भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

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वर्ष फल में भाव फल विचार : १९५

लाभ में शुभ ग्रह-यदि पाप ग्रह रहित शुभ ग्रह लाभ में हो तो लाभ कारक है। लाभ में लाभेश-लाभेश लाभ में हो तो वह विद्या के द्वारा लाभ कराने वाला ऱहोता है।

लाभ में लाभेश-लाभेश पाप ग्रह युक्त अस्तंगत हो तो हानि होती है । लग्नेश लाभेश-लाभेश और लग्नेश का इत्थशाल हो तो धन लाभ हो और 'स्वजनों में गौरव बढ़े । : लाभ में सूयं-बली वर्षेश सूर्ये लाभ में हो. तो राजा के मन्त्रियों से मित्रता हो लाभ में सहम-अर्थ सहम में शुभ ग्रह हो और वली बुध मुन्या के साथ लग्न में हो और लग्न पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो धातु आदि भूमि सम्बन्धी गडी हुई सम्पत्ति लाभ हो । यदि योग कारक ग्रह पर पाप दृष्टि हो तो उक्त लाभ नहीं होता । लाभ में ग्रह लाभ स्थान में बलवान शुभ या पाप ग्रह हो तो धन लाभ हो यदि ये निर्वल होकर लाभ में हों तो हानि होती है । लाभ में लामेश-लाभेश लाभ में हो अष्टमेश छठे हो तो दुःख और अरिष्ट हो परन्तु पुत्र स्त्री मित्रों का लाभ हो ।

धनेश-धनेश लाभ में हो शुक्र और गुरु नवम में हो तो राजा की मित्रता से स्वर्ण लाभ हो शत्रु का नाश हो ।

'द्वादश (व्यय) भाव में ग्रह फल

व्यय में पाप ग्रह-नेत्र रोग विवाद राजा से या चोर से धन हानि । व्यय में शुभ ग्रह-अच्छे कार्य में खर्चे ।

व्यय में शनि-हर्ष वृद्धि करता है ।

व्यय में सूयं-चित्त में उद्देग,स्त्री से विग्रह,व्यर्थं खर्च,मस्तक,उदर,नेत्रों में पीड़ा, चरण में रोग, शत्रु से विवाद, धन नाश, अनेक पीड़ा, मित्र से बेर, दुःख । व्यय में चन्द्र-पत्काये में धन खर्च, घर में क्लेश, शत्रु भय, कलह, चित्त चंचल, नेत्र रोग, कफ की पीड़ा, गुप्त रोग, भूख कम ।

व्यय में मंगल-व्यथं व्यय, राजा से भय, परिजनों से विरोध, स्त्री के शरीर में "रोग, नेत्र, कान व मस्तक में रोग, विषाद, विवाद, धन क्षय ।

व्यय में बुध-व्यर्थ घन हानि गुप्त चिता, शत्रु से विवाद, कलह, कान व नेत्र में “पीडा, कफ से कष्ट, थोड़ा लाभ । बुद्धि की मंदता ।

व्यय मेंगुरुराजा से भय, नेत्र रोंग, कफ रोग, शरीर में पीड़ा, विवाद, अपवाद, 'धन हानि, शोक भय व हानि, प्रवास, मित्रों से वैर, आपत्ति, स्थान हानि । व्यय में शुक्र-अच्छे काम में धन खर्च, राज भय, प्रवास, ज्वर, वमन, कर्ण रोग, मरण तुल्य कष्ट ।

` व्यय में शनि-व्यर्थ का खचं, शत्रु और धन का नाश, चित्त में विकलता, क्लेश चिता, सिर, नेत्र, हृदय व चरण में पीड़ा।

व्यय में राहु-शत्रु भय, धन की हानि, स्त्री सम्बन्धी चिता से व्याकुलता, आपस

में कलह, सिर, कान, नेत्र, व उदर में रोग, मृत्यु तुल्य कष्ट, स्थान त्याग ।