सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंफल विचार : १६३
(३) तीसरे में--समाज के कायं में सम्मान एवं कीर्ति वढ, पराक्रम वढ़े,भाइयों में सद्भाव एवं उन्नति ।
(४) चौथे में--वाहन एवं धन लाभ, सुख प्राप्त, प्रसन्नता, ऐश्वर्य साधन संबंध से खर्च बढ़े ।
(५) पंचम--यह उद्यमी वर्ष है । परीक्षा में सफलता, परिश्रम में सफलता प्राप्त करे, कार्य सिद्ध हो, सुख प्राप्त हो, मोगलिक कार्य हो संतान सुख हो । (६) छठें-शत्रु चिता, बाधाएँ, धन हानि, कलह, पराजय, पश्चात्ताप हो, संघर्ष करना पड़े ।
(७) सप्तम--अनुकूछ कार्य हो, इच्छित सफलता प्राप्त करे, मांगलिक कार्य हो । (८) अष्टम--असफछता, धन एवं मान हानि, कष्ट ऐक्सी डेन्ट, रोग,वहुत दुःख । (९) नवम--यह् भाग्योदय का वर्ष है । आथिक लाभ,सुख, व्यापार में सफलता इच्छित कार्य में प्रसन्नता, सम्मान प्राप्त हो ।
(१०) दशम--यह् सफल वर्ष है। सम्मान प्राप्त हो, विशेष आथिक लाभ, इच्छित काये में सफलता, सुख, व्यापार में लाभ ।
(११) एकादश--अकस्मातु धन लाभ, सम्मान का पद प्राप्त हो, व्यापार में अच्छा लाभ, आथिक चिता का समाधान हो।
(१२) द्वादश--यह दुर्भाग्य का वर्ष है। व्यथं का खचे, कजं वढे, झूठी निंदा, मानसिक चिता, इच्छा तृप्ति के लिए अनावश्यक व्यय, आथिक चिता बहे ।
वर्षेश निर्णय
पंचाधिकारियों में जो लग्न को देखे वह वर्षेश होता है। बलूवान् होने पर भी वह लग्न को न देखे तो वर्षेश नहीं हो सकता । द्रष्टा ग्रहों में जिसकी दृष्टि लग्न पर विशेष हो वह वर्षेश होगा । यदि द्रष्टा ग्रह बल और दृष्टि में समान हों या सब निर्वळ हो तो मुन्थेश वर्षेश होगा ।
अध्याय १६
वर्षफल में भाव फल विचार
(१) लग्न भाव--
लग्न में सूयं मंगल शनि या ये तीनों या प्रत्येक ग्रह लग्न में हो तो-ज्वर पीडा, धन क्षय हो । ६ * लग्न में सूर्य-पित्त ज्वर । मंगछ-रक्त चिह्न, शोत ज्वर। दनि-वायु मूलक ज्वर । तीनों-त्रिदोंष उत्पन्न करें । पाप युक्त क्षीण चंद्र-ज्वर कफ, धन क्षय ।