बुघ, शनि, राहु, केतु » » सूर्यं, मंगल, गुरु, शुक्र
३ | मंगल ,, | शुक्र, शनि, राहु, केतु „ n सूं, चन्द्र, वुध, गुरु
४४| बृष , | चन्द्र, मंगल, गुरु „ n सूर्य, शुक्र, शनि, राहु, केतु
५> गुरु ,, बुध, शुक्र, राहु : , n सूर्य, चन्द्र, do, शनि, केतु
६ | शुक्र ,, | सूर्य, मंगल, गुरु, राहु „ 7 . चन्द्र, बुध, शनि, केतु
७ | शनि ,, | सूर्य, चन्द्र, मंगल | , » वुध, गुरु शुक्र, राहु केतु केतु
ग्रहों के मारक ग्रह
मारक | शनि मंगल | गुरु चन्द्र शुक्र बुध siz
इस प्रकार सब ग्रह एक दूसरे के फल को नष्ट करते है । फल विचारते समय तो
विरोधी बातों का भी विचार करना जैसे शनि अशुभ फलदायी हो और सूर्य शुभ
फलदायी हो तो सूर्य के प्रभाव से शनि का दोष मिट जायगा । इसी प्रकार मारक ग्रह का
विचार करने से ठीक फल मिलता ë 1
अध्याय ४
मैत्री, दृष्टि आदि
शनि से | मंगलसे | गुरुसे | चन्द्र से | शुक्र | बुघसे
नैसगिक मैत्री.
मेत्रो, दृष्टि आदि : ५५
तात्कालिक मंत्री
मित्र-णजहां प्रह कुडलो में हैं उपसे २,३,४, ओर १०,११,१२ वां स्यान । अर्थात् ग्रह के आगे या पीछे ३-३ स्थान मित्र ।
शत्र, --शेष अर्थात् १,५,३,७,८,९ वां स्थान । अर्थात् ग्रह के साथ जो ग्रह हों और उपरोक्त स्थान छोड़कर इतर स्थानों में जो ग्रह हों वे शत्र हैं ।
पंचधा मेत्री
अधिमित्र--मित्र + मित्र | अर्थात् दोनों में मित्र हों तो अधिमित्र,दोनों अघिजत्रु- शत्रु + शत्रु में शत्रु हों तो अधिशत्रु, एक में मित्र मित्र--सम + मित्र दूसरे में शत्रु हो तो सम, एक में सम शत्रु--सम + शत्रु दूसरे मे मित्र हो तो मित्र यदि एक में सम--शत्रु + मित्र सम दूसरे में शत्रु हो तो पंचघा मैत्री में या मित्र + शत्रु "| वह शत्रु लिखा जायगा ।
नैसगिक और तात्कालिक मैत्री का मिश्रण पंचधा मैत्रो होती ë 1
तात्कालिक मैत्री पर विचार
जैसे कोई किसी का मित्र रहने पर भी तात्कालिक कारण वश ऊभी विरोध या समता भाव दिखाता है । इसी प्रकार शत्रू रहने पर भी तात्कालिक कार्य वश मित्र भाव दिखाता है यह तात्कालिक मैत्री है ।परन्तु नैसगिक और तात्कालिक मिल कर पंचधा मैत्री बनती हे । तात्कालिक मैत्री सामयिक है नैसगिक मैत्री स्थाई है । तात्कालिक को अपेक्षा नैसगिक मैत्री का अधिक प्रभाव है ।
मैत्री में अधिमित्र उत्तम मित्र है अच्छा फल देता ë । अधिश्त्र कार्य नाश करता है। नैसगिक शत्रु सदा नाशक्रारी है । तात्कालिक शत्रु समय अनुसार नाश करता š! पंचधा शत्रु बुरा फल देकर हानि करता है ।
नेसगिक मेत्री पर विचार
एक ग्रह की किरणों से दू सरे ग्रह की किरणों को कमीर सहायता पहुंचती है कभी
कभी विरोध प्रगट होता हे । कभी कभी न विरोध और न सहायता प्रगट होतो है अर्थात्
सम भाव प्रगट होता है न मित्र है और न शत्रु ।
सत्याचार्य के मत में मूल त्रिकोण से २-१२, ५-९, ४-८ भाव के स्वामियों को
बल मिलता है अर्थात् उस स्थान के स्वामियों की किरणों से उस मूल त्रिकोण वाले ग्रह
की किरणों को सहायता मिलती ë ।
उक्त बल पाने वाले ग्रह को यदि २ बार सहायता मिल जाती हैँ तो वह उस
मू छ त्रिकोण बाले ग्रह का स्वाभाविक मित्र हो जाता है । एके बार सहायता मिलने
५६ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतीय फलित खण्ड
ग्रह मूलक त्रिकोण
से सम हो जाता है । सहायता न मिलने से शत्रु हो जाता है। परन्तु इसमें विशेषता
यह है कि सूयं राजा और चंद्र रानी है जिनका एक एक हो स्वस्थान है । इनको
एक बार सहायता मिल जाने से मित्र हो जाते हैं जैसे--(१) सूर्य का मूल त्रि
सिंह हैं उससे दुसरे स्थान का स्वामी बुध है, ४का मंगल, २ का गुरु, ८
का गुरु, १२ का चंद्र, सूर्य मेष का उच्च है मेष का स्वामी मंगल है यहाँ मंगळ
और गुरु २ बार आये, चंद्र एक ही बार आया इससे ये सब मित्र हुए यहाँ चंद्र एक ही
बार आने से भित्र हो गया । परन्तु बुध १ बार आया तो सम, हो गया शेष धाचु हो
गये । इसका अधिक स्पष्टीकरण भाग १ में दे दिया है 1
ग्रहों का पाचक बोघक आदि ज्ञान चक्र १ ग्रह चक्र २, स्थान पाचक शादि का
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ग्रह का * बोधक कारक | बेघक | ग्रह से बो.का.बि. स्पष्टीकरण
मंगल शुरु शुक्र | सूर्य ६ ७ ९११ सूयं से छठे स्थान में
२ चंद्र | शुक्र मंगल | शनि | सूर्य | चन्द्र | ५ (९११२ शनि हो तो पाचक,
३ मंगळ | सूर्य | चन्द्र | शनि | बुध [मंगल | २ | १११२ सातवें में मंगल हो तो
४ बुध” | चन्द्र | गुरु | शुक्र [मंगल | बुध | २ | ४ ५ ५ बोबक, नवम में गुरु
५ गुरु | शनि | मंगळ | चन्द्र | सूर्य | गुरु | < | ८ ७१२ हो तो कारक, ११वें
६ शुक्र गुरु | शनि | शुक्र | २ |. ६।१२| ४ स्थानमें शुक्र हो तो
७ शनि गुरु | मंगल | शनि | ३ (११ ६| ७ बेघक होता है।
“ देखो चक्र ३.
मैत्री, दृष्टि आदि : ५७
चक्र ३, पाचक बोघक आदि ज्ञान । चक्र ४, पाचक आदि का स्पष्टीकरण
ग्रह
१
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७ वां|
रक
९ वां|११
| वेधक | रे र
ग. x
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सुर्य से| शनि | मंगल | गुरु | शुक्र |१ सूयं| २ तीसरा पर २| ५। ९|११| रे - वुध से मंग. ० कणी चन्द्र से| शुक्र | मंगल | शनि | सूर्यं (२ चन्द्र २ शुक्र से छठा
होने पर ३| २। ६ | ११ | १२ होता है मंग, सूर्य | चन्द्र | शनि | बुध रिमंगल ० चन्द्र से तीसरा ५ | सूर्य होने पर
«| २| ४ ,५ | बुध |शुक्र से मंगल | वेधक होता है बुघ से| चन्द्र | गुरु | शुक्र | मंगल २ इत्यादि ।
५| s| ¿| ७| १२ | गुरु | ०
गुरु से| शनि | मंगळ | चन्द्र | सूयं
६| R| ६|१२| ४ | शुक्र [चन्द्र ५ शुक्र | बुघ | सूर्यं | गुरु | शनि शनि ३
७| ३|११| ६| ७ | शनि गुरु ६
शनि | शुक्र ' चन्द्र गुरु ` मंगळ,
बोधक पाचक आदि के अनुसार मैत्री
पदक ग्रह === | qç | चन्द्र s= | मंगल, मंगल | बि बुध | पुद गुरु | शुक्र qa | शनि ति
शत्रु | पाचक | पाचक | वेधक | बोधक | पाचक | वेधक |
मित्र | शेष शेष शेष शेष शोष दोष शेष
यह मैत्री नैसगिक मैत्री के अतिरिक्त है । ये भी ग्रहों के बळ विचारने के भिन्न २
जरिये हैं जिससे अच्छा या वुरा फल का विचार होता है।
जैसे शनि सर्य से छठा हो तो उसकी पाचक संज्ञा हो जाती है तब वह पाचक होने
के कारण सूर्य का शत्र, हुआ ।
पाचक आदि संज्ञा अनुसार ग्रहफल
(१) पाचक मित्र संज्ञक हो--मिष्ठान्न, मिष्टपान; श्रेष्ठ वस्त्र, भूषण की प्राप्ति, राज्य लाभ, घन लाभ अति सोल्य, मन म उत्साह बडा सामर्थ्य ।
PSU, --उपरोक्त का विपरीत फल .
५८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड
- पाचक फा स्वाभाविक गुण--भाग्योदय करता है, राज पूज्यत्व, विद्या आनन्द सहित,
सभा में प्रवेश करना । परन्तु मित्र होने से उक्त फल देता है । शत्रु होने से
. इसके विपरीत फल करता है । बली हो तो विपरीत तो नहीं करता परन्तु
उक्त फलं कम करता है।
(२) बोघक सिन्न--दया तप से प्राप्त अविचारित भाग्प करता š । मित्र होने से
उपरोक्त फल, पूर्ण शत्रु होने से विपरीत फल करता हूँ ।
( ३ ) कारक सित्र--क्रभी भाग्य वृद्धि, कभी भाग्य हानि, कभी स्त्री घन पुत्रों को रोग
- पीड़ा, चोर भय, अग्नि पीड़ा, लोगों में कलह ।
शत्रु-विपरीत फल औरों की तरह नहीं करता विशेषतः चोर भय, अग्नि भय,
बन्धु भय, राजाओं से अति दुःख और पद की च्युति करता ë ।
( ४ ) बोधक सित्र--विदेश गमन, घन नाश करता है ।
शान्रु—उपरोक्त फल अन्यथा करता है ।
पाकेदा मैत्री
फल देने वाला ग्रह पाकेश से ६-८-१२ स्थान में शत्रु । सप्तम में अशुभ होता है ।
१, २, ३, ४, ५, ओर ९-१०-११ स्थानों में मित्र होता हं ।
दृष्टि विचार
सूर्य चंद्र बुघ शुक्र की जो साघारण दृष्टि होती है उसके अतिरिक्त शनि गुरु मंगल
की विशेष दृष्टि होती है ।
. साघारण दृष्टि विशेष दृष्टि ग्रह १ चरण दृष्टि (पाव) ३-१० | पूर्ण दृष्टि सूर्य चन्द्र बुघ शुक्र | २ चरण दृष्टि (अद्ध) | - ५-९ | शनि ३-१०-७ ३ चरण दृष्टि (पौन) ४-८ | मंगल ४-८-७ ४ चरण दृष्टि (पूर्ण) ७ | गुरु ५-९-७
अर्थात् ग्रह अपने स्थान से गिनने पर ३-१० स्थान पर एक पाद दृष्टि से देखता
है । सप्तम स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता ६ इत्यादि ।
१, २, ६, ११, ओर १२ वें स्थान पर ग्रहों की दृष्टि नहीं होती है। एक चरण दृष्टि का ५ विश्वा बल होता है, पूर्ण दृष्टिम २० विश्वा बल होता है । पूर्ण दृष्टि ६०” कला की मानी जाती है ।
MR नतान्तर FE SHR UN I PIS Me: ग्रह पाद दृष्टि | अद्ध दृष्टि | पोन दृष्टि | पुर्ण दृष्टि | यह मत सूयं चन्द्र बुघ ३-१० ५-९ ४-८ ७ जातकाभरण दानि ५-९ ४-८ ७ ३-१० | मान सागरी मंगल ७ ३-१० ५-९ ४-८ आदि का है — गुरु i Luya ४-८ a s SOS ७ CS पु...
मैत्रो, दृष्टि आदि : ५९,
कुछ का मत है कि शनि मंगळ गुरु की सप्तम स्थान में दृष्टि नहों होती परन्तु यह उनकी भूल है । होरारत्न आदि में स्पष्ट लिखा Š कि सप्तम स्थान पर भी इनकी दृष्टि होती है ।
केतु को बहुमत से अंधा माना है इसमे उसकी दृष्टि नहीं होती पर कुछ लोगों ने कहा है कि केतु को भो दृष्टि होतो है । राहु के समान केतु की भो दृष्टि मानते हैं और
कुछ योगों में केतु को दृष्टि का वर्णन किया है 1
040011: पाद दृष्टि | अद्धं दृष्टि | पौन दृष्टि | पूर्ण दृष्टि को ` राहु की ३-६ २-१० | अपने घरमें ५ १,११ घरमें अन्यमत-राहु ७ ३,६,४,८ | २१९ ५,७,९,१२ दृष्टि नहों होती
ग्रहों के दीप्तांश
दीप्तांश का अर्थ यह् है कि उस ग्रह की ज्योति का घेरा कितने अंश तक प्रभाव कारक है । ग्रह के आगे या पीछे इतने अंश तक द्रष्टा ग्रह का विचार करना ।
जब दीप्तांश के भीतर किसी ग्रह की दृष्टि हो तो उस पूर्ण दृष्टि का पूर्ण फल
मिलता है।
ग्रहों की सप्तम स्थान पर दृष्टि बताई है । जैसे किसी टाचे का प्रकाश किसी पदाथ
पर डाळे तो उसका जितना प्रकाश का फैलाव होगा उस पर सन्मुख तोत्र प्रकाश पडेगा
आजू बाजू अल्प प्रकाश होकर पश्चात पूणं अन्धकार दिखता हुं इसी प्रकार फोकस के कुछ
अन्तर आजू बाजू कुछ थोड़ा अवश्य प्रकाश देता है उस का विचार दीप्तांश qaw
समझना ।
जैसे मंगल यदि मेष के ४ अंश पर और शनि तुला के २८ अंश पर है तब साधारण
नियम के अनुसार मंगल शनि को पूर्ण दृष्टि से देखता हे । परन्तु सुक्ष्म रूप से विचार
करो तो मेष के ४ अंश से तुला के ४ अंश तक सप्तम स्थान हुआ पर शनि तुला के २८
अंश पर होने से २४ अंश अधिक पर है । यहाँ मंगल की पूर्ण ज्योति अर्थात् दृष्टि तुला _
के ४ अंश पर पड़ती है । मंगल का दोप्तांश ४ अंश है यदि शनि तुला के ८ अंश पर
भी हो तो मंगलकी पूर्ण दृष्टि समझी जायेगी । छाया मात्र ही होने से पूर्ण दृष्टि का
प्रभाव नहीं रहेगा फल की छाया मात्र हो मिलेगी ।
६० : ज्योतिश-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अंश ० रर
ग्रहो की साधारण दृष्टि का चक्र १
राशियाँ < 20 — ०“० í७G
. ००० ० ०७०
अंश ११
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` ढ नि &<. X m ०७
॥ २
१६ १७
४४॥ ४४
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५९॥ ५९
४४) ४४
२९॥ २९
१४। १४
° °
° °
१२ १३
° °
१॥ २
१८ १९
४३॥ ४३
२७ २६
६ ८
पटा ५८
४३॥ ४३
२८॥ २८
१३॥ १३
० 0
१४ १५
२० २१
४२॥ ४२
२५ २४
१० १२
५७। ५७
४२॥ ४२
२७॥ २७
१२॥ १२
° 0
१६ १७
° 0
३॥ ४
२२ २३
४१॥ ४१
२३ २२
१४ १६
५६॥ ५६
४१॥ ४१
२६॥ २६
११॥ ११
० °
१८ १९
४०॥
२१ (१८
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४०
र्ष
१०॥
०
२०
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राशियाँ
राशियाँ
राशियां
राशियां
मैत्रो, दृष्टि आदि : <t
अंश २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९
° ° 6 o ° 0 0 ° °
१०॥ ११ ११॥ १२ १२॥ १३ १३॥ १४ १४॥
३६ ३७ ३८ ३९ ४० ४१ ४२ ४३ ४४
३४। ३४ ३३॥ ३३ ३२॥ ३२ ३१॥ ३१ ३०॥
sin Con aR ern al CSS क
४२.४४ ४६ ४८ ५० ५२ ५४ ५६ ५८ *
४९॥ ४९ ४८ ४८ ४७॥ ४७ ४६॥ ४६ ४५
३४। ३४ 3300 ३३ ३२॥ ३२ ३१॥ ३१ ३०॥
१९॥ १९ १८। १८ १७॥ १७ १६॥ १६ १५॥
Yu w २३ हे रा २ १॥ HN
१० ० ° ° ० ० ८] ० ० °
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११ ० ० ० ० ० ० ० ० ०
मंगल की विशेष दृष्टि का चक्र २
अंश ० १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १३ १४
२ १५ १६॥१८ १९॥२१ २२॥२४ २५॥२७ २८॥३० ३१॥३३ ३४॥ ३६
३ ६० ५९ ५८ ५७ ५६ ५५ ५४ ५३ ५२ ५१ ५० ४९ ४८ ४७ ४६
६ ६० ६० ६० ६० ६० ६० ६० ६० ६० ६० ६० ६० ६० ६० ६०
७ ६० ५९ ५८ ५६ ५७ ५५ ५४ ५३ ५२ ५१ ५० ४९ ४८ ४७ ४६
अश १५ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९
Q ३७॥३९ ४०॥४२ ४३॥४५ ४६॥४८ ४९॥५१ ५२॥५४ ५५॥५७ ५८॥
३ ४५ ४४ ४३ ४२ ४१ ४० ३९ ३८ ३७ ३६ ३५ ३४ ३३ ३२ ३१
६ ६० ६० ६० ६० ६० ६० ६० ६० ६० ६० ६० ६० ६० ६० ६०
७ ४५ ४४ ४३ ४२ ४१ ४० ३९ ३८ ३७ ३६ ३५ ३४ ३३ ३२ ३१
गुरु की विशेष दृष्टि का चक्र ३
अंश ० १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १३ १४
३ ४५ ४५४६ ४६॥४७ ४७४८ ४८1४९ ४९॥५० ५०॥५१ ५१॥५२
४ ६० ५८ ५६ ५४ ५२ ५० ४८ ४६ ४४ ४२ ४० ३८ ३६ ३४ ३२
७ ४५ ४५४६ ४६॥४७ ४७४८ ४८४९ ४९॥५० ५०५१ ५१॥५२
८ ६० ५८॥५७ ५५॥५४ ५रा५१ ४९॥४८ ४६।४५ ४२४२ ४०॥२३९
६२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अंश १५ १६ १७ १८ :९ २० २ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९
३ ५२॥५३ ५३॥प४ ५४५५ ५५1५६ ५६॥५७ ५७५८ पटा५९ ५९॥
४ ३० २८ २६ २४ २२ २०-१८ १६ १४ १२ १०. ८ ६ ४ २
७ ५२॥५३ ५३॥।५४ ५४५५ ५५॥५६ ५६॥५७ ५७५८ ५८॥५९ ५९॥
८ ३७३६ ३४३३ ३१॥३० २८२७ २५॥२४ २२॥२१ १९॥८८ १६॥
शनि की विशेष दृष्टि का चक्र ४
अंश ० १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १३ १४
१० रे ४ ६ ८ १० १२ १४ १६ १८ २० २२ २४ २६ २८
२ <o ५९॥५९ पटा५८ ५७१५७ ५६॥५६ ५५५५ ५४॥५४ ५३॥५३
८ ३० ३१ ३२ ३३ ३४ ३५ ६६ ३७ ३८ ३९ ४० ४१ ४२ ४३ ४४
९ ६० ५८ ५६ ५४ ५२ ५० ४८ ४६ ४४ ४२ ४० ३८ ३६ ३४ ३२
अंश १५ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८ २९
Ë १ ३० ३२ ३४ ३६ ३८ ४० ४२ ४४ ४६ ४८ ५० ५२ ५४ ५६ ५८
राशियां
राशियाँ
२ ५२॥५२ ५१॥५१ ५०॥५० ४९॥४९ ४८।४८ ४७॥।४७ ४६॥४६ ४५॥
८ ४५ ४६ ४७ ४८ ४९ ५० ५१ ५२ ५६ ५४ ५५. ५३ ५७ ५८ ५९
९ ३० २८ २६ २४ २२ २० १८ १६ १४ १२ १० ८ ६ ४ २
दृष्टि चक्र से ग्रहों की दृष्टि साधन करने की रीति
द्रष्टा-जो ग्रह देखता ë ।
दृष्य-जिस ग्रह पर दृष्टि qz रही है या जिस पर दृष्टि जाननी है ।
(दृश्य-दृष्ट)-शेष अन्तर राशि अंश आदि में बाई ओर खड़े कोठे में राशियाँ दी हैं
मर सबसे ऊपर अंश दिये हैं। जिस ग्रह पर दृष्टि निकालनी है उसके ग्रह स्पष्ट में से
द्रष्टा ग्रह ( जिस को दृष्टि जाननी है ) का स्पष्ट घटाना जो अन्तर राशि अंश कला आदि में आवे उस अन्तर से यहाँ दिये चक्र से दृष्टि खोजना । साधारण ग्रह की दृष्टि चक्र १ में खोजना । मंगल की विशेष दृष्टि चक्र २ से, गुरु की चक्र ३ से, शनि की चक्र Y से खोजना ।
राशि जो अन्तर से प्राप्त हो खडे कोठे में खोजना और अंश ऊपर दिये हैं उन दोनों के सीघ में दिया दृष्टि का अंक कळा विकला में है वह लेना । इस प्रकार राशि और अंश
की दृष्टि तो निकल गई अब कलादि की और चाहिए । तो अन्तर के नीचे दिया प्राप्त अंक और उसके आगे दिये अंश के अंक का अन्तर निकालना । आगे का अंक कम हो तो
यह अन्तर ऋण होगा अधिक हो तो घन होगा । यह अन्तर आंघा एक या दो के लगभग होगा । शेष कला विकला के अंक में बह अन्तर अंक का गुणा करने और ६० का भाग देने से वही अंक विकला में आयर्गा। इससे ६० में भाग देने को आवश्यकता नहीं है ।
मैत्री, दुष्टि आदि : ६३
अन्तर के गुणन फळ को विकला मानो उसे पूर्व प्राप्त उत्तर में अत्तर + के अनुसार जोड़ना या घटाना तो स्पष्ट दृष्टि कला विकला में प्राप्त हो जायगी । उदाहरण --मंगल की दृष्टि निकालनी है
ç रा रा (१) दृष्य गुक्र-११-१३०-३३'-४८० अन्तर ४-१०- २९” द्रष्टा मंगल ७-११-२९-४४ _(चक्र चक् १ १ से)े) ४-१ ४-१० = २८ २८ कम कम _
अन्तर-४-१-४-४ अन्तर-१ ऋण ." दृष्टि २८-५५१-५६" (आगे का कम होने से )
देषकला ४-४ x १ = ४-४?
पूवंप्राप्प २९"-०
॥ 00 1
= २८५५-५६ दृष्टि
| रा
(२) दृश्य सूयं ११-५-४३-४५ अन्वर ३-२३०-४७"'
दृष्टा मंगल ७-१२-२९-४४ (चक्र २ से) ३-२४- ३६ कम
अन्तर--३-२३-११-१ अन्तर-१ ऋण
शेष कला ११-१ > १ = ११-१7
पूर्व प्राप्त २७'-०”
-११-१
„. दृष्टि ३६-४८” , दृष्टि - ३६-४८-५९
यहाँ मंगल की विशेष दृष्टि चक्र हैँ राशि में ३ मिल गया इससे प्रकट हुआ कि
` विशेष दृष्टि है । इसके अंक मंगल को विशेष दृष्टि चक्र २ से लिये हैं । परन्तु पहिले
उदाहरण में शेष ४ था मंगल को विशेष दृष्टि चक्र २ में ४ राशि नहों थी । इस से
प्रगट हुआ क्रि मंगल की साघारण दृष्टि है इससे अंक साधारण दृष्टि चक्र १ से लिये
गये थे ।
यदि राशि घटाने से नहीं घटे तो ऊपर १२ राशि जोड़ कर घटाना ।
६४ : ज्योतिष-शिक्षा तुतीय फलित खण्ड
जा
अंशों के विचार से दृष्टि का विचार और दृष्टि योग
ग्रहों का अन्तर दुष्टि योगों के नाम राशि - अंश 3
चिह्न | प्रभाव
अष्टमाँरा) x ॥ -४५ (पाउ | अशुभ s २ | चरिरेकादश (द्रिराश्यन्तर) Rise क ह ३ सदर (बतुंलपाद) ३ -९० = भतिभशुभ ४ | त्रिकोण (नवम-पंचम) TRON š: अतिणुभ ५ | साद्ध चतुष्टय राव्यंतर Yu ~ १३५ | बा858-- गशुभ
< पड़ाष्ट्रक ५ -?१५० «या यात्र अशुभ ७ क्र याचा ५ - १८० | ८? अशुभ ८ | युति दृष्टियोग (युति-योग) ° —° तिकर्ता-
९ एक राश्यन्तर युति यु ना १२ - ३६ ! क्या s Š š ५
१० | चक्र दशमांश २-२. ७२ L sh
५
११ | चक्र पंचमांश Y š डॅड ९ जन
१२ | चक i जब नाडी वृत्त | + करे साद्धे द्वितीयांश
१३ | सम क्रांति
से
अन्तर
बराबर
पर
क्रांति
हो | P
É
फल
पाएचात्य विचार से अंशों के अंतर पर से इन दृष्टि योगों के नाम बताये हैं और
राशि के अनुसार फल का बिचार होता है ।
चर स्थिर आदि के अनुसार दृष्टि का विचार
चर राशि अपने से द्वितीय स्थान को छोड़कर सब स्थिर को देखती ë Ú स्थित ,, ,,
स्थिर ” बारहवें 121 17 चर 17 1) 0) द्विस्वभाव ,, अपने को छोड़कर शेष सब द्विस्वमाव को देखता है
जहां ग्रह हो उससे २-६-११ स्थान पर दृष्टि नहीं होती
जैमिनि सूत्र आदि में दृष्टि विषयक
यह विलक्षणता दृष्टि की बतलाई हूँ ।
एक राशि का दूसरी राशि पर दृष्टि
का यह अभिप्राय है उन राशियों में ग्रह
रहने में ग्रहों को भी दृष्टि उसो के
अनुसार होती हे । जैसे मेष की दृष्टि
सिंह बृक्चिक और कुंभ पर पडतो है ।
यदि मेष पर कोई ग्रह हो तो कहा
जायगा उस ग्रह की दृष्टि सिंह वृश्चिक कुंभ तथा इन राशियों म स्थित ग्रहों पर
पड़ती है ।
मैत्री, दृष्टि आदि : ६५
द्रष्टा राशि ११ २| ३| ४ |५| ६ ७ | ८ | ९।१०।११ | १२
दृश्य स्थान जिन ५| ४| ६|२|१| ९ ११ १०१२|२|१|३
पर दृष्ट <| ७ ९ (११ | १० १२ २ ५|४| ६
पड़ती ë ११ १० १२ ८ ७ 3 प् ८1६1९
उदय अस्त दो प्रकार का है
( १ ) नित्य ग्रहों का उदय अस्त होना
(२) सूर्य के समीप रहने से ग्रह का अस्त होना, दूर जाने पर उदय होना 1 संध्या--सूयं बिम्त्र के आधा अस्त होने से १। घड़ी पहिले और १॥ घड़ी बाद तक । दैनिक उदय --स्र्य से थोड़ी गति वाले ग्रह अर्थात् मंद गति वाले ग्रह जेते मंगल, गुरु, शनि, ये सूयं से कालांश तुल्य अंतर रहने पर पूर्व दिशा में रात्रि दोष में
उदय होते हैं ।
सूर्य से अधिक गति वाला ग्रह चन्द्र है वह सूयं से अपने कालांश तुल्य अधिक होने पर
पश्चिम दिशा में संध्या को उदय होता है ।
दैनिक अस्त-पूर्य से अल्प गति वाले ग्रह जैसे मंगल, गुरु, शनि ये सूयं से स्वकालांश तुल्य
अधिक अंश पर पश्चिम दिशा में अस्त होते हैं ॥ अधिक गति वाला चन्द्र कालांश
तुल्य सूर्य से अल्प रहते पूवं दिशा में अस्त होता है ।
बुध शुक्र के लिये विशेष वात यह है कि सूर्य से अधिक गति वाले होने पर भो दोनों
दिशाओं में पूर्व या पश्चिम में उदय या अस्त होते हैं | क्योंकि ये दोनों ग्रह वक्र होकर
फिर सूर्यं के अपने कालांश अंतर पर आ जाने से अस्तोदय प्राप्त करते हैं । अर्थात दोनों
ग्रह सूयं से अधिक गति वाले होने से पश्चिम में सूर्य फे आगे कालांद अंतर पर संध्या
को उदय होते हैं । फिर वक्र होकर सूर्यासन्न आकर पश्चिम में हो अस्त होते हैं । फिर
वक्र की गति से ही सूयं के पीछे होकर अपने कालांश अंतर पर पूर्व की ओर रात्रि शेष में
उदय पाते हैं फिर मार्गी होकर पूर्व में हो अस्त होते हैं 1
ग्रहों के अस्त के कालांश
सूर्य से इतने अंशो के भीतर ग्रह आ जाने से ग्रह अस्त समझा जाता है ।
= | मंगल गुरु शनि | बुध जुक्र वक्रो हो तो
कालांश १७ कालांश १ घटाकर लेना
"डदित--इतने अंश से सूर्य से अधिक अंतर पर ग्रह चला जाय तब वह उदित समझा
जाता है ।
अस्तंगत--सू्यं के उपरोक्त अंशों के भीतर ग्रह आ जाता है तब ग्रह का प्रकाश सूर्य के
प्रकाश से दब जाता है तब वह अस्तंगत या अस्त कहलाता है ।
ग्रह अस्त हो तो बुरा फल देता है । सूर्य के समीप ग्रह रहने से विकल कहलाता है ।
ग्रह अस्त हो जाने पर उसकी किरण नहों रहती । निंबंल हो जाता है ।
५
६६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
न्द्र भी अमावस्या को सूयं से १०° के भीतर आ जाने से सूर्य के समीप होने से
नहीं दिखता शक्तिहीन हो जाता है उसकी कोई किरण नहीं रहती । तब बुरा फल
देता है ।
राहु फेतु--ये अस्त नहीं होते परन्तु ये सूय के समीप हों तो सूर्य के प्रभाव की शवित में
बाघा डालते हैं । इसी से कहते हैं सूर्य को ग्रस लिया ।
बाकी ग्रह सूर्य के आस पास रहने से अस्त कहे जाते हैं ।
चन्द्र मूढ ( अस्त )-चन्द्र अस्त में होकर पाप ग्रहों में हो या नोच राशि या नीच नवांश
का हो तो पाप घर में अस्त चन्द्र मूढ़ Š ।
अस्त ग्रह निल होता है, नीच का ग्रह और निर्बल होकर आगे फल कम
देता है। चत्रु दोत्री ग्रह के फल में बहुत कमी हो जाती है । वक्री ग्रह भी
फल कम करता है ।
ग्रहों की गति
वक्ती १ वक्र-उल्टी गति अर्थात् आगे बढ्ने की अपेक्षा पीछे छोटे
रअनुवक्र `
३ कुटिल ( विकल )-रुकी हुई गति
छजु गति ४ मंद
५ मंदतर-घटती हुई सीधी गति, मध्यम गति से अल्प गति
इसम- ,, „ मध्यगति" s
७ शीघ्र- ,, » मध्यगति से अधिक गति š
८ शीघ्रतर-बढ़ी हुई सीधीगति मध्यम गति से अधिक गति
ऋजु गति-मार्गी गति, ग्रह जब वक्रगति त्याग कर सीधा चलने लगे ।
सूर्य चन्द्र वक्री नहो होते शेष पंच तारा वक्री होते हुँ । राहु केतु सदा
वक्री हैं ।
उदप ग्रह-सुख देता हे क्रूर ग्रह वक्री-फल बड़ा क्रूर
वक्री ग्रह-परदेण भेजता है शुभ ग्रह वक्री-शुभ फल
मार्गी ग्रह-आरोग्य देता है ग्रह वक्री मॅ-वलवान्
अस्तग्रह-आदर भोर धन नाश ` » मार्गी मॅ-कमजोर
करता है । ;
कुच स्तंभ ( स्तंभन )-वक्रगति में जत्र अधिक मंद गति हो जाती है अर्थात् ग्रह का
स्तंभन सा हो जातः है जिससे उस राशि पर वह बहुत दिन तक रहता है ।
उसे कुच स्तंभ करते हैं। परन्तु मंगळ के सम्बन्ध में ही कुच स्तंभ या कुज
रतंभ कहते हैं शेष ग्रहों को स्तंभन कहते हैं ।
मंगल कुचत्तंम फड —q वर्ष प्रजा का बहुत नाश होता है, युद्ध होता है, घान्य को
मैत्री, दुप्टि आदि : ६७
मंहगी हो, अग्नि मय, नाना प्रकार के उत्पात, महामारी का उपद्रव, वच्चे
या पशुओं में महामारी हो ।
मनुष्य या गांव की राशिमें कुच स्तंभ हो तो बुरा फल होता है 1
संगल--३, ६, १०, ११, राशि में कुचस्तंभ--उत्तम फल ।
२, ५, ७, 5 „ “मध्यम ,,
१,८, ४,१२ y: ४ “बुरा फल ।
ससागस--जब कोई ग्रह चन्द्र के साथ हो ।
अतिचर--गति फम होने से जो समय खो गया है उसे पूरा करने के लिए जव ग्रह शीघ्र
आगे बढ्ता है ।
राशि अंत ग्रह-ग्रह जो दूसरी राशि में एक ही दिन में जाने वाला हो या ग्रह नवम
नवांश में हो तो राशि के अन्त में रहना कहा जाता है ।
सूर्य के प्रभाव से ग्रह की शीघ्र मंद गति
१ शीघ्र गति- सूर्य के दूसरे स्थान में ग्रह
२ सम गति-- „ तीसरे ,, 5
3 मंद गति-- ” चौथे ” ”
४ कुछ qm व वक्र ,, पट ,, #
५ अति qm गति ,, ७-८ ,, P.
६ कुटिल गति-- 1” ९ 11 1”
७ मार्गी ,,-- ही I रि
८ शीघ्री ,— 12 RUB P
s अति शीघ्र गति-- ,, १२ ।, Í
ग्रह उदय अस्त लग्नानुसार
१ लग्न से दूसरे स्थान में ग्रह-उदय हे ते को तत्पर
२ ,, अष्टम,, 121 अस्त ,, ”
३ ,, सप्तम ,, „~ अस्त होने को अभिमुख
४ ., षष्ठ ,, „अस्त के सन्मुख
ग्रहों का बल विचार
स्थान बल, दिग्बल, कालबल, चेष्टावल, निसगंबल, दुष्टिबळ इस प्रकार से
६ प्रकार के बल हैं । जिनका निकालना द्वितीय गणित खंडमें बताया जा
चुका है । यहां तो उस बल का संक्षिप्त वर्णन ë
(१) स्थान बल-अपने उच्च राशि, स्वराशि, मूल त्रिकोण, मित्र राशि, स्वनवांश, स्व
द्रेष्काण, स्व द्वादशांश, स्वत्रिशांश, स्व षोइशांश आदि स्व वर्ग में ग्रह स्थानबल पाता है । पारिजात वैशेषिक्र आदि वगं, आरोही वीर्ये ( भाव तुल्य )
में एवं अष्टकवर्ग में ४ से अमिक शुम रेखा पानेवाळे ग्रह शुभ समझे
जाते हैं ।