भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

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पृष्ठ 228

“२२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

यहाँ अष्टमेश का तथा मुन्येश का जो धातु हो उसके दोष से रोग कहना । एक ही

“योग हो अर्थात्‌ क्षुत दृष्टि से अष्टमेश से मुन्येश देखा जाय तो मरण के समान कष्ट

“होता है।

शुभ अंश फल- जन्म काल में मुन्था या मुन्थेश शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो

"तो पूर्वा में शुभ फल देता है । मुत्या और मुन्थेश दोनों शुभ ग्रह युक्त व दृष्ट हों

  • तो अति शुभ फल वपं के पूर्वाद्ध में देते है तथा वर्ष काल में मुन्या या मुन्थेश शुभ

ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो वर्ष के उत्तराद्ध में शुभ फल देते हैं तथा मुन्था मुन्येश शुभ

ग्रह युक्त दुष्ट हो तो अति शुभ फल वर्ष के उत्तराद्ध में हो। ऐसे ही जन्म में मुन्या

-मुन्थेश में से एक भी पापग्रह युक्त या दृष्ट हो तो वर्ष के पूर्वाद्ध में अशुभ फल

«हो । दोनों पाप युक्त दृष्ट हों तो अति अशुभ । यदि वर्ष में मुन्या मुन्येश में से एक

ग्रह पाप युक्त दृष्ट हो तो वर्ष के उत्तराद्ध में अशुभ फल यदि दोनों में हो तो अति

अशुभ फल हो ।

भय, कष्ट, कलह--मुन्येश द्वादश और अष्टम स्थान में वलहीन हो पाप ग्रह

  • या पाप ग्रह के वर्ग में हो तो उस वर्ष कष्ट, भय, मनुष्यों से विवाद और स्वजनों के

साथ अत्यंत कलह हो ।

मित्रता, श्रेष्ठ बुद्धि-वर्ष में मुन्येश, नवम, लाभ, तृतीय या केन्द्र में हो तो

“राजाओं के साथ मित्रता हो प्रताप बड़े बुद्धि श्रेष्ठ हो ।

सुख--मुन्येश, वर्ष लग्नेश, जन्म ऊग्नेश बलवान्‌ होकर केन्द्र त्रिकोण धन या

“लाभ स्थान में हो तो धन सुवर्ण, वस्त्र आदि की प्राप्ति हो सुख हो ।

सन्मान, धन- मुन्येश या उसका मित्र शुम ग्रह हो और बली होकर मुन्था

को देखता हो तो मनोरथ पूर्ण हो, राजा से सन्मान व धन लाभ हो ।

बल अनुसार फल--शुभ-अशुभ मिश्रित मुंथा का फल मुन्थेश की दशा में

“विचारना । मुन्थेश पूर्ण बली हो तो पूर्ण फल, मध्यम वली से मध्यम और हीन बली

  • से हीन फल अनुमान करना । मुन्था जिस ग्रह से युक्त हो उस ग्रह का वल भी देख

कर फल निर्णय करना ।

कष्ट पीड़ा--मुन्थेश और लग्नेश एक साथ अष्टम में हों तो मरे हुए सदृश कर

१ देता है या कंठावरोध, रक्त विकार या गुह्य न्द्रिय पीड़ा करता है ।

रोग पीड़ा--मुन्थेश अष्टम हो दशमेश नवम पंचम घर में हो तो शरीर पीड़ा

` आतृ कष्ट या गुल्म रोग हो ।

धन सुख, लाभ--मुन्थेश बलवान हो वर्ष छग्नेश या जन्म लग्नेश केन्द्र त्रिकोण

“या धन में हो तो सुख हो धन सुवणं वस्त्र आदि का लाभ हो ।

सुख कीति--मुन्थे केन्द्र त्रिकोण लाभ या धन स्थान में हो तो राज्य सुख,

~कीति बंधु सुत आदि का सुख हो !

रोग से शरीर नष्ट-मुन्थेश अष्टम हो अष्टमेश सूर्यं मंगळ से युक्त हो तो कफ,

शपित्त रोग से शरीर नष्ट हो ।