भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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२५६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड

(१६) सम समाख्य कम्बल

चंद्र एवं कार्येश लग्नेश भी सम ग्रह

रे हृदुदा आदि में हो यहाँ लाभ प्रश्न में:

लाभेश मंगल, लग्नेश शनि सम हुद्दा में

है । दोनों का इत्थश्याळ योग है । चंद्र भो

सम शुक्र की हद्दा में है दोनों से इत्थशालः

  1. पथ८ | करता है यह सम समाख्य कम्बूल हुआ । | लाभ मध्यम होगा। न वहुत न अल्प होगा ।

यहाँ पीछे वताई मैत्री के अनुसार ही २-६-८-१२ स्थान के ग्रह सम समझे

जाते हैं उसी अनुसार सम का विचार करना । सम ग्रह के विचार से सम ग्रह की हृददा, सम ग्रह का द्रेष्काण सम ग्रह का नवांश इसमें इनमें से कोई होना ।

९ गैर कम्बुल-गैर' कबूल-अस्वीकार

जव लग्नेश और कार्येश का इत्थशाल हो और चंद्रमा शून्य मार्गी हो । चन्द्रमा के लग्नेश तथा कार्येश इनमें से किसी का इत्थशाल योग न हो | ऐसा चन्द्र यदि

राशि के अन्त में हो जो आगे की राशि में प्रवेश करने वाला हो । जव चन्द्र आगे

की राशि में प्रवेश करे वह राशि जिस ग्रह का स्त्र गृह या उच्च स्थान हो वह ग्रह

यदि इसी राशि में वहाँ स्थित हो और उस ग्रह के साथ चंद्र इत्थशाल करे तो वह गैर कम्बूल योग होता है ।

इस योग में तीसरे मनुष्य की सहायता से काम होगा ।

यदि अन्य राशि में स्थित चन्द्र इस राशि में स्थित स्त्रग्रह आदि अधिकारों सेः रहित ग्रह के साथ इत्यशाल करे तो वह अशुभ फल देने वाला है।

शुन्य सार्गो--जो ग्रह स्वगृही अपने उच्च में या अपनी हददा, अपने द्रेष्काण

अपने नवमांश ऐसे कोई शुभ अधिकार का न हो तथा नीच शत्रु गुही! आदि अशुभ

अधिकारी भी नहीं हो तथा पदहीन सम द्रेष्काण हदूदा नवांश अधिकार भी न हो

और उस पर पाप या शुभ किसी प्रकार के ग्रह की दृष्टि भी न हो तो यह शून्य मार्गी या शून्याध्वग कहलाता है। यह भी कम्वूल भेद के तुल्य फल देता है। दुसरे जो राशिस्थ शून्याध्वग गैर कम्वूल अशुभ फल देता है । उदाहरण--

२९ ९ यहाँ लग्नेश सूर्य सप्तम में ६० पर

जज है । नवम भाव सम्वन्धी प्रश्‍न में कायेंश

3

मंगल नवम भाव में है। इन दोनों का

इत्यशाल है । चंद्र धन भाव में २९? पर

है । यहाँ चंद्र शून्य मार्गो है वह लग्नेश

। EE १मं१० कार्येश किसी से इत्थशाळ नहीं करता

परन्तु चंद्र जब आगे सहज भाव में

पहुंचेगा तो वहाँ स्वग्रही शुक्र से वह