सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 91, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रहों की अवस्थाए और चन्द्रक्रिया : ७५
सप्तवर्ग बळ
उच्च में मूल कि० में | स्वगृही | अघि मित्र [| मित्र | सम | गृही
T १ ` ३ २ १ पुण बल = — — — — — Š v ३ v ४+ ।८ [४%
१ गृहेश-शुभ ग्रह हो तो अपने स्थान के अनुसार बळ पाता है, सुख देता है । वली न हो
तो दुःख दे ।
२ होरेश-यदि बली हो तो सुख सम्पत्ति देवे । न हो तो न देवे.
३ द्रेष्काणेश-गृहेश प्रमाण से वल हो तो भाई बंधु से सुख, न हो तो दुःख देवे ।
४ सप्तमांशेश- ,, , बली हो तो पुत्र पौत्रका सुख देवे, बली न हो तो दुःख देवे ।
५ नवभांदोश- ,, > स्त्री से सुख न हो चिता व वलांत मन हो ।
`w दढ्वादशांशेश- ,, ,, मां बाप से सुख मिले, नहीं तो चिता हो 1
७ ब्रिणांदोश- ,, ` „ कष्ट न हो सुख हो, नहीं तो निरन्तर कष्ट हो ।
इस प्रमाण से सप्तवर्गाधिपति जिस राशि में हो उसके स्वामी का उपरोक्त प्रकार
से बल विचारना 1 वल के अनुसार फल मिलेगा 1
नवांश स्वामी बल
राशि में ग्रह फे वल के अतिरिक्त नवांश स्वामो का बळ स्थान के अनुसार प्रथम
विचारणीय है । जैसे चन्द्र वृष में उच्च का है यदि वह पंचमेश हो जाये और बह यदि
केन्द्र में, ३-१० या ११ स्थान में हो तो वहुत अच्छा होता है । परन्तु बुरे नवांश में
जैसे मकर या कुंभ में हो तो नवांश स्वामी जहां है अर्थात् छनि जहाँ हो उसके प्रभावसे
फल में अन्तर पड़ जायगा । केवल ग्रह का बली होना और शुभ होना पर्याप्त नहीं है
परन्तु वह जहाँ हो उसके नवांश स्वामी की स्थिति पर भी विचार करना । _
५)
अध्याय ५
ग्रहों की अवस्थाए और चन्द्रक्रिया
ग्रह-अवस्था ;
१ दोप्त-उच्चस्थानीय ग्रह 1
२ स्वस्थ-स्वक्षेत्री ग्रह ।
३ मुदित (प्रमुदित या हषित)-मित्र गृही, या अधिमित्र गृही, या गुरु से युक्त दृष्ट
कोई शुभगृही को भी मुदित कहते ë 1
४ शाँत-पित्र गृही या तत्काल मित्र गृही ।
५ सुखित-मूल त्रिकोण में ग्रह ।
६ गधित-उच्च मूल त्रिकोण में 1
७ इत्स्त-उदित ।