भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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७२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

ग्रहों के षडबल का फल

१ स्थान बल-जन्म समय जातक को ५ प्रकार के स्थान बल प्राप्त हों तो अत्यंत ऐश्वयं

ब बल, अधिकार, योग्यता तेज बुद्धि अर्थात्‌ शासकीय विचार से योग्यता, नाना

प्रकार का घन अर्थात्‌ वस्त्र रत्न सुवर्ण, बहुत प्रकार की घातु कोशल अर्थात्‌

कुशलता व चतुराई, गौरव अर्थात सन्मान, नाना प्रकार के घोडा गाडी भादि

वाहन, बडी २ हवेली आदि पृथ्वी अर्थात्‌ खेत व वगीचा, झाइ अमराई, ताछ,

बैहर, राज्य आदि वह ग्रह अपनी दशा व अंतदंशा में निश्‍चय पूर्वक देता है । परन्तु

वह यदि पांचों प्रकार से स्थान बल से पूर्ण हो। यदि २ या ३ प्रकार के स्थान

फेवर हों तो उसी प्रकार स फल होया ।

यदि पांचों प्रकार के स्थान बल से पूणं २ या तोन ग्रह हों तो राजा प्रमाण

से स्थिति प्राप्त करता है ।

भिन्न भिन्न प्रकार के स्थान बल का फल

( १ ) उच्च बल प्राप्त या स्वञच्च मे-पृथ्वी, नाना प्रकार का उत्साह, शौयं, धन,

वाहन, स्त्री, पुत्र, बुघ पूज्य, विद्या, मान, नाना प्रकार का लाभ अपनी दशा में

देता है । :

(२ ) मूल त्रिकोण में-उपरोक्त फल का ३|४ फल ।

(३) स्वक्षेत्र में-स्थिर अंतःकरण करता है, प्रसन्न चित्त करता है, धन, सौख्य, विद्या

यश, प्रीत, महत्त्व, पृथ्वी, लाभ, अपनी दशा में देता है धमं कराता है । संतति

देता है । š

( ४ ) अधिमिन्न-वस्त्र, पृथ्वी, सुगंध पदार्थ, पुत्र, द्रव्य, 93, वाहन भूषण देता हैं,

पुराण श्रवण कराता है ।

(५ ) मित्रक्षेत्र-सोख्य, धैर्य, पृथ्वी, वाहन, विद्या, संतोष, घर्म, वस्त्र, द्रव्य, राज

सम्मान आदि देता ë ।

( ६ ) समक्षेत्री-स्थान से भ्रष्ट करे, वंधु का द्वेष, नोच वृत्ति को उपजीविका, स्वजन

से त्याग, नाना प्रकार के रोग ।

( ७ ) अधिवात्न क्षेत्री-अति दुःख, नाना प्रकार का दुःख, निरंतर प्रवास, विदेशी त्रास,

माता बहिन बंधु नाश, चोर अस्ति से भय ।

( ८) शत्र कषत्री-शत्रु सरीखा फल दे पर थोड़ा देवे, त्र क्षेत्री ग्रह निबंल ही

जाता है ।

( ९ ) पापगृहो-पाप का योग, कलह, स्त्री वियोय, शत्र, से पीड़ा, घन भूभि नाश,

स्वजन निदा आदि ।

(१०) पाप युक्त-सब काल दुःख देकर व्याकुल करता है, भ्रान्ति करता है । स्नेह का

नाश) स्त्रा, पुत्र, वाहन, चोर इनसे डर, नाश, बस्त्र नाश ।