भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

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वर्ष फल में भाव फल विचार : १७१

जन्म कुण्डली में द्वितीयेश गुरु यदि वर्ष में दूसरे भाव में हो और लग्नेश के साथः

इत्थशाली ही तो वर्ष भर धन लाभ होता है । यदि गुरु के साथ पाप ग्रह का

इशराफ होदा हो तो धन-धान्य का नाश होता है ।

बुध--जन्म में षष्ठेश बुध वर्ष में भी षष्ठ हो तो थोड़ा लाभ देता है ( यह

योग जिसका १ या ११ जन्म लग्न हो उसकी जन्म कुण्डली में हो सकता है) ।

शुक्र--जैसा गुरु के वारे में कहा गया है यदि शुक्र वर्पेश हो तो बहुत द्रव्य"

और धन प्राप्त हो ।

इसी प्रकार बुध यदि बलवान होकर धन भाव में हो तो लेखन कार्य से या

ज्ञान से (उद्योग) से धन होता है ।

या शुभ ग्रह सव जन्म लग्न में हों वर्ष में दूसरे भाव में पढे तो धन लाभ हो।

शनि--द्वितीय स्थान स्थित शनि यदि गुरु से युक्त हो तो भ्रातृ सुख होता है ।

यदि द्वितीय स्थान स्थित गुरु युक्त शनि पर शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ती हो तो

बहुत ऐश्वयं होता है। पाप ग्रहों के संयोग या दृष्टि से फल विपरीत होता है ।

धनेश--जन्म में धन योग करने वाला ग्रह और धनभावेश दोनों अस्तंगत हों

तो धन का नाश हो और दूसरे के रक्षित धन का कलंक हो ।

धनेश वली जन्म या लग्न में धन में हो तो धन लाभ हो, यदि पाप ग्रह से

आक्रांत (घिरा हुआ) या निर्व हो तो अनेक प्रकार द्रव्य नाश हो ।

सहम--अथं सहम, बुध, शुक्र, गुरु से युक्त या दृष्ट होकर धन भाव में ही हो

तो विशेप धन होता है और अपने कुल में राज्य पाता है ।

घन सहमेश और धन भावेश ये दोनों यदि शुभ ग्रहों से मित्र दृष्टि से देखे जायें

तो विना प्रयास लाभ हो | यदि वे दोनों शुभ ग्रहों से शत्रु दृष्टि से देखें जायें तो

प्रयत्न से धन लाभ हो ।

धन में धनेश -लग्नेश और धनेश का मित्र दृष्टि (३, ५, ९, ११) से इत्थशाल

होने पर अनायास धन लाभ होता है। उन दोनों में इशराफ योग होने पर

अन्याय से धन नाश होता है ।

वर्णेश बुध--वुध वर्णेश होकर दूसरे स्थान में शुभ युक्त दुष्ट हो तो व्यापार से

लाभ हो।

धनेश--धनेश पाप युक्न हो, घन भाय में नीच का पाप ग्रह हो तो उस वर्ष

अनेक प्रकार से धन की चिन्ता रहती है।

पाप ग्रह--धन और ब्यय भाव में पाप ग्रह हो, अष्टम में पाप ग्रह युक्‍त शुभः

ग्रह हो तो वृत्ति और धमं का क्षय हो, अपवाद हो ।

चन्द्र--धन स्थान में चन्द्र लग्नेश से युक्त या दृष्ट हो, लाभेश वली हो, अष्टमेशः

निर्वळ हो तो अन्य ग्रहों से किया हुआ सव अरिष्ट दूर हो ।

गुह धन स्थान में गुरु, नवम चन्द्र शुक्र हो तो सवं कायं की सिद्धि होकर

अरिष्ट दर हो । भाग्योदय हो ।