भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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५२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

१ रुद्र प्रह निख्यण--( १ ) लग्न और सप्तम स्थान से जो अष्टम स्थान के स्वाभी हों

उन दोनों में जो बली हो वह रुद्र ग्रह Š ।

( २ ) इन दोनों अष्टमेशों में दुब भी पाप ग्रह से देखा जाता हो तो वह रुद्र

ग्रह कहलाता है ।

( ३.) बलवान्‌ रुद्र ग्रह की दृष्टि हो तो अल्पायु होती है ।

२ महेश्वर ग्रह--( १ ) आत्म कारक से अष्टम स्थान का स्वामी महेश्वर ग्रह है ।

(२) यदि आत्म कारक अपने उच्च या स्वगृह में हो तो आत्मकारक से

द्वादश और अष्टमेश इन दोनों में जो बली हो वही महेश्वर ग्रह होता है |

( ३ ) यदि राहु या केतु से आत्मकारक युक्त हो या आत्मकारक से अष्टम

घर में राहु या केतु हो उनसे अष्टमेश और द्वादशेश इन दोनों में जो बली हो

वही महेश्वर होता है ।

३ ब्रह्म प्रह--( १ ) लग्न और सप्तम इन दोनों में जो बली हो उससे षष्ठेश, अष्टमेश

और द्वादशेश इन तीनों में जो बली हो वह लग्न और सप्तमें जो वली

हो उसके पृष्ठ राशि में स्थित होकर विषम राशि में हो तो वह ब्रह्म ग्रह

कहलाता हे ।

पृष्ठ--सप्तम भाव के भोग्यांश से लान के भुक्तांश तक लग्न का पृष्ठ और

लग्न के मोग्यांश से सप्तम के मुक्तांश तक सप्तम का पृष्ठ समझना ।

४ ब्रह्मा प्रह--( १ ) शनि और राहु या केतु को ब्रह्मत्व प्राप्त हो तो उससे षष्ठेश

ब्रह्मा समान होता है ।

( २) यदि एक से अधिक ग्रह में ब्रह्मत्व प्राप्त हो तो उनमें अधिक अंश वाला

ब्रह्मा होगा ।

( ३ ) राहु का योग होने पर बिपरीत ब्रह्मा ग्रह होता है अर्थात्‌ सबमें अल्प

अंश वाला ग्रह ब्रह्मा होता है ।

(८) एवं मल्पकारक से अष्टमेश और अष्टम स्थान में स्थित ग्रह भी ब्रह्मा होता है।

( ५ ) जहाँ विवाद हो तो सबसे बली ग्रह ब्रह्मा होता है ।

५ आरोही प्रह-3च्च की ओर जाने वाला ग्रह--शुभदायक है ।

( उच्च अभिलाषी ग्रह )

६ अवरोहो ग्रह--नोचे को ओर जाने वाला ग्रह--अशुभ कारक है ।

जैसे सूयं मीन पर, चन्द्र मेष में, मंगल घन में, बुध सिह में, गुरु मिथुन में,

शुक्र कुम्भ में, शनि इन्या में उच्चाभिळाषी होता है अर्थात्‌ आगे बढ्ने पर वह

उच्च राशि में चला जायगा ।

फल - उच्चाभिलाषी ग्रह से राज पुज्य और अपने वंश में राजा समान होता है । इसके

बिपरीत फल नीच की ओर जाने वाले ग्रह का होता है ।