भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

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वर्षं फल में भाव फल विचार : १६९

रूग्नेश--मुंथा युक्त वर्ष लग्नेश केन्द्रेश ४--- घर में हो तो मरण हो ।

ग्नेश-छम्नेश नीच में हो अष्टमेश अस्तगत हो तो शरीर का क्षय और

शूल हो ।

लग्नेश--लग्नेश और अष्टमेश दोनों एक होकर ४-६-८ या १२ स्थान में

हो तो मरण हो।

पाप ग्रह--१, ७, ८ घर में पाप ग्रह हो तो चोर अग्नि या शस्त्र का भय हो

अष्टमेश--अध्टमेश वर्ष लग्न में हो लग्न सूर्य से दृष्ट हो लग्नेश निवंल हो तो

शस्त्रघात, कष्ट व मरण तुल्य पीड़ा हो ।

सूर्य- लग्न में सूर्य, अष्टम में शुक्र वा सप्तम में कन्या राशि पर पाप ग्रह हो

तो स्त्री संग वा अकस्मात्‌ सन्तान की मृत्यु हो । |

लग्नेश--लग्नेश केन्द्र में हो या उच्चग्रह केन्द्र में हो और यदि लग्नेश या

उच्चग्रह की मित्र दृष्टि हो तो वह धनवान्‌ प्रतापवान्‌ हो सा वं भौम पद प्राप्त करे।

जन्म लग्नेश या वर्ष लग्नेश अधिक वली शुभ ग्रह युक्त हो और वर्ष लग्न को

देखता हो तो अरिष्ट दूर कर शुभ फलदायक है ।

लग्नेश-- जन्म लग्नेश वर्ष लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो तो धर्मे कर्म कीः

प्राप्ति होती है सव अरिष्ट दूर हो ।

लग्नेश--वलवान्‌ लग्नेश त्रिकोण में हो त्रिराशि पति केन्द्र में हो क्रूर ग्रह की

दृष्टि न हो तो निरन्तर सुख मिले अरिष्ट दूर हों ।

ग्नेश--वली लग्नेश केन्द्र में शुभ युक्त या दुष्ट हो तो गुप्त सुख मिले धन

लाभ, अरिष्ट दूर हो।

लग्नेश--लग्नेश केन्द्र या पंचम में शुभ ग्रह युक्त दृष्ट हो ठो सुख, स्त्री सम्तान

का सुख, वस्त्र-भूषण प्राप्त हो अरिष्ट दूर हो।

लग्नेश- जन्म लग्नेश वपं में अष्टम क्रूरग्रह युक्त या दृष्ट हो तथा अष्टम और

कर्म भाव को देखता हो तो उस वर्ष में शस्त्राघात से मृत्यु हो ।

छग्तेश--वर्ष लग्नेश अस्त हो, जन्म लग्नेश वर्ष कुण्डली में छठे हो और जन्म

लग्न से अष्टम लग्न वर्ष लग्न हो उस पर मंगल बैठा हो तो उस वर्ष मृत्यु हो!

(२) धन भाव में ग्रह फल

चन्द्रमा, वुध, गुरु, णुक्र--धन लाभ, राज्य सुख ।

सूर्य, मंगल, शनि, राहु केतु--धन हानि ।

शनि-राजा से भय, कार्य हानि ।

धन में सूयं - कुटुम्ब से विरोध, राजा, अग्नि, चोर से भय, पशुओं को पीडा,

वेट में रोग, धन हानि, आपत्ति ।

धन में चन्द्र--कुटुम्ब व मित्र जनों से छाभ,धन की प्राप्ति, शत्रु नाश, नेत्र पीड़ा

राजा से सुख, आरोग्यता, इवेत वस्तुओं से धन लाभ ।