सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमासेश ओर दिनेश का फल : २०७
लग्नेश मासेश वर्षेश और लग्न नवांश स्वामी ये चारों या इनमें से कोई जिस “भाव नवांश पति से मित्र दृष्टि से युक्त या दुष्ट हों और चंद्रमा भो मित्र दृष्टि से युक्त या दुष्ट हो तो उस भाव के सम्वन्ध से सुख होता है। ऐसे योग में जो जन्म काळ में इस भाव सम्बन्धी अनिष्ट फल हो तो यहाँ मध्यम फल होगा । जो जन्म में “भी. शुभ फल देने वाला हो तो यहाँ अधिक शुभ होगा । एसे ही वलहीन होवे और शत्रु दृष्टि का होवे तो अनिष्ट का बुद्धि से विचार लेना ।
„ ६-८-१२ भाव के स्वामी और इनके नवांश स्वामी निर्वेल हों और भावों के
स्वामी सवल हों तो शुभ फल देते हैं । यदि ६-८-१२ के नवांश स्वामी सवल हों और
भावों के निर्वळ हों तो कष्ट होता है ।
लग्नेश मासेश वर्षश और मुंथेश ६-८-१२ भाव में हों पाप युक्त हो और ग्रहों से
"शत्रु दृष्टि से दुष्ट हों तो इस मास में रोग आदि से क्लेश हो और दानु द्वारा दुःख
प्राप्त हो ।
लग्नेश, “मासेश और वर्षश वलवान हो तथा केन्द्र त्रिकोण ओर लाभ में हो तो
“निरोग हो शत्रु नाश हो और कुलानुमान से राज्य लाभ हो, मानव कीति को प्राप्त हो।
मास प्रवेश कुण्डली में साव में ग्रह फल
(१ ) लग्न में सुर्य-मस्तक नेत्र और मुख में पीड़ा, चित्त में उद्वेग, स्त्री के
शारीर में पीड़ा, वहुत चिन्ता ।
लग्न में चंद्र-कास तथा स्वासादि का रोग मुख और नेत्र में पीड़ा । पूर्ण चंद्र हो
मतो धन का लाभ करे । शुभ युक्त या दृष्ट शुभ फल । पाप युक्त या दुष्ट दुष्ट फल ।
क्षीण चंद्र हो तो अशुभ फल ।
लग्न में मंगल-कलह, धन खर्च, रक्त पित्त का रोग, मस्तक मुख व नेत्र में रोग ।
- लग्न में बुध-राजा से मान यश, तेज बल की वृद्धि, वुद्धि की वृद्धि, देह सुख
"आप्त ।
लग्न में गुरु-पुत्र स्त्री से सुख, राजा से सम्मान, लाभ, वात रोग ।
लग्न में शुक्र-राजसमान, कुल की वृद्धि, हषं सुख, जगतप्रीति ।
लग्न में शानि-सिर मुख पेट में रोग, कफ बात की पीड़ा, मित्र से वेर, स्वगृही
ग्या उच्च का हो तो शरीर सुख देता है ।
लग्न में राहु-पुत्र मित्र आदि का कष्ट, धन नादा, कलह, वात पीड़ा, वस्त्र
आदि का कष्ट ।
लग्न में केतु-शिर में रोग ताप, विदेवा से भय, उद्वेग, स्त्री आदि की चिन्ता,
"चोट, शरीर में व्यथा ।
मास प्रवेश में धन में सुयं-धन नाश, राजा अग्नि चोर शत्रु से झगड़े में धन
हानि, कुटुम्ब में कलह । धन में चंद्र-इष्ट मित्रों से लाभ हो । पूर्ण चंद्र हो तो सवेत वस्तु के व्यापार से
अन लाभ हो ।