भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

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बळ

१९८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

(१४) दो भावों के मध्य में जो ग्रह हो तो उसी दशा का भाव फल देता है

जिसमें वह है । और दोनों संधियों से कम हो तो वरत॑मान भाव का और अधिक हो

तो आगे के भाव का फल देगा । यदि ग्रह संधि के समान हो तो कुछ फल नहीं देगा।

इसके लिए भाव की कुछ संधियाँ निकाल कर चलित भाव कुंडली वना लेना ।

(१५) किसी भाव के पोषक का योग कारक ग्रह और उस भाव का स्वामी ग्रह

बलहीन हो तो उसका नाश होता है ।

(१६) जो ग्रह जिस राशि में जन्म में रहतां है वह राशि उस ग्रह की' पद संज्ञक

है । वह पद संज्ञक राशि वर्ष में यदि वली हो तो जन्म में वह राशि जिप भाव में

रहती है उस भाव सम्वन्धी शुभ फल होता है । यदि वर्ष में वह राशि निर्बल हो तोः

अशुभ फल होता है ।

(१७) जन्म में केन्द्र में स्थित पाप ग्रह यदि वर्ष लग्न में हो तो रोग होता है ।,

(१५) जन्म में जिस राशि में गुरु और शुक्र हों, उसी राशि में वर्ष में मंगल हो;.

अस्तंगत भी हो तो पाप, तिल्ली, गलगंड, शीत, पित्त, सर्दी आदि के रोग होते हैं ।

(१९) वर्ष लग्न, मुंथा, मु थेश, वर्ष लग्नेश ये सव पाप ग्रहों के वीच में हों तों

रोग होवें ।

(२०) चंद्र जैसे-जैसे अंशो में बढ़ता है शुभ फल देता है और जैसे-जैसे घटता

जाता है, अशुभ फल करता है ।

(२१) पंचवर्गी बल के अनुसार ग्रहों के ३ प्रकार के बल इस प्रकार हैं ५ विश्वा

से कम-बलहीन । ५ से १० विशवाबल-मध्यवली । १० से २० विशवावल-पूर्णंबली ।

(२२) वर्ष लग्नेश, वषश, मु था, मु थेश ये सव अपने बल के अनुसार अपनी

दशा में फल देते हैं । >

(२३) वर्ष लग्न, जन्म लग्न से ६-८ भाव में हो तो आथिक हानि मृत्यु या मृत्यु

तुल्य कष्ट हो । (२४) जन्म में जो ग्रह शुभ भावों के स्वामी हों वे यदि वषे में केन्द्र त्रिकोण

या शुभ भाव में हों और वे पूर्ण बली हों तो वर्ष में उन-उन भावों की वृद्धि कर.

लाभ पहुंचायेगे । म (२५) त्रिकोण में गुरु सुर्य शनि या मंगल हो तो उस वर्ष धनहानि हो । (२६) शुक्र कन्या राशि में या अस्त हो और चंद्र भी वृश्चिक राशि में हो तो. वह वर्ष अशुभ हो ।

(२७) सूर्यं चंद्र एक राशि में हों या दोनों ६-८-१२ में हों तो वह वर्ष अनिष्ट: कारक होगा । 2

(२५) चंद्र पाप युक्त या दृष्ट हो तो उस वर्ष चित्त में अशान्ति हो चिन्ता हो । (२९) ३-४-७ भाव में पाप युक्त शनि हो तो उस वर्षो भर रोग होते रहें ।

(३०) जन्म में जिस राशि पर शुक्र हो, उस राशि पर वर्ष में वर्षेश हो तो बिवाह या स्त्री सुख हो ।