सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 225, कुल 280 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुत्या का फल विचार : २१७
सुन्था पंचम स्थान में शुभग्रह या मुन्येश युक्त दृष्ट हो तो पुत्र वृद्धि करती है
इत्यादि । यदि जन्म तथा वर्ष लग्न से अनिष्ट स्थान में हो तथा पाप युक्त दृष्ट व
पाप से इत्थशाली हो तो उस भाव का फल अवश्य नष्ट होगा ।
जन्म लग्न से ४, ६, ८, १२ दुष्ट भाव में तथा वर्ष में भी अनिष्ट स्थानों में हो
पाप ग्रह युक्त दृष्ट स्वामी के अस्तंगत आदि से निर्बेल हो तो उस भाव को नाश
करती है और अपने स्वामी से युक्त दृष्ट व इत्यश्ाळ से शुभ फलद होती है ।
जन्म लग्न से मुन्था चतुर्थ भाव में शुभग्रह युक्त हों तो पिता को धन भूमि
राभ कराती है ऐसे ही पाप युक्त हो तो राजा से भय और आजीवन अति कष्ट
होवे । ऐसे ही जन्म लग्न से अष्टम में शुभ युक्त हो तो शुभ फल होगा पाप युक्त
होने से अनिष्ट फल देगी । ऐसे ही षष्ठादि स्थानों में भी विचारना ।
वर्ष लग्न में मुन्था स्वस्वामी या शुभग्रह युक्त दृष्ट जिस भाव में हो वह जन्म
सर्न से जो भाग में हो वह उस भाव की वृद्धि करती है। जैसे वर्ष में मुन्या चतुर्थ
में शुभ ग्रह वा स्वामी से युक्त दृष्ट है और जन्म लग्न से गिनने से यह भाव तीसरा
'होता है तो इस वर्ष में भाई के सम्बन्ध में शुभफल होगा । और पाप युक्त वा दृष्ट
जिस भाव में हो वह जन्म लग्न से जो भाव हो उसकी हानि होती है । परन्तु वर्षेश
ली तथा शुभ ग्रह हो तो पाप युक्त मुन्या का पूर्वोक्त फल नहीं होगा ।
मुन्थेश और वर्ष लग्नेश दोनों वक्री, नीच या अस्त हों तो उस वर्ष में घन
हानि, मानसिक चिता, सन्तान चिता आदि हो ।
जन्म लग्न से मुन्था ६-८-१२ भाव में हो और वर्ष में भी जिस भाव में हो
उस भाव की हानि होती है जैसे लाभ में हो तो लाभ भाव सम्बन्धी हानि हो ।
मुन्या, वर्ष मुन्थेश, वर्षेश, वर्ष लग्न और वर्ष लग्नेश ये सब पाप ग्रह से दृष्ट
हों तो उस वर्ष बहुत कष्ट हो ।
लग्न में वर्षेश होकर बुध मुंथा के साथ हो तो परीक्षा इण्टरभ्यु आदि में
सफलता हो ।
मुन्येश, वर्षे लग्नेश, वर्षश, और जन्म लग्नेश यदि ये ६-८-१२ में हों या पाप
युक्त या पाप दृष्ट हों तो उस वर्षे बहुत कष्ट हो ।
भाव के अनुसार वर्षे में मुन्या का फल
(१) लग्न में मुन्या--शत्रु का नाश, पुत्र लाभ, राजा की कृपा, सन्मान, प्रताप
की वृद्धि,शरीर पुष्टि, उद्योग से धन और सुख, मन में संतोष, पराक्रम ।
(२) द्वितीय भाव में मुन्या--उद्योग से धन लाभ, राजा का आश्रय, बन्धुओं से
-सन्मान, तेज वृद्धि, शरीर पुष्टि, सुन्दर भोजन, उत्साह, सुयश, तोथंगमन, सुखप्राप्ति
अनिष्ट का नाश हो, शत्रु को संताप हो ।
(२) तृतीय मे--पराक्रम से धन यश सुख लाभ, सहोदर वन्धुओं से सुख, शरीर
पुष्टि, राजा से सहायता मिले, जय प्राप्त हो, देव ब्राह्मण और गो में भक्ति, मनोरथ
पुणं हो ।