भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

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“१७२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

झनि-ऱदुसरे या लाभ स्थान में शनि स्वक्षेत्री हो उस वर्ष अफीम के व्यापार से लाभ ।

'तृतीय भाव के ग्रह फल

तीसरे में--रवि, शनि, मंगल-धन, धर्म, राज्य या लाभ में ये पाप ग्रह वली हों

“तो-भूमि लाभ, शुभ ग्रह-सुख, धन, पुत्र, सम्मान, विनोद, लाभ, चन्द्र-पूर्ण हपं ।

तृतीय में सूयं--सहोदर भाइयों को पीड़ा, पराक्रम, राजा की कृपा, लक्ष्मी की आप्ति, शत्रु नाश, कीति की वृद्धि, आरोग्य, कार्य सिद्धि ।

तृतीय में चन्द्र--भाइयो को सुख देवे, धन की प्राप्ति, पुण्य का उदय, गुप्त सुख

"प्रतिष्ठा की वृद्धि, धर्मं में बुद्धि, शत्रु नाश, अधिकार प्राप्त, उत्सव ।

तृतीय में मंगल--भाइयों को कष्ट, वाहन सुख, शत्रु नाश, धन लाभ, राजा से

'तथा मित्रों के पक्ष से जय, मान बढ़े, रोग दूर, घर में महोत्सव ।

तृतीय में बृुध--सम्पूर्ण संताप दूर, मान तथा यश की वृद्धि, धन लाभ, पुत्र

-सुख । लाभ-हानि, सुख-दुःख, मित्र-शत्रु, सव समान भाव से स्थित ।

तृतीय में गुरु--राजा से जय,यश की वृद्धि, धन-धान्य वस्त्र फी वृद्धि,धर्म में प्रीति

स्त्री व माता को सुख,कार्य की वृद्धि, मित्र और भाइयों का समागम, सेवा से सुख ।

तृतीय में शुक्र--परस्पर सहोदर भाइयों में अनेक प्रकार का सुख, धन लाभ,

यश वढे, परोपकार करे, धन की फिजूलखर्ची, स्वजनों से विवाद, मध्यम पराक्रम,

उपद्रव, कुछ चिन्ता ।

तृतीय में शनि---राजा की कृपा, भूमि, धन का लाभ, भोग लाभ, पराक्रम,

सहोदर के अंग में रोग की वृद्धि या भाइयों में विरोध, चिता ।

तृतीय में राहु--धन पुत्र लाभ, मनुष्य राजा के समान हो, पशु तथा वाहन

"सुख, स्वजनों को पीड़ा आरोग्य, शत्रु का क्षय ।

तृतीय में केतु-पशुओं का सुख,धन व पुत्र सुख,राजा के.समान,भाइयो को पीड़ा।

तृतीय में सूर्यं या शुक्र- सवल सूर्यं या सबल शुक्र वर्षेश हो पाप युक्त दृष्ट न हो

तो सहोदरों से परस्पर सुख हो, विपरीत से, अर्थात्‌ ये निर्वेल होकर पाप युत दृष्ट हों, शुभ युत दृष्ट न हो तो भाइयों में कलह ।

तृतीय में गुर--गुरु को तृतीयेश से इत्थशाळ होता हो तो सहज से सुख हो ।

तृतीय में चन्द्र--- मंगल युक्त चन्द्र तींसरे हो और गुरु से युक्‍त या दृष्ट न तो सहज से कलह हो ।

तृतीय में मंगल--मंगल १० या ११ राशि में होकर सहज में हो या बुध १ या

८ राशि का तीसरे भाव में हो, इन दोनों योगों में शुभ ग्रह का योग दृष्टि हो तों सहोदरों से परस्पर आनन्द व अनेक सुख ।

तृतीय में बुध शुक्र--जन्म लग्नेश और वर्षे लग्नेश वुध और शुक्र हो, सबल "होकर तीसरे भाव में हो और गुरु वल्वानु हो तों सहोदर वन्धु वांधवो को सुख । शुक्र शुक्र यदि सबल चन्द्र की राशि में हो और जन्म वपं काल में पंचाधि- करी में हो तो सहज बंधु गण की वृद्धि हो।