भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

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१७० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

धन में मंगल--विरोध, सूयं, अग्नि से भय, सिर में पीड़ा, द्रव्य नाश, स्त्री के आँख में रोग, मनोरथ पूर्ण न हो, राजा से भय, शोक, मोह । धन में बुध- द्रव्य से लाभ, कुटुम्बियों से जय, शत्रु नाश, मान और यश की वृद्धि, प्रतिष्ठा प्राप्त हो, सुख हो। धन में गुर धन आदि का सुख, पशुओं की प्राप्ति, राजा से तभ, मित्र मिलाप, सज्जनों की संगति, वस्तुओं की प्राप्ति, भाइयों से आनन्द, शरीर पुष्ट । धन में शुक्न--धान्य और धन का लाभ, म्झेच्छ जाति से सुख, पशुओं का घर में सुख, मित्रो की वृद्धि, भाइयों की वृद्धि, शरीर में तेज की वृद्धि, शत्रु नाश । धन में शनि--स्थानात्तरण, गमन, शरीर में पीड़ा, शत्रु वृद्धि, नेत्र मुख या उदर में पीड़ा, कफ विकार, कुटुम्बसे विरोध,धन नाश,राज भय,स्त्री पुत्र आदि की चिंता । धन में राहु--राजा से भय, नेत्र और उदर में पीड़ा, अपवाद (कलंक), धन नाश, चिता, चित्त में खेद, किसी नीच से लाभ । धन में केतु--राजा से भय, धन हानि, नेत्र तथा पेट में पीड़ा, भय दुःख, निदा, लड़ाई का दुःख ।

धन में सूर्य-जम्म में सूयं लग्न में हो,वर्ष में दुसरे भाव में हो तो धन सुख देता है। गुरु--यदि गुरु २-७ स्थान में पाप युक्त हो तो राजदण्ड हो । यदि धन स्थान शुभ ग्रह्‌ युक्त या दृष्ट हो तो शुभ फल धन आदि देवे । गुर्‌ जन्म कुण्डली में गुरु लग्न को देखे और वर्ष में बली होकर वषेश हो तो विना प्रयास से अनेक प्रकार से धन लाभ हो । गुरु-जन्म कुण्डली में गुर जिस भाव का स्वामी हो वर्ष कुण्डली में यदि उसी भाव में आ जाय और वर्ष लग्नेश से इत्थशाल हो तो उस भाव का सुख होता है । वैसे ही जन्म से गुरु जिस भाव को देखे, वर्ष में गुरु वषेश होकर उसी भाव को देखे तो उस भाव का उत्तम सुख होता है । गुरु २ भाव में शुभ युत दृष्ट हो या वर्ष में भी मुन्था की राशि को देखता हो तो विशेष रूप में राजसुख हो। जन्म में गुरु जिस राशि में हो वह राशि यदि वर्ष में लग्न हो और शुभ ग्रह से या लग्नेश से दृष्टयुत हो तो आरोग्य और धन को देता है। गुरु जन्म में धन भाव में हो, वर्ष में वर्षश होकर जिस भाव में हो उस भाव का आश्रय लेकर लाभ प्रद होता है। जैसे लग्न में हो तो अपने से धनवान हो क्योंकि लग्न से आत्मा का विचार होता है। धन भाव में हो तो कुटुम्ध में, तीसरे में सहज से, चौथे में माता, वाहन, घर आदि से और जळ से धन कहना । जन्म में घनेश और वर्ष में वर्षेश होकर गुरु यदि धन भाव में हो तो सोना चाँदी का लाभ, तीसरे में भाई आदि से लाभ, चौथे में माता वाहन भूमि से, पांचवें में मित्र और पुत्र से, छठे में शत्रु से, सातव में स्त्री से, आठवें में मरण से, नर्वे में धन लाभ का मार्ग, दसवें में राजा से, ११ में राजा के वंश से लाभ,बारहवे में खच कराता है।