भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 280 में से

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४२०६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफलखण्ड

(५) पंचम में मासेश-सन्तान का सुख, स्त्री से विलास,'घनागम, शत्रु और

रोग का नाश, सुख, अर्थ की सिद्धि ।

(६) षष्ठ में मासेश-कार्य नाश, शत्रु का उदय, रोग हो, वाहन और धन

को हानि.।

(७) सप्तम में मासेश-व्यापार में लाभ, धान्य की वृद्धि, स्त्री का सुख हो ।

*यदि शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तव उपरोक्त फल होता है ।

(८) अष्टम में मासेश-बलू बुद्धि की हानि, शरीर की हानि, लक्ष्मी का वियोग

“देश विदेश में भ्रमण, पुत्र और भाई को दुःख ।

(९) नवम में मासेश-धर्म की वृद्धि, भाग्योदय, मित्र लाभ, स्त्री विलास,

सन्तान सुख । |

(१०) दशम में मासेश-प्रताप की वृद्धि, पुत्र सुख, धन धान्य का लाभ, स्त्रियों

का विलास, सर्वे अर्थो की मिद्धि हो ।

(११) लाभ में मासेश-यदि शुभ युक्त या शुभ दृष्ट हों तो बहुत लाभ हो, हषं

हो, विलास, स्त्री और घर का सुख ।

(१२) व्यय भाव में मासेश-धन का खर्च, धान्य का नाश, स्त्री को कष्ट, पुत्र

सुख की हानि, शत्रु का आतंक, मस्तक एवं शरीर में पीडा ।

सास प्रवेश का मास फल का संक्षिप्त विचार

मास प्रवेशा काल में लग्न के नवांश के स्वामी की लग्नेश से या उसके नवांशेश

:से मित्र दृष्टि हो या दोनों एक साथ हों तथा चंद्रमा की उन दोंनों पर मित्र दृष्टि

(३, ५, ९, ११) हो तो उस महीने में मास प्रवेश जब तक हैं सुख और निरोगता रहे

यह बलाबल एवं दृष्टि योग से विचार कर फल का निर्णय करना ।

यदि वही लग्न नवांशेश और लग्नेश का नवांश स्वामी ये. दोनों परस्पर शत्रु

-दुष्टि से देखते हों या चंद्रमा भी शत्रु दृष्टि से देखे तो मानसिक दुःख देते हैं। यदि

लग्नेश या लग्नेश का नवांशेश में कोई नीच का या अस्तंगत हो तो बड़ा कष्ट भोग

-कर सुख पावे और यदि .दोनों नीच में या अस्तंगत हों और चंद्रमा शत्रु दृष्टि से देखे

“तो मरण हो । परन्तु इसी मास में जन्म तथा वर्ष का भी अरिष्ट हो तो मृत्यु होती

“है अन्यथा मृत्यु तुल्य कष्ट हो । यदि जन्म का अरिष्ट उस महीने में हो वर्ष में न हो

“तो मास के पूर्वाद्ध में मृत्यु तुल्य कष्ट हो और वर्ष का अरिष्ट हो जन्म का उस मास

“भै न हो तो मास के उत्तराद्ध में उक्त अरिष्ट होता है।

ऐसा ही सम्पूर्ण भावों का विचार करना कि जिस भाव का नवांशेश तथा उस

“भावेषा के नवांशेश परस्पर मित्र दृष्टि से देखें और चंद्रमा भी इनको मित्र दृष्टि से

“देखे तो इस मास में उस भाव सम्बन्धी शुभ फल होता है यदि उक्त ग्रह परस्पर शत्रु

दृष्टि से देखें या युक्त हों तथा चंद्रमा भी इन्हें शत्रु दृष्टि से देखे तो उस भाव सम्बन्धी

कष्ट होगा । ऐसे ही नीच या अस्तंगत में से एक या दोनों हों तो भी कष्ट होगा ।

"ऐसा सव भाव से विचारना ।

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