सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 172, कुल 280 में से
संदर्भ में पढ़ें१६४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
शुभ युक्त पूर्ण चंद्र-सुख हो ।
गुरु बुध शुक्र ये प्रत्येक या तीनों-धन लाभ, धान्य लाभ ।
लगत में सूर्य - वात पित्त रोग हो, स्त्री के शरीर में पीड़ा, मस्तक में कफ रोग,
अपने कुटुम्बियों से विवाद और गुप्त चिन्ता । रवि की दशा अंतर्दशा का फक
अनिष्ट हो ।
चन्द्र--शरीर में विकलता, कफ, क्षय रोग, ज्वर पीड़ा पाप युक्त या दृष्ट हो
तो शरीर को नष्ट करे-तथा बहुत खर्च करावे ।
मंगल--शत्रुओ से विवाद, कठिन वात रोग, फोड़ा, नेत्र और मस्तक में पीड़ा
खाँसी, उल्टी, स्त्री को कष्ट, राजा से भय, लोहा तथा अग्नि से भय । घर में कलह ।
वुध--बल की वृद्धि, स्त्री को सुख, शत्रु का नाश, राज पक्ष से लाभ, धन, जन
ओर मित्र लाभ, तेज और धैय की वृद्धि ।
गुरु--धन की अति वृद्धि, कीति वृद्धि, व्यापार की वृद्धि, स्त्री का सुख, मोती,
धन, स्वर्ण लाभ, शत्र का नाश, शरीर आरोग्य, श्रेष्ठ बुद्धि ।
लगत में शुक्र--विशेष प्रतिष्ठा, धन लाभ, शत्र, नाश, राजा से सन्मान एवं
जय, आभूषण लाभ । वंश वृद्धि, उत्सव, ।
शनि--मंद बुद्धि करे, शत्र भय वात पीड़ा, उपवास, स्त्री कष्ट, ज्वर, शिर
तथा जठर में पीड़ा, मुख में पीड़ा, मित्रों से वेर ।
उच्च का हो तो पुत्र लाभ, स्वगृही हो तो शरीर पुष्ट ।
राहु--स्त्री को पीड़ा, शत्रु से भय, धन खर्च, विकलता, राजा से भय, मानभंग,
सिर या नेत्र में रोग, पुत्र मित्र आदि से कष्ट । राज भय ।
केतु--भय, विकलता, चिता, शत्रु से भय, शिर या नेत्र में पीड़ा, राज भय ।
हीन वल सूर्य--यदि जन्म लग्नेश, वर्ष लग्नेश, मुंथेश, वर्षश, त्रिराशीश इन
सव में कोई अधिकार वाला होकर सूर्य हीनवळ हों तो त्वचा के रोग, नेत्र रोग
करते हैं आल्स्य नीचता क्षुद्र वृत्ति से निर्वाह, माता पिता से भी कष्ट ।
चंद्र--पूर्वोक्त अधिकारी होकर चंद्र हीन वली हो तो नेत्र रोग, कार्य नाश,
दरिद्रता, पराभव, रोगभय, मन में संताप, घर में कलह ।
मंगरू--उक्त अधिकारी हीन वल मंगल---चं चछता कायरता
वुध-- 27 र „ - मति भ्रम, क्लेश प
गुर छ ह] 9१ --धर्मेनाश, जीवन में अंत के क्लेश
शुक „» ५ ¬ भ्लेश, दुःख, स्त्रियों से कलह
दानि-- 4, वायु कोप, सेवक से दुख लग्नेश वली होकर लग्न में--अति सुख, कांति, मध्यम वली हो तो मध्यम फल । अल्पबळी--अल्प फल ।
लग्नेश केन्द्र या त्रिकोण में_बहुत सुख देवे । विजय वृद्धि। ६-८-१२ भाव में रोग मरण, खर्च ।