भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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ग्रह, उनके नाम और गुण-धर्म : ५३

लग्न से भो आरोहो अवरोहो का इस प्रकार विचार होता है ।

आरोही --कोई ग्रह या लग्न १५० पहुँचने तक आरोही,

अवरोही-इसके पश्चात अवरोही कहलाता है ।

दुःस्थ ग्रह---अस्त, नीच राशि का या अंश में, शत्रु स्थानी या ६-८-१२ घर का ग्रह ।

सुस्थ ग्रह--चन्द्र १२, ११, १, ६, या ऽवं घर में ।

पीड़ित ग्रह--प्रह युद्ध में पराजित ग्रह, केतु से घुमिल ग्रह, उल्कापात वाला ग्रह, सूर्य

चन्द्रमा-पाप युक्त या ग्रहण से युक्त ।

सूयं ग्रस्त-सुयं अमावस्या के दिन राहु केतु युक्त हो तो ग्रस्त कहलाता हूँ ।

उत्तमांश--मूल त्रिकोण, स्वोच्च ( परमोच्च ) स्वक्षेत्री और केन्द्र में ।

ग्रह युवत या दृष्ठ---किंसी ग्रह से युक्त हो या किसी ग्रह से दुष्ट हो ।

ग्रह युक्त या एकत्र-ग्रहो के एक राशि पर होने से यह नहो होता, लगभग एक से उनके

अंश हों तो प्रभाव शील फड होता हे ।

दृष्टि--दृष्टि में अंश लगभग समान हों या दीप्तांश के भीतर हों जैसे मेष के ७° पर

चन्द्र हो और उस पर शनि को दृष्टि हो शनि तुला राशि के ७° के लगभग

हो तब उसकी दृष्टि संमझी जायगी । यदि शनि तुला के २५० पर हो तो उस

दृष्टि का प्रभाव नहों होगा ।

कर्तरी प्रह-शुभ ग्रह के द्वादश और द्वितीय भाव में जब अशुभ ग्रह हो तो उसे अशुभ

कर्तरी योग कहेंगे जिसका फल अनिष्ट कारक होता है।

पाप ग्रह--पाप ग्रहों के स्वस्थान की राशियाँ ।

शुभ प्रहनशुभ ” ” "'

दो शुभ या पापग्रहों के मध्य का स्पष्टीकरण

कोई ग्रह कोई शुभ या पाप ग्रहों के बीच उस समय कहा जाता हैँ जब कि दोनों

ओर ३०० के भीतर कोई ग्रह न हो । जैसे चन्द्र मेष के १२० पर है इसमे दोनों ओर

३०० लेना । मेष के १३वें अंश से वृष के १२वें अंश तक कोई पाप ग्रह नहीं होता यह

आगे का हुआ । इसी प्रकार मोन के १३० से मेष के १२ अंश तक कोई पाप ग्रह नहीं

होता । मान लो चन्द्रमा मीन के १” में और मंगल मेष के ५९ अंश में है दोनों का

अन्तर ५८ अंश हुआ इसी प्रकार शनि मकर के २ अंश पर है जो चन्द्र के पीछे है तो

चन्द्र से ५९ अंश अन्तर पर हुआ । यद्यपि यहाँ चन्द्र दो पाप ग्रहों के बीच में है परन्तु

उन का अन्तर ३० अंश से अधिक हो जाने के कारण बुरा फल नहीं दंगा |

मध्य का अर्थ है दो ग्रहों के बीच में । शुभ ग्रहों के बीच कोई ग्रह हो तो शुभ फल,

पाप ग्रहों के बीच में होने से बुरा फल और एक पाप दूसरा शुभ ग्रह हो तो मिश्र फल

होता है । जैसे चन्द्र के एक ओर गुरु दूसरी ओर शुक्र हो और यह अन्तर ३० अंश के

भीतर हो तो कहा जायगा चन्द्र दो शुभे प्रहों के बीच में 8!

अदाकत ग्रह- चन्द्र के साथ ग्रह हो चाहे वह उच्च में हो, मित्र गृही स्वराशि या