सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 280 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिपताका चक्र : ९९
त्रिपताका चक्र में ग्रह भरने की रीति लग्त-जो वर्ष लग्न हो उसे सव से ऊपर मध्य में स्थापित करो और आगे क्रमा- नुसार १२ राशियाँ लिख दो जैसा ऊपर वताया है जन्म चंद्र-जन्म के चंद्र का स्थान गत वर्षं +१ गत वर्ष -- १
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शेष जन्म के चंद्र का स्थान जन्म के ग्रह= =शेष जन्म
के ग्रहों का स्थान ।
राहु केतु वक्री ग्रह हैं। इस कारण इन का स्थान उल्टे क्रम से गिनना जैसे शेष २ है और जन्म में वृद्चिक पर राहु है तो वृश्चिक से उल्टे २ स्थान गिना तो दूसरा स्थान तुला आया । इस कारण तुला पर राहु रहेगा । उदाहरण--गत वर्ष ५६ है और जन्म के ग्रह ये हैं--
ग्रह सूर्य चंद्र मंगल वुध गुरु शुक्र शनि राहु केतु
राशि १२ ११ ८ ११ १० १२ ४५ ३ ९ वर्ष लग्न ८ है तो त्रिपताका चक्र में ८ लग्न स्थान में रख कर आगे क्रमानुसार राशियों को त्रिपताका चक्र में लिख दिया ।
प सेत शेष ममिधा ३। जन्म में चन्द्र कुम्भ राझि में था। कुम्भ से ३
गिना तो कुम्भ से तीसरा मेष आया । इस कारण मेष राशि पर चन्द्र लिख दिया ।
प्रह टु 5-२ पपप ६ १ जन्म में जो ग्रह थे उन-उन स्थान से १
स्थान गिन कर सम्पूर्ण ग्रह चक्र में स्थापित कर दिये । जैसे सूर्यं मीत का था मीन से १ गिना १ मीन ही आया तो सूर्य मीन में गया । मंगल वृश्चिक से १ वृदिचिक ही रहा तो मंगल लग्न पर आ गया। बुध कुम्भ से १ स्थान=कुम्भ । गुरु मकर से १ स्थान=मकर । शुक्र मीन से १ स्थान=मीन । शनि सिंह से १ स्थान=सिह । राहु मिथुन से १ स्थान उल्टा गिना तो मिथुन ही रहा । केतु धन का है उससे १ स्थान उल्टा गिना धन पर ही रहा । इस प्रकार जन्म के सम्पूर्ण ग्रह त्रिपताका चक्र में स्थापित कर दिये गये जैसा ऊपर चक्र में बताया है।
वेध का विचार
किसी ग्रह के स्थान से जो रेखा गई हो उसके छोर पर कोई दुधरा ग्रह हो तो
उसका वेध समझा जाता है । जैसे जहाँ मंगल का परस्पर वेध शनि और बुध से है ।
राहु का वेध ग्रुरु से है। चंद्र का वेध केतु से है। और किसी का वेध नहीं है ।
चन्द्र का बेध फल
इसमें चन्द्र का विशेष रूप से वेध का विचार होता है।
चंद्र का वेध राहु से सूर्य से शनिसे . मंगल से शुभ ग्रह से वेध
फल अरिष्ट तप ताप रोग शरीर पीड़ा जय सुख लाभ