भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

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बर्षे फल में भाव फल विचार : १९७

. व्यय में सूंयें मंगल-शुक्र लग्न में या वारहवें सूर्य मंगल के साथ हो तो नेत्र रोग हो ।

वर्षे में भाव फल का संक्षिप्त विचार

(१) जो भाव अपने स्वामी से या शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो या मित्र दृष्टि

से दृष्ट हो उस भाव की वृद्धि होती है, जैसे लग्नेश लग्न को पूर्ण दृष्टि से देखता हो

तो उत्तम फल होवे, धन भाव का स्वामी धन भाव को देखता हो तो धन की वृद्धि हो।

( २) कोई भाव पाप युक्त या दुष्ट हो तो उस भाव की हानि होती है यदि

सौम्य या पाप ग्रह मिश्रित हो तो मिश्रित फल होगा ।

( ३) भावेग जिस भाव को देखता हो वैसा कार्य करने वाला होता है ओर

आक्रांत होकर भी देखता हो तो पराये के साथ में कार्य सिद्ध करने वाला होता है।

(४) नीच का और शत्रु के घर में वैठा हुआ ग्रह उस भाव का नाश करता

है। उदासीन राशि में मध्यम फल करता है, मित्र का, स्वराशि का, त्रिकोण में गया

हुआ ग्रह अपने उच्च का या मित्र दृष्टि से दृष्ट हो, वह ग्रह भाव की अवश्य वृद्धि

करता है, अर्थात्‌ उस भाव से होने वाला फल पूर्ण रूप से मिलता है ।

( ५) ६-३-१२ स्थानों में क्रूर ग्रह शुभ और सौम्य ग्रह अशुभ माने जाते हैं ।

अन्य मत है फि ६-८-१२ घर में सौम्य ग्रह इस प्रकार हानि करते हैं कि छठे में

शत्रु की हानि, आठवें में मृत्यु की हानि, वारहवें में व्यय की हानि करते हैं इससे

इनमें सौम्य ग्रह अच्छे और पाप ग्रह बुरे माने जाते हैं ।

( ६) भिम भाव में भावेश सहित लग्नेश हो उस भाव की वृद्धि होती है और

अष्टमेश से युकः जो भाव हो उसकी हानि होती है।

(७) जिम वर्ष में लग्न पंचम या धन स्यान इन तीनों स्थानों में सौम्य ग्रह बैठे हों, उस वर्ष में सुख और सम्पत्ति प्राप्त होती है ।

( ८ ) लग्नेश या राशीश उदयी हो और अपने उच्च का हो या दोनों एक

साथ वँठे हों, उत वर्ष में शुभ होता है ।

(९) लग्न में उच्च का ग्रह हो तो लक्ष्मी प्राप्त हो, चतुर्थं उच्च का ग्रह हो

तो सुख मिले, उच्च का ग्रह सप्तम में स्त्री की प्राप्ति, दशम में राज्य प्राप्ति

कराता है।

(१०) जन्म में जो ग्रह जिस भाव में हो, वर्ष में भी उसी प्रकार हो तो जन्म के

'अह अनुसार ही शुभ या अशुभ फल देते हूँ।

(११) जो ग्रह जन्म में बलवान परन्तु वर्ष में निबेळ हो तो वर्ष के पहिले भाग

सें शुभ फल मंत में अशुभ फल होता है । इसके वि रुद्ध हो तो वषं के पूर्व भाग में

अशुभ फल भंत में शुभ फल करता है। जब जन्म ओर वषं में समान वल हो तो

दोनों भागो में समान फल देता है।

(१२) स्वगृही उच्च का, मित्र ग्रही, शत्रु ग्रही, अस्त नीच भौर हुद्दादि में बैठे

हुए का अच्छी प्रकार बलाबल विचार कर उसके अनुसार फल का निर्णय करना ।

(१३) ग्रहों का फल उन ग्रहों की दशा में होता है।