सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रहों की अवस्थाएँ और चन्द्र क्रिया : ७७
१५ विकल-अधिशत्र गृहो ।
१६ घाल-वक्र ।
१७ हीन-अवरोही ।
१८ सुषौर्य-आरोही ।
१९ तुबित-जचछर राशि में पाप दृष्ट ।
यहाँ पर मुदित -मित्र गृही, शुभगृही दोनों को बताया जाता है ।
शांत-मित्र गृही और शुभ वग ,, प्र)
दीन-नीच और शत्रु क्षेत्री को भी बताया गया है 1
विकल-अस्त, पापयुक्त या अधिशत्रु गृही को भी कहा है 1
क्षु धित--शत्र गृही, या शत्र, युक्त या दृष्ट ।
दीप्तादि अवस्था के फळ
१ दीप्त-दीघ॑ जीवन, संतानोन्नति, उत्साह (मन को आनन्द), ऐइवर्य, धन, वाहन स्त्री
पुत्र लाभ, राजा से सम्मान, अपने प्रभाव से शत्र ओं को संतप्त करने वाला,
प्रतापी, श्रेष्ठ वाहन, लक्ष्मी युक्त, सुखी, बंधु वर्ग में पूज्य, पृथ्वी लाभ,
विद्या व पदवी लाभ ।
२ स्वस्थ-आनन्द, कीति, भूमि लाभ, राजासे धन लाभ, आरोग्यता, विद्या यश प्रेम
लाभ, स्त्री पुत्र धन और धर्म लाभ, उत्तम वाहन, तेजस्वी, पराक्रमी,
विजयी, कुटुम्ब युक्त, उत्तम बुद्धि, भूषण आदि से युक्त, अति सुखी,
उद्योगी, सेनापति, सम्पत्तिवान् ।
३ मुदित या हृषित-अच्छे वस्त्र, आनंद, सुख, अच्छी स्थिति योग्यता, सुगंध, पुत्र, धन
युक्त, स्त्रियों का अति प्रिय, स्त्रो सुख, घेयेवान्, पुराण श्रवण, धर्म वाहन
भूमि आभरण लाभ । बहुमूल्य वस्तुओं में पूर्ण घनो, धर्म कमं में मन रखने
वाळा, उदार चित्त, शत्र, नाशक, हर्षित, नृत्य वाद्य गीत प्रिय, भोजन सुख,
बंधु प्रेम, वुद्धि, राज दरबार मैं निवास ।
४ शांत--धैय॑ युक्त, संबन्धियों का सहायक, समय पर साहस, सुखी जीवन, पुत्र स्त्री
वाहन भूमि विद्या और धर्म युक्त, शास्त्र चितन से आनन्द, राज्य से सम्मान
लाभ, अति शांत प्रकृति, राजाओं का मन्त्री, स्वतन्त्र, अनेक मित्र, परोपकारी, पुण्य कार्य में चित्त, विनय सौभाग्य स्नेह और सदाचार युक्त, अच्छी विद्या, बहुत पुत्र, प्रयोजन सिद्ध 1
५ शक्त--स्याति युक्त, सव कार्य में समर्थ, सदा प्रसन्न, सज्जन, परोपकारी, पवित्र,
धनी, पुष्पों में रुचि, सर्वज्ञ, तिमान्, की शत्र, हंता, अति आसक्त ।
६ गवित--तवीन गृह, बगीचा, राज्य कलाओं में पाण्डित्य, धन लाभ, सदा
व्यापार में बृद्धि ।
७ दीन - मन अशान्त, मानसिक चिता, अत्यन्त दीन, दरिद्री, राजा तथा दात्र, से
भय, शत्रु पीड़ा, कांति हीर, स्वजाति से वेर, नीति रहित, स्थानसें भ्रष्ट,