सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 135, कुल 280 में से
संदर्भ में पढ़ेंसहम विचार : १२७
शोधक से शोध्य तक के. बीच लग्नं न हो तो १ नहीं जोड़नां पड़ता ' यदि बीच में
रूग्न हो तो १ जोड़ना पड़ता है।
उदाहरण--मान लो पुण्य सहम निकालना है । दिन का वर्ष प्रवेश है।
सूयं स्पष्ट ७रा-1००-१५-४ पुण्य सहम = दिन-( चंद्र स्पष्टनसूयं. स्पष्ट )+लग्न
चंद्र स्पष्ट ९ -. ६-८ -१०- चंद्र ९- ६० ८-१० से स्शुद्धाश्यच्शोधक
खरत् १०-११- ४-१ है -सूयं ७--१०--१५--४ घटायाऱशोध्यक्षं-शोध्य
शेषः १-२५--५३--६ लग्न १०८-११-४-१
योग ०-६-५७-७
०. पुण्य सहम शुद्धाश्रय 'संस्कार--१
१रा-६०-५७'-७'” = १— ६-५७-७
यहाँ शोध्य सूर्यं वृश्चिक राशि का है इसके आगे शोधक चंद्र मकरं राशि का है।
क्योंकि लग्ने कुम्भ राशि है । इससे १ राशि जोड़ना पड़ा ।
जब छग्न शोष्य और शोधक के बीचे में नहीं है तो अवश्य शोधक और शोध्य के
बीच में होगा । यहां शोधक मकर राशि का है इसके आगे लग्न कुम्भ राशि है । आगे
शोध्य सूर्य कुम्भ मीन के उपरांत मेष वृष आदि को पार करके वृश्चिक का है। इस
कारण शोधक और शोध्य के बीच लग्न होने से १ राशि जोड़ना पड़ाः। इसके विरुद्ध
होता तो:१ नहीं जोड़ना पड़ता । इस-१ को- जोड़ने से स+ ऐक्य=सैक्य करना भी
कहते हैं । (७) आगे सहम की क्रिया देखने: से! प्रगठ है शकि सव सहमों के अन्त में लग्न नहीं
जोडा जाता किसी में बुध किसी में मंगळ किसी में शनि।आदिः ग्रह/या किसी में
षष्ठं भाव या सूर्य या चंद्र की' राशिं'आदि जोड़ी जाती है । जब लग्न नहीं जोड़ा
जांतौ तो जो कुछ भी जोड़ा जाता है उसी के सम्वन्ध में विचार करना होगा
कि वह शोधक और शोध्य के बीच में क्या है? यदि हो तो १ राशि अंत में
जोड़ना पड़ेगा । यह सव सहम के उदाहरण में दिये हैं जिनको देखने से समझ
में आ जायगा। पर ५
(८) एक सहम के कई नांम हैं या कई समय की एक ही क्रिया है । इससे उनकी
पृथक पृथक गणना करने से सहम की संख्या बढ़ जाती है।.
(९) सहम के विचार में पहिले यह देखना कि किस विषय के निमित्त सहम का
विचार करना है। फिर उसी सम्बन्धी भाव से सहम की कल्पना करना, जैसे
भाइयों के लिए तृतीय भाव को, स्त्री के लिए सप्तम भाव को लग्न जानकर
पुण्य आदि सहम कल्पना करना ऐसा किसी का मत है ।
(१०) क्षेपकञ्शोधक और शोध्य से घटाने के पश्चात् जो जोडा जाता दै उसे क्षेपक
कहते हैं । बहुधा क्षेपक लग्न होता है । जिनमें क्षेपक नहीं कहा' वहाँ लग्न को