भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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६६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

न्द्र भी अमावस्या को सूयं से १०° के भीतर आ जाने से सूर्य के समीप होने से

नहीं दिखता शक्तिहीन हो जाता है उसकी कोई किरण नहीं रहती । तब बुरा फल

देता है ।

राहु फेतु--ये अस्त नहीं होते परन्तु ये सूय के समीप हों तो सूर्य के प्रभाव की शवित में

बाघा डालते हैं । इसी से कहते हैं सूर्य को ग्रस लिया ।

बाकी ग्रह सूर्य के आस पास रहने से अस्त कहे जाते हैं ।

चन्द्र मूढ ( अस्त )-चन्द्र अस्त में होकर पाप ग्रहों में हो या नोच राशि या नीच नवांश

का हो तो पाप घर में अस्त चन्द्र मूढ़ Š ।

अस्त ग्रह निल होता है, नीच का ग्रह और निर्बल होकर आगे फल कम

देता है। चत्रु दोत्री ग्रह के फल में बहुत कमी हो जाती है । वक्री ग्रह भी

फल कम करता है ।

ग्रहों की गति

वक्ती १ वक्र-उल्टी गति अर्थात्‌ आगे बढ्ने की अपेक्षा पीछे छोटे

रअनुवक्र `

३ कुटिल ( विकल )-रुकी हुई गति

छजु गति ४ मंद

५ मंदतर-घटती हुई सीधी गति, मध्यम गति से अल्प गति

इसम- ,, „ मध्यगति" s

७ शीघ्र- ,, » मध्यगति से अधिक गति š

८ शीघ्रतर-बढ़ी हुई सीधीगति मध्यम गति से अधिक गति

ऋजु गति-मार्गी गति, ग्रह जब वक्रगति त्याग कर सीधा चलने लगे ।

सूर्य चन्द्र वक्री नहो होते शेष पंच तारा वक्री होते हुँ । राहु केतु सदा

वक्री हैं ।

उदप ग्रह-सुख देता हे क्रूर ग्रह वक्री-फल बड़ा क्रूर

वक्री ग्रह-परदेण भेजता है शुभ ग्रह वक्री-शुभ फल

मार्गी ग्रह-आरोग्य देता है ग्रह वक्री मॅ-वलवान्‌

अस्तग्रह-आदर भोर धन नाश ` » मार्गी मॅ-कमजोर

करता है । ;

कुच स्तंभ ( स्तंभन )-वक्रगति में जत्र अधिक मंद गति हो जाती है अर्थात्‌ ग्रह का

स्तंभन सा हो जातः है जिससे उस राशि पर वह बहुत दिन तक रहता है ।

उसे कुच स्तंभ करते हैं। परन्तु मंगळ के सम्बन्ध में ही कुच स्तंभ या कुज

रतंभ कहते हैं शेष ग्रहों को स्तंभन कहते हैं ।

मंगल कुचत्तंम फड —q वर्ष प्रजा का बहुत नाश होता है, युद्ध होता है, घान्य को