भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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ताजिक के १६ योग : २५७

कर

इत्यशाल करेगा । यह गैर कंवूल योग हुआ । तीसरे मनुष्य की सहायता से कार्य होगा] इ्चंर > यदि इस कुंडली में तीसरे भाव में शुक्र के स्थान में बुध हो । यह बुध न तो स्वगृही है और न उच्च में है अधिकारहीन' है। यदि चंद्र बुध के साथ इत्यशाल क्रे

Do, तो यह भी गैर कम्बूल योग होता है वम्‌+ नो १मं१०| यह अशुभ फल देने वाला है ।

| (१०) खल्लासर-खलास=छूटा हुआ ।

चंद्रमा शून्य मार्गी हो (जैसा पहिले वता चुके हैं) यह चंद्र लग्नेश या कार्येश के साथ इत्थशाल न करे और न वह लग्नेश कायश में से किसी के साथ हो और लग्नेश कार्ये का इत्थशाल हो यह खल्लासर योग होता है और कम्बू के फल को नाश करता है। यह शुभ फल नहीं देता अशुभ फल देता है ।

यहाँ पुत्रभावेश गुरु कार्येश है ।

छग्नेश सूर्य से इत्यशाल है । चंद्र धन

भाव में २६० पर है । यह चंद्र लग्नेदा

या कार्येश किसी से इत्यशाल नहीं करता

और न लग्नेश कार्येश के साथ ही है।

यह खह्लासर योग पुत्र प्राप्ति में

वाधा करेगा ।

(११) रह=निकम्मा=दु्बेल=निस्तेज ।

दुर्बल प्रह लक्षण--जो ग्रह अस्त, नीच राशिगत, चत्रुगृही, वक्रगति व अस्त होने वाला हो या समीप में ही उदय हुआ हो या बाळ वृद्ध हो या खल स्थान अर्थात्‌ तात्कालिक शत्रु स्थान या पाप युक्त व क्र्राक्रात हो वह ग्रह दुर्वळ कहलाता है। रद्द योग- ऐसा दुवंल या निस्तेज ग्रह जब किसी भावेश (कार्ये) के साथ इत्थशार करे तो वह ग्रह आदि में या अन्त में इत्यशाल से होने वाळे फल को नहीं देता गा निवँल होने से किसी का तेज न आप ले सकता है और न किश्ी को दे सकता है।

यहाँ इस रदूद योग के २ भेद हो जाते हैं।

(१) जब उपरोक्त प्रकार का दुर्बेल कार्येश ग्रह केन्द्र में हो ओर लग्नेश ग्रह

ु्वेल कार्योदा से आपोक्लिम (३-६--९-१२) घर में हो और दोनों का इत्यक्षाल योग

हो तो उस इःथशाल का समस्त फल नष्ट नहीं होता किन्तु वह कार्य सिद्ध होकर अन्त में नष्ट हो जायगा ।

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