सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 188, कुल 280 में से
संदर्भ में पढ़ें८० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
षष्ठ गुरु-वक़ी पाप पीडित गुरु वर्षेश होकर छठे हो और चन्द्रमा से कम्बुलः
योग नहीं करता हो तो बात रोग नेत्र रोग हो ।
पाप युत गुरु अष्टम हो और मंगल लग्न में हो तो आलस्य युक्त मुर्छा रोग,
वेहोशी मृगी रोग हो ।
चन्द्र युक्त गुरु अष्टम हो या चन्द्र युक्त मंगल लग्न में हो तो भंग का नाश या
अति पीड़ा हो ।
षष्ठ शुक्र-वक़ी पाप पीड़ित शुक्र वर्षेश होकर छठे घर में हो तो पित्त रोग हो।
यदि पुरुष राशि का शुक्र पष्ठेश से दृष्ट होकर छठे हो तो इलेष्य (कफ) रोग हो ।
शुक्र जन्म में जिस राशि में हो वह राशि वर्ष लग्न से छठे स्थान में हो और
उस में सूर्य हो और रोग सहम पाप युक्त हो तो वीर्य दोष से रोग हो ।
षष्ठ चन्द्र-पाप पीडित चन्द्र वर्षश होकर छठे स्थान में हो तो कफ रोग हो ।
षष्ठ बुध-पाप पीडित वुध वर्षेश होकर छठे घर में हो तो वात से उत्पन्न रोग हो ।
षष्ठ रूम्नेश-जन्म लग्नेश पाप ग्रह हो वर्षेश से क्षुत दृष्टि (१-४-७-१०) से
दृष्ट हो तो रोग हो । यह पाप लग्नेश यदि पाप युक्त भी हो तो मृत्यु तुल्य कष्ट हो ।
जन्म लग्नेश और मुंथेश ये दोनों छठें हों पाप युक्त दुष्ट हों निर्बल हों तो ज्वर
मौर शरीर की विकलता आदि अत्यन्त कष्ट देते हैं ।
वर्षे लग्नेश, वर्षेश इन दोनों को षष्ठेश से यदि इत्यशाल योग होता हो तो उन
ग्रहों की जो धातु हो उसके विकार से रोग होता है ।
लग्नेश-वर्ष छग्नेश, मुंथा, वर्ष लग्न ये सव यदि पाप ग्रहों के बीच में हों तो
रोग उत्पन्न करते है । या षष्ठेश शुभ ग्रह हो षष्ठ में हो तो स्त्री के जरिये रोगः प्राप्त हो ।
मंगल-जन्म में गुरु और शुक्र जिस राशि में हों उसी राशि में वर्ष में मंगल हो
अस्तंगत भी हो तो प्लीहा, शीतला आदि रोग होते हैं और शीत पित्त या सर्दी गर्मी
के रोग या गलगंड रोग होते हैं ।
चं. बु.-इसी प्रकार चन्द्र युक्त बुध जन्म कालिक गुरु शुक्र की राशि में हो तो:
कुष्ट और गंडमाला या भगन्दर रोग हो ।
पाप ग्रह-जन्म में केन्द्र में स्थित पाप ग्रह यदि वर्ष लग्न में हो तो रोग हो ।
शुक्र-विषम राशि में शुक्र पर पाप ग्रह की क्षुत दृष्टि हो तो कफ रंग हो ।
दिन का वषे प्रवेश हो-और जन्म तथा वर्ष कालिक लग्न में सूर्य या मंगल का
स्वगृह हद्दाद्रेष्काण नवांश आदि अधिकार हो तो ज्वर से कष्ट हो । जो लग्न पर शुभ
ग्रह की दृष्टि भी हो तो परिणाम में सुख होता है । रात में वर्ष प्रवेश हो और चन्द्रमा शुक्छ पक्ष का हो और वर्ष में मंगल से
इत्यशाल होता हो तो रोग नाश हो । यदि वह चन्द्रमा शनि से इत्यशाल करता हो
तो रोग बढ़ाता है। इसके विपरीत हो तो विपरीत फल जानना जैसे दिन का वर्ष
प्रवेश हो और कृष्ण पक्ष का चन्द्रमा मंगळ से मुथशिली हो तो रोग करता है यदि
वह चन्द्रमा शनि से मुथशिली हो तो रोग नाश करता है