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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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३९८ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतीय फलित खण्ड

रहते हुए भी मृत समान (मान०) । पाप गृह, अल्पायु या दीर्घ रोगो, जीवन मत सम,

दुःखी, रोग युक्त । शुभ ग्रह हो तो ऐसा फड नहों होगा (जा० सं०) । कार्य में हानि

दीर्घायु तथा स्त्री का मरण अपने समक्ष हो होता है (वृ० पा०) ।

९--नवम में लामेश-त्रहुशुत, शास्त्र में विशारद, धर्म में प्रसिद्ध, देव गुरु भक्त, पाप

ग्रह हो--बंधु तथा पुत्र से होन, बंधु नहों होते (मान०) । बहुत शास्त्रों का जानने वाला,

शास्त्रों में चतुर, घर्म के विषय में प्रसिद्ध, देव गुरु का waq । पाप ग्रह हो तो वांधव और

-वृत्त इनसे हीन (जा० सं०)। भाग्यवान्‌, चतुर, सत्यववता, राजमान्य, धनवान्‌ (बु? पा०) 1

१०--दशम में लामेश-मातु भक्त, सुकर्म कर्ता, पितृ द्वेषो, दीर्घायु, घनवान्‌, माता

का पालन करने में निरत (मान०) । माता का भकत, पुण्यात्मा, पिता का बैरी, दीर्घायु,

घनवान्‌, माता के पालन में तत्पर (जा० सं०) । राजमान्य, गुणवान्‌, स्वघमंरत, बुद्धि-

मान्‌, सत्मववता, जितेन्द्रिय (qo पा०) । : -

११--लाभ में लामेश--दीर्घायु, बहुपुत्र-प त्र, सतकर्मी, रूपवान्‌, सुशील, मनुष्यों

में मुख्य, मोटी देह, सब्र को प्रिय (मान०) । दीर्घायु, उत्तम पुत्र युक्त, अच्छे कमं, रूप￾दात्‌, सुन्दर शीर, जनों के आनन्द -करने से युक्त (जा० सं०) । सब कार्य में लाभ,

पंडित, सुखी (qo पा०) !

१२--व्यय में लामेश-दैवेच्छा से प्राप्त हुई चीजों को भोगे, स्थिर प्रकृति, उत्पात

में रत, बड़ापापी, दाता, सदा सुखी (मान०) । उत्पन्न हुए को भोगने वाला, चंचल,

उत्यातकर्ता, मानी, इन्द्रिय जोतने वाला, दुःखी (जार do) । सुक्रायं में खर्च, कामी,

बहुत स्त्री वाला, म्लेच्छों से संगति करने वाला (qo पा०) |

लाभेंश का विशेष फल

१--लाम हो-लामेश कोई ग्रह हो वह लाम में या केन्द्र या मूलत्रिकोण में हो तो

अपनी दशा में योग्यता प्रमाण से लाम देता है । (प्रा० यो?) 1

२--चीजों की प्राप्ति-लाभेश युक्त जो ग्रह हो उसके स्वस्थान के भाव और

.लामेश युक्त भाव से लाभ, चीजों की प्राप्ति या इच्छापूति उस सम्बन्धी भाव के विषय

के सम्बन्ध में कहना (फळ०) ।

३--बहुत लाभ-लामेश लाम स्थान में हो या केन्द्र या त्रिकोण में हो या उच्च

का अथवा सूर्य के नवांश में हो तो बहुत लाभ होता है ।

४-लम्नेश सूर्य या चन्द्र हो तो राजा की नौकरो से लाम, मंगल हो तो राजमंत्री

या भाई या कृषक से लाम, बुध हो तो विद्या या पुत्र या कुटुम्बी व्यवित से लाभ, गुरु

हो तो घामिक संस्था से लाम, शुक्र हो तो स्त्रो या रत्न या पशु द्वारा लाभ, शनि हो

तो कुचृत्ति या नोच व्योहार से लाभ ।

व्ययेश का प्रत्येक भाव में फल

१- लग्न मे व्ययेश-विदेश गमन, सुबचन भाषी, सुरूप, दुःसंग के निमित्त से दोष

युक्त, आजन्म अविवाहित या नपुंसक (मान०) । परदेश गामी, अच्छे वचन, सुन्दर

हिमवान्‌, संगहीन, वाद करने वाला, निंदक, बोझा ले जाने वाला या छूला (are सं०)।

फजुल खर्ची, दुबंल, कफ रोगो, घन ओर विद्या से हीन (वृ० पा०) ।

र- धन में व्ययेश्ष-महाकृपण, क्रूरभाषी, लाभ रहित । सोभ्यगृह, राजभय से या

भावेश का भिन्न-भिन्न भावों में फल : ३९९

चोर हिर भय से मृत्यु (मान०) 1 कुरण और चतुर वाणी, शत्रुओं के लाम का लि मंगल हो तो-राजा, चोर, अग्नि इन से उत्पन्न भय से घन कष्ट (जा० सं०) । सुकाय॑ में ख करने वाला, घर्मात्मा, प्रिय ववता, गुणो, सुखी (qo पा०) ।

Í ३--सहज में व्ययेश-क्रूर ग्रह-भाई बन्धु से रहित, शुभ हो-धनबान्‌, थोड़े भाई

र ग अ भाई वंदों से दुर रहने वाला (मान०) 1 बिना बांधव वाला

उच भसे गुद होते पर थोड़े भ्राता, प कृपण तना भ्राताओं मे सदा गा दूर दू रहे रहे । (जा० सं०)। i भाई के '

ses में व्ययेश-वड़ा कृपण, सत्क्रमं करने वाला, लड़के से मृत्यु पाने वाला,

'महा दुःखी, कृपण, रोगहीन, अच्छे कर्म करने वाला, निरन्तर महा दु खी होकर पुत्र से

मरण प्राप्त (जा० सं०) । माता घर वाहून आदि के सुख से होन ° बट) || Š

पंचम में व्ययेश-पुत्र से रहित, शुभ गृह हो तो पुत्रों से युक्त । पिता का घन

भोगने वाला, अपने सामथ्यं से रहित (मान०) । (जा० सं०) । संतान और विद्या से

होन, पुत्र के लिये खच तीर्थं ब्रत करने वाला (वृ० पा०) ।

६--पषष्ठ में व्ययेश-क्रर ग्रह, कृपण, नेत्र में दूषण (काना आदि), मरने योग्य,

शुक्र हो तो नेत्र बिहीन (अम्बा) (मान०) + (जा० सं०) 1 अपने परिजन का वेषो, क्रोघी,

पापी, दु:खी, पर स्त्रीगामी (qo पा०) 1

७--सप्तम में व्ययेश-क्रर ग्रह, दुःशोल, दुष्ट कमंकर्त्ता, पटु भाषी, स्वस्त्री से मृत्यु,

शुभ ग्रह हो तो वेश्या के निमित्त से मृत्यु (मान०) । दुष्ट, खोटे कमे करने वाला, कपट

वचन । पाप ग्रह हो तो स्त्रोहीन । शुम ग्रह, वेश्या से नाश को प्राप्त (जा० सं०) ।

स्त्री के लिये खर्च करने पर भो सुखी नहीं होता, बल और विद्या से हीन (qo पा०) ।

८--अष्टम में व्ययेश-अष्ट कपाली, कार्य साधन से रहित, सबका द्रोही, शुभग्रह￾घन संचय करने में तत्पर (मान०) । दरिद्रता युक्त, कार्यों का साधन करने वाला,

परिणाम से हीन, सबसे वेर बुद्धि । शुभ ग्रह हो तो घन संग्रह में तत्पर (जा० सं०) 1

अधिक लाभ करने वाला, प्रिय वक्ता, मध्यमायु, सब गुणों से युक्त (वृ० पाः) ।

९--नवम में--तीर्थो के दर्शन को घूमने वाला । कूर ग्रह-दरब्य निरर्थक पापी

मनुष्यों से खराब होता है (मान०) । जीविका या तीथं दर्शन में खर्च । पाप ग्रह हो तो

पापी होता है उसका घन व्यर्थ ही खर्च होता है (जा० सं०) । गुरु और मित्रों से द्वेष

करने वाला, स्वार्थो (qo पा०) 1

१० दशम में-स्त्री से पराङ्मुख, पवित्र शरोर, स्वपुत्रों के लिये धन संग्रह करने

में तत्पर, माता दुर्वाक्य कहने वालो (मान०) । पर स्त्री से पराङ्मुख, पवित्र शरीर

वाला, पुत्र घन इनके इकट्ठे करने में तत्पर, उसकी माँ खोटे वचन बोलने वाली (जा०

सं०) । राजद्वार से घन का खर्च, पिता से स्वल्प सुख (ब्‌? पा०) ।

११--छाभ में-धन का पालन करने वाला, दीर्घायु, अपने स्थान में सबसे श्रेष्ठ,

दानी, सत्र विख्यात, सत्य भाषी (मान०) । सुकुमार तथा बड़ी आयु वाला, स्थान में

श्रेष्ठ, दानी, विख्यात, सत्यभाषी (जा सं०) । अल्प लाम और कदाचित्‌ दुसरे का घन

लाम होता है (qo पा०) ।

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` ४०० : ज्योतिष-शिक्षा, तुतीय फलित खण्ड

१२--व्यय में- ऐदवर्य युक्त, ग्राम में रहने का इच्छुक, कृपण बुद्धि, पशु का संग्रहः.

कर्ता, अल्पायु, जीवे तो अवश्य ही ग्रामाघीश हो (मान०) । विभूतियों वाला, ग्राम में निवास में चित्त, कृपणता युक्त बुद्धि, पशुओं को इकट्ठा करने वाला, दीघंजोवी होवे

ग्राम युक्त होता है (जा० qo) 1 अधिक व्यय, शरीर सुख से हीन, क्रोधी, मनुष्यों का हेषी (वृ० पा०) ।

(१२) व्ययेश का विशेष विचार $

(१) भाव सम्बन्धी पदार्थ को हानि--व्ययेश जिस भाव में हो या व्यय भाव में

कोई ग्रह हो उसके स्वगृह का जो भाव है उस भाव के सम्बन्ध के पदार्थ या उनके विषय

की हानि होतो है (फल०) । ,

(२) अच्छे महरू'योग आदि--व्ययेश या चन्द्रमा नवम, लाभ या पंचम भाव में

हो या अपने उच्च का या स्वगृही या रवनवांश का या लाभ, नवम, पंचम के नवांश में

हो तो अच्छे महल, सुगन्ध, पलंग आदि का योग मिलता ë ।

(३) स्त्रो सुख नहीं, अधिक व्यय--आदि व्ययेश अपने शत्रु, नीच या अस्त के नवांश मे, अष्टम स्थान मे या शत्रु स्थान में हो तो उसे स्त्री का सुख नहीं मिलता ! "अधिक व्यय होने से अधिक चिता रहती है ।

(४) स्त्रो से शोभित--व्ययेश केन्द्र या कोण में हा तो अपनी स्त्री से शोभित होता है? भावेश के फल पर विशेष विचार बोच भावेशो के फल पर विचार करते समय उनके बछाबल का विचार अवश्य करना चाहिये । जो ग्रह दो राशियों का स्वामी है उसका दोनों भावों के स्वामित्व के अनुसार

फल विचारना । यदि समान फल में विरोध हो तो दोनों का फल कहना । और भिन्न- भिन्न फल शुभ और ser जो हों वे दोनों ही फल होते हैं ।

जैसे वर्क लग्न वाले को मंगल पंचमेश और दशमेश भी हैं इस प्रकार वह दो भाव का स्वामी ë 1 qg यदि नवम भाव मे हो तो उसका पुत्र राजा या राजा के तुल्य व स्वयं अन्यवार विख्यात और कुल में श्रेष्ठ होता है ये फल ë परन्तु दशमेश का नवम भाव का फल राजकुलोत्पन्त राजा, अन्य राजा के तुल्य और घन पुत्रादि से युक्त होना बताया है । 'इस प्रकार दोनों फल समझना ।

इन दोनों में शुभ फल आया हो तो अति शुभ होगा । परन्तु तुल्य फल का विरोध इस प्रकार होता हे कि एक से घन की प्राप्ति हो और द्वितीय स्थान वश घन की यदि ' हानि प्रकट हो तो न तो घन की प्राप्ति होगी और न घन को हानि होगी इत्यादि । स्वोच्च, स्वनोच, आ(द स्थानस्थिति वश से पूर्ण मध्यम या अल्प फल होगा इसका भी विचार करना । ग्रह पुर्ण बली होतो पूण फल, मध्यम बली हो तो मध्यम, होनबलो हो त; अल्प फल प्रगट होगा ।

भावेश शुभग्रह है या अशुभ । शुभ ग्रह युक्त हे या अशुभ, या शुभ या अशुभ

'विचारते स्थान या

समय भाव मे है और शुभ या अशुभ ग्रह से दृष्ट है इन सब बातों का विचार फल: करना होता है । बोकि परिरिथतिवश फल में अन्तर पड़ जाता है ।

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(चित्र / चक्र पृष्ठ 417)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा

; बी० एल० ठाकुर : š

ज्योतिष के अधिकतर ग्रन्थ संस्कृत में ही हैं । किन्तु संस्कृत से अनभिङ्ज व्यक्तियों के लिए >

` इस माध्यम से यका अध्ययन कठिन Š । इसलिए हिन्दी में एक्‌ ऐसी पुस्तक की

` आवश्यकता थी, जिसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति ज्योतिष का सरलता से अध्ययन कर

x

सके? ::

इस प्रयोजन को ध्यान में रखकर ही प्रस्तुत पुस्तक सात खण्डों में प्रकाशित की गई है ।

यसात खण्ड प्रारम्भिक ज्ञान, गणित, फलित, वर्ष-फल, प्रश्न मुहूर्त तथा संहिता खण्ड हैं ।

“प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड: इस खण्ड के अध्ययन से ज्योतिप-सम्बन्धी वहुत-सी बातें समझ

में आ जाती हैं, जैसे किसी का जन्म, सम्वत्‌, मास, पक्ष, दिन, समय आदि ज्ञात न

| । : हो, तो केवल कुण्डली-चक्र देखकर सभी बातें बताई जा स्ती हैं । बिना पंचाङ्ग

i रथि नक्षत्र, करण, वार, सूर्य, चन्द्र आदि स्पष्ट बताए. ज,: :झते-हं । रल इसी

भाग के अध्ययन से संक्षि जन्म-पत्तिका बनाई जा सकते अन्त म.फलित- ,

सॅप्बन्धी मुख्य-मुख्य बातें संक्षेप में बताई गई हें २. ५४००-7४ uu

गणित खएड: इसके दो भाग हैं । इसमें पूरी जन्मपत्री बनाने की :; प्र है प्रर ? गणित. ।

| करने की सोदाहरण रीति देकर पूरी गणित-प्रक्रिया दी गई; .। 7.13 |

u: प्रथम भागः ९०; ; द्वितीय: श; ४० I

Md प्रथम भाग: इसमें फलित-सम्बन्धी बातें दी गई. -.5 Sisi से उदाहरण देकर समझाया गया है। |:

हरि भागः इसमें ग्रहों की दृष्टि, योग, वर्ग s: ज्योतिष के आवश्यक

क us पुर सूक्ष्म विवेचन किया गयाहै। . (अ) ८५; स). १४०

शि भागः इसमें विस्तृत दशा-विचार से सांथ भाग्य, धर्म, कीर्ति विद्या, बुद्धि,

0 दु:ख आदि विषयों पर विचार प्रकट किया गया| है, माता-पिता, भाई-बन्धु

“आदि सम्बन्धो पर ग्रह-प्रभाव का ज्ञान प्राप्त करने के लिए इस ग्रन्थ की उपादेयता |

: 00 ०७] अनुपम है I 24 qu

४, = फल खण्डः इसमें वर्ष-फल बनाने का पूरा गणित उदाहरण देकर समझोया गया

1०9, स्ट l

3६८४00: इसमें प्रश्‍न-ज्योतिष सम्बन्धी बातें दी गई हैं और किसी प्रश्न का उत्तर देन

३ कै, अभ्यास उदाहरण देकर समझाया गया है। । ४०

इसमें राष्ट्रीय ज्योतिष-सम्बन्धी विषयों पर विस्तार से विचार किया गया

|

k र 'है॥ अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थितियो के अनुसार देश या नगर कौ राशि स्थिर

Š करने के प्रकार बताए गए Š .। किसी भी देश के भविष्य की जानकारी के लिए । 5 ज्योतिर्विद्‌ इस खण्ड का सफल उपयोग कर सकते हैं । भविष्यवाणी में प्राच्य और

S ~. Tamara दोनों रीतियों का च कम सारगर्भित वर्णन है । स्या | ६५

७ errs मो

ली वाराणसी पटना बंगलोर मद्रास

मूल्य; रू० ८५ कन

तीलाल बनारसीदा.स