भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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ग्रहों की अवस्थाए और चन्द्रक्रिया : ७५

सप्तवर्ग बळ

उच्च में मूल कि० में | स्वगृही | अघि मित्र [| मित्र | सम | गृही

T १ ` ३ २ १ पुण बल = — — — — — Š v ३ v ४+ ।८ [४%

१ गृहेश-शुभ ग्रह हो तो अपने स्थान के अनुसार बळ पाता है, सुख देता है । वली न हो

तो दुःख दे ।

२ होरेश-यदि बली हो तो सुख सम्पत्ति देवे । न हो तो न देवे.

३ द्रेष्काणेश-गृहेश प्रमाण से वल हो तो भाई बंधु से सुख, न हो तो दुःख देवे ।

४ सप्तमांशेश- ,, , बली हो तो पुत्र पौत्रका सुख देवे, बली न हो तो दुःख देवे ।

५ नवभांदोश- ,, > स्त्री से सुख न हो चिता व वलांत मन हो ।

`w दढ्वादशांशेश- ,, ,, मां बाप से सुख मिले, नहीं तो चिता हो 1

७ ब्रिणांदोश- ,, ` „ कष्ट न हो सुख हो, नहीं तो निरन्तर कष्ट हो ।

इस प्रमाण से सप्तवर्गाधिपति जिस राशि में हो उसके स्वामी का उपरोक्त प्रकार

से बल विचारना 1 वल के अनुसार फल मिलेगा 1

नवांश स्वामी बल

राशि में ग्रह फे वल के अतिरिक्त नवांश स्वामो का बळ स्थान के अनुसार प्रथम

विचारणीय है । जैसे चन्द्र वृष में उच्च का है यदि वह पंचमेश हो जाये और बह यदि

केन्द्र में, ३-१० या ११ स्थान में हो तो वहुत अच्छा होता है । परन्तु बुरे नवांश में

जैसे मकर या कुंभ में हो तो नवांश स्वामी जहां है अर्थात्‌ छनि जहाँ हो उसके प्रभावसे

फल में अन्तर पड़ जायगा । केवल ग्रह का बली होना और शुभ होना पर्याप्त नहीं है

परन्तु वह जहाँ हो उसके नवांश स्वामी की स्थिति पर भी विचार करना । _

५)

अध्याय ५

ग्रहों की अवस्थाए और चन्द्रक्रिया

ग्रह-अवस्था ;

१ दोप्त-उच्चस्थानीय ग्रह 1

२ स्वस्थ-स्वक्षेत्री ग्रह ।

३ मुदित (प्रमुदित या हषित)-मित्र गृही, या अधिमित्र गृही, या गुरु से युक्‍त दृष्ट

कोई शुभगृही को भी मुदित कहते ë 1

४ शाँत-पित्र गृही या तत्काल मित्र गृही ।

५ सुखित-मूल त्रिकोण में ग्रह ।

६ गधित-उच्च मूल त्रिकोण में 1

७ इत्स्त-उदित ।