भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

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मुन्या का फल विचार : २१९ -

सुख की वृद्धि हो, सन्मागे द्वारा द्रव्य लाभ, बन्धु मिलन, सत्संग, सत्कथा श्रवण) .

सन्मान बढे । यदि ऐसी मुन्था पर पाप दृष्टि या पाप युक्त हो तो कष्ट होता है ।

(४) गुरु-गुरु से युक्त या दृष्ट या गुरु की राशि में मुन्या हो तो पुत्र व पुत्री `

का सुख हो सुवणं वस्त्र और रतन का लाभ, सुकृत कार्य से मन, बुद्धि और ऐश्वयं

बढ़े । यदि शुभ ग्रह से मुन्था का इत्थशाल होता हो तो राज्य का लाभ होता है ।

(६) शुक्र--शुक्र युक्त यां दृष्ट मुंथा हो तो शत्रु का पराजय, बन्धु सुख, सुन्दर |

स्त्री का सुख, पुत्र सुख, सम्मान बढे, राजा के आश्रय से धन बढ़े 1

(७) शनि--शनि युक्त या दृष्ट या शनि की राश्षि में हो तो वात रोग हो,

अपमान हो, अग्नि भय, धन की हानि हो, मन में दुष्ट विचार, कल्ह से चिन्ता, -

ऐश्वर्य वाले उन्मत्त पुरुष से विभव रहित होवे यदि गुरु से इत्यशाल हो या गुरु कीः

दृष्टि हो तो शुभ फल की प्राप्ति होती है।

(८) राहू--मुंथा राहु के मुख (भोग्यांश) में हो तो धन की प्राप्ति, यश, सुख

और धर्मे वृद्धि हो यदि गुरु या शुक्र से युक्त या दृष्ट हो तो अच्छा स्थान (पद) की `

प्राप्ति होती है, सुवर्ण रत्न तथा वस्त्रों का लाभ होता है।

यदि मुन्था राहु के पृष्ठ (मुक्तांश) में हों तो शुभ फल नहीं मिलता । मुंया राहु

से सप्तम पुच्छ में केतु के साथ हो तो शत्रु से भय और कष्ट हो पदि पाप ग्रह से `

दुष्ट हो तो घर में संचित धन या घर और सम्पत्ति का नाश होता है।

जन्म लग्न से सप्तम स्थान में राहु रहने से धन और सम्पत्ति का नाश होता `

है | सारांश यह है कि जन्म काल में मुंथा जन्म लग्न पर ही रहती है और गत वषं `

तो है ही नहीं । और राहु के सप्तम स्थान में पुच्छ है। यदि लग्न से सप्तम स्थान

में राहु रहे तो सप्तम से सप्तम स्थान लग्न ही पुच्छ होगा । जन्म में वहीं पर सुन्या :

के रहने से उपरोक्त फल होगा ।

राहु के भोग्यांश मुख है भुक्तांश पृष्ठ है । जैसे मान लो राहु स्पष्ट ३-५-१०¬

१५ कर्क राशि का राहु है तो ककं के ५-१०-१५ ये भोग्यांश मुख कहलाये क्योंकि

वक्र गति से राहु चरता है और इन बंशों को ३० में से घटाने पर शेष २४-४९- `

५४ में भुक्तांश (पृष्ठ) हुए । ककं का राहु है तो इससे सप्तम मकर हुई यही राहु.

की पुच्छ हुई । राहु से सप्तम सदा केतु रहता है इससे राहु की पुच्छ केतु ही है ।

मुन्येश फल विचार

धन नाश रोग--मुन्था का स्वामी मुंथेश होता है । यदि मुन्थेश ६-८-१२-४

स्थान में हो.या अस्त हो या पापाक्रान्त राशि (क्रूर ग्रह) से ४ या सातवां हो अर्थात्‌ `

शत्रु दृष्टि हो तो शुभ फल नहीं होता रोगोत्पत्ति और धन नाश भी करता है।

मरण कष्ट--मुन्थेश वपं लग्न से अष्टमेश युक्त हो या क्षुत दृष्टि (१-४-७-

१०) से दुष्ट हो तो शुभ फल नहीं देता यहाँ यदि दोनों योग हों अर्थात्‌ दोनों ग्रह

एक साथ ही किसी राशि में हों तो मरण फल होता है। इसमें भी विचारना कि

यदि ६-८-१२ स्थान में यह योग हो अष्टमेश पाप से युक्त हो तो अवशय मरण हो।-