भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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मैत्री, दृष्टि आदि : ६५

द्रष्टा राशि ११ २| ३| ४ |५| ६ ७ | ८ | ९।१०।११ | १२

दृश्य स्थान जिन ५| ४| ६|२|१| ९ ११ १०१२|२|१|३

पर दृष्ट <| ७ ९ (११ | १० १२ २ ५|४| ६

पड़ती ë ११ १० १२ ८ ७ 3 प्‌ ८1६1९

उदय अस्त दो प्रकार का है

( १ ) नित्य ग्रहों का उदय अस्त होना

(२) सूर्य के समीप रहने से ग्रह का अस्त होना, दूर जाने पर उदय होना 1 संध्या--सूयं बिम्त्र के आधा अस्त होने से १। घड़ी पहिले और १॥ घड़ी बाद तक । दैनिक उदय --स्‌र्य से थोड़ी गति वाले ग्रह अर्थात्‌ मंद गति वाले ग्रह जेते मंगल, गुरु, शनि, ये सूयं से कालांश तुल्य अंतर रहने पर पूर्व दिशा में रात्रि दोष में

उदय होते हैं ।

सूर्य से अधिक गति वाला ग्रह चन्द्र है वह सूयं से अपने कालांश तुल्य अधिक होने पर

पश्चिम दिशा में संध्या को उदय होता है ।

दैनिक अस्त-पूर्य से अल्प गति वाले ग्रह जैसे मंगल, गुरु, शनि ये सूयं से स्वकालांश तुल्य

अधिक अंश पर पश्चिम दिशा में अस्त होते हैं ॥ अधिक गति वाला चन्द्र कालांश

तुल्य सूर्य से अल्प रहते पूवं दिशा में अस्त होता है ।

बुध शुक्र के लिये विशेष वात यह है कि सूर्य से अधिक गति वाले होने पर भो दोनों

दिशाओं में पूर्व या पश्चिम में उदय या अस्त होते हैं | क्‍योंकि ये दोनों ग्रह वक्र होकर

फिर सूर्यं के अपने कालांश अंतर पर आ जाने से अस्तोदय प्राप्त करते हैं । अर्थात दोनों

ग्रह सूयं से अधिक गति वाले होने से पश्चिम में सूर्य फे आगे कालांद अंतर पर संध्या

को उदय होते हैं । फिर वक्र होकर सूर्यासन्न आकर पश्चिम में हो अस्त होते हैं । फिर

वक्र की गति से ही सूयं के पीछे होकर अपने कालांश अंतर पर पूर्व की ओर रात्रि शेष में

उदय पाते हैं फिर मार्गी होकर पूर्व में हो अस्त होते हैं 1

ग्रहों के अस्त के कालांश

सूर्य से इतने अंशो के भीतर ग्रह आ जाने से ग्रह अस्त समझा जाता है ।

= | मंगल गुरु शनि | बुध जुक्र वक्रो हो तो

कालांश १७ कालांश १ घटाकर लेना

"डदित--इतने अंश से सूर्य से अधिक अंतर पर ग्रह चला जाय तब वह उदित समझा

जाता है ।

अस्तंगत--सू्यं के उपरोक्त अंशों के भीतर ग्रह आ जाता है तब ग्रह का प्रकाश सूर्य के

प्रकाश से दब जाता है तब वह अस्तंगत या अस्त कहलाता है ।

ग्रह अस्त हो तो बुरा फल देता है । सूर्य के समीप ग्रह रहने से विकल कहलाता है ।

ग्रह अस्त हो जाने पर उसकी किरण नहों रहती । निंबंल हो जाता है ।