सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवर्ष फल में भाव फल विचार : १६७
(२) वार--वषं प्रवेश में चंद्रवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार उत्तम है रविवार
मंगलवार शनिवार ये हानिकारक हैं ।
(३) नक्षत्र--वर्ष प्रवेश में अश्विनी, मृग ०, हस्त, पुष्य,पुन०, स्वा० और रेवती
शुभ हैं कृ० रो० आद्रा, ज्ये०, म्» श्र० अनु» तीनों पूर्वा तीनों उत्तरा मध्यम हैं ।
भर० म० चि० वि० शत० धनि० इले० अति निदित हैं जिस वपं प्रवेश में भद्रा
हो या निदित योग हो वह शुभ नहीं होता ।
(४) लग्न--वपे प्रवेश में लग्न शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो या वर्षेश से युक्त दृष्ट
हों तो स्त्री पुत्र आदि का सुख होता है आपत्तियाँ दूर हों यदि वर्ष लग्न क्रूर हो या
पाप ग्रह से युक्त्र दुष्ट हो तो घन हानि ज्र, भय, रोग आदि हों ।
(५) रग्नेश--वपं लग्नेश सूर्य-पराधीनता व्याकुलता दुःख ।
चंद्र-परान्न भोजी, धातुक्षीण, स्वजनों से आश्रय हीन ।
मंगल--रोग, सवसे विरोध और विवाद ।
बुध--विद्या वुद्धि आदि की वृद्धि ।
गुरु या शुक्र--अति सुख ।
शनि--फ़लूह उद्वेग विकार आदि अशुभ फल होते हैं ।
वर्षं का साधारण फल विचार
जन्म ळग्नेश,वर्प लग्नेश, अष्टमेश और मुंयेश बळत्र।न् हों ६-८-१२ स्थान में न
हों तो पूरा वर्ष शुभ होता है. यश धन और सुख की प्राप्ति होती है। यदि वे
६-८-१२ स्थान में हों तो दुःख और भयदायक हैं ।
यदि वे वल हीन हों और शुभ ग्रह की दृष्टि रहित हों तो वपं अशुभ होता है।
द्विजन्माइय योग--जिस वर्प में जन्म लग्न तथा वर्षे लग्न एक ही हो तब यह
योग होता है जिसका फल कष्ट या मुत्यु है ।
जगल्लग्न विचा र--मेष का सूर्य प्रवेश के समय जो लग्न हो उसे जगल्लग्न
कहते हैं ।
जन्म लग्न से जित भाव में सूर्य का मेषाक प्रवेश हो यदि वह भाव शुभ ग्रह
युक्त दृष्ट हो तो उस वपं में उस भाव की वृद्धि होती है। यदि वह भाव पाप युक्त
दृष्ट हो तो वर्ष में उस भाव की हानि होती है ।
इस कारण यह देखना कि मेषाकं का जो लग्न हो उसे देखे कि वह जन्म लग्न
से क्रिस भाव में पड़ा है। यदि वह--
(१) जन्म लग्न में हो--देह सुख ।
(२) धन स्थान में--धन लाभ ।
(३) तृतीय में--कुटुम्ब की वृद्धि।
(४) चतुर्थ में--मित्र सुख ।
(५) पंचम में--पृत्र प्राप्ति ।