सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 224, कुल 280 में से
संदर्भ में पढ़ें२१६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थं वर्षफल खण्ड
मेष राशि हो तो १ प्रवास से वर्तमान चन्द्रदशा तक गिनना, वृष राशि में
नाश से, मिथुन में मरण से ककं में जय से इसी प्रकार मीन में बारहवीं स्थिर दशा
से गणित से प्राप्त वर्तमान अवस्था की संख्या तक गिनने में जो अवस्था आवे उसे
लेना जैसे वृश्चिक के चन्द्र में ८ के आगे प्राप्त ४ तक गिना तो १५वीं कंपित आई ।
उपरोक्त कर्क के चन्द्र में वर्तमान चौथी अवस्था आई तो ४ जय से आगे गिना
चौथी क्रीडित अवस्था आई । अन्य मत से राशि कोई भी हो गति से जो वर्तमान
संख्या उसे प्रवास से ही गिनकर अवस्था निकालते हैं ।
अध्याय २३
पुन्या का फल विचार
जिस राशि पर मुंथा हो उस राशि का स्वामी मुंयेश कहलाता है। मुथा अपने
स्वामी (मुंथेश) से या शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो सुख होता है । यदि वह शत्रु पाप
अल्प वली ग्रह से दृष्ट हो तो भय और रोग होता है। भाव,दृष्टि और योग विचार
कर फल निर्णय करना ।
वर्ष लग्न से मुन्था ४, ७, ६, ८, १२ स्थानों में अशुभ फल देती है और ९,१०,
११ स्थानों में सुखदायक होती है और १, २, ३, ५, स्थान में उद्यम करने से धन
देती है ।
जो भाव पाप युक्त हो या जिस पर क्रूर ग्रह की शत्रु दृष्टि हो यदि उत भाव में
मुन्था हो तो वह शुभ स्थान गत भी हो तब उस स्थान का शुभ फल नहीं देती परन्तु
अशुभ फल बढ़ाती है ।
जो मुन्था शुभ ग्रह से या मुंथेश से युक्त दृष्ट हो तथा मुन्येश बलवान हो या
शुभ ग्रह या मुन्येश से इत्यशाली हो तो जिस भाव में वह मुन्या है उसके फल को
बढ़ाती है । अशुभ फल नहीं होता । इसके विपरीत हो अर्थात् मुन्येश व शुभ ग्रहों से
युत दृष्ट न हो निबंल हो और पाप ग्रह से मूसरीफ योग करती हो तो उस भाव के
शुभ फल को नाश कर अशुभ फल बढ़ाती है।
जन्म लग्न से ४, ७, ६, ८, १२ स्थान में मुन्या हो पाप ग्रहों से युक्त दृष्ट भी
हो वैसी मुन्या वर्ष छग्न से जिस भाव में पड़े उस भाव के फल को नाश करती है ।
यदि शुभ ग्रह व अपने स्वामी से दृष्ट हो तो हानि नहीं होती शुभ ही' होता है ।
मुन्या जन्म लग्न से तथा वर्ष लग्न से शुभ स्थान में हो पाप युक्त या दृष्ट न
हो तो उस भाव सम्बन्धी शुभ फल बढ़ता है । जैसे जन्म लग्न से और वर्ष लग्न से