भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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मैत्री, दुप्टि आदि : ६७

मंहगी हो, अग्नि मय, नाना प्रकार के उत्पात, महामारी का उपद्रव, वच्चे

या पशुओं में महामारी हो ।

मनुष्य या गांव की राशिमें कुच स्तंभ हो तो बुरा फल होता है 1

संगल--३, ६, १०, ११, राशि में कुचस्तंभ--उत्तम फल ।

२, ५, ७, 5 „ “मध्यम ,,

१,८, ४,१२ y: ४ “बुरा फल ।

ससागस--जब कोई ग्रह चन्द्र के साथ हो ।

अतिचर--गति फम होने से जो समय खो गया है उसे पूरा करने के लिए जव ग्रह शीघ्र

आगे बढ्ता है ।

राशि अंत ग्रह-ग्रह जो दूसरी राशि में एक ही दिन में जाने वाला हो या ग्रह नवम

नवांश में हो तो राशि के अन्त में रहना कहा जाता है ।

सूर्य के प्रभाव से ग्रह की शीघ्र मंद गति

१ शीघ्र गति- सूर्य के दूसरे स्थान में ग्रह

२ सम गति-- „ तीसरे ,, 5

3 मंद गति-- ” चौथे ” ”

४ कुछ qm व वक्र ,, पट ,, #

५ अति qm गति ,, ७-८ ,, P.

६ कुटिल गति-- 1” ९ 11 1”

७ मार्गी ,,-- ही I रि

८ शीघ्री ,— 12 RUB P

s अति शीघ्र गति-- ,, १२ ।, Í

ग्रह उदय अस्त लग्नानुसार

१ लग्न से दूसरे स्थान में ग्रह-उदय हे ते को तत्पर

२ ,, अष्टम,, 121 अस्त ,, ”

३ ,, सप्तम ,, „~ अस्त होने को अभिमुख

४ ., षष्ठ ,, „अस्त के सन्मुख

ग्रहों का बल विचार

स्थान बल, दिग्बल, कालबल, चेष्टावल, निसगंबल, दुष्टिबळ इस प्रकार से

६ प्रकार के बल हैं । जिनका निकालना द्वितीय गणित खंडमें बताया जा

चुका है । यहां तो उस बल का संक्षिप्त वर्णन ë

(१) स्थान बल-अपने उच्च राशि, स्वराशि, मूल त्रिकोण, मित्र राशि, स्वनवांश, स्व

द्रेष्काण, स्व द्वादशांश, स्वत्रिशांश, स्व षोइशांश आदि स्व वर्ग में ग्रह स्थान￾बल पाता है । पारिजात वैशेषिक्र आदि वगं, आरोही वीर्ये ( भाव तुल्य )

में एवं अष्टकवर्ग में ४ से अमिक शुम रेखा पानेवाळे ग्रह शुभ समझे

जाते हैं ।