भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

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२६० ¦ सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

यहाँ मेष में २.शीघ्री ग्रह सूयं और

मंगल हैं। सूर्य उच्च का है और मंगल

स्वगृही है। इनके साथ नीच का शनि

लग्नेश है । इससे अन्य की सहायता से

कार्य होगा । तीसरे भाव सम्बन्धी कार्य

का कार्ये गुरु नीच में लग्न में है और

लग्नेश शनि मेष में नीच का है। इन

दोनों के इत्यशाल से कार्य नहीं होना

शा वर्योकि दोनों निर्बल हैं। परन्तु लग्नेश दो पद युक्त शीघ्री ग्रह के साथ होने से

यह कार्य अन्य की सहायता से होगा !

(१४) तंवीर योग-तदवीर ।

जब लग्नेश और कार्येश का इत्थशाल न हो और उनमें से एक ग्रह राशि के

अन्त में हो अर्थात आने वाली राशि में जाने वाला हो जहाँ अर्थात्‌ आगे वाली राशि

में कोई ऐसा स्वगृही उच्च आदि पद युक्त बलवान ग्रह हो जो ऐसे अंशोंमें हो कि

वहाँ आने वाला उससे भविष्य में इत्यशाल कर सके तो यह तंवीर योग हो जाता है।

यहाँ राज्य सम्बन्धी प्रदन में राज्येश

सूर्य और लग्नेश मंगल इनका इत्यशालू

नहीं है। शीघ्रगामी सूर्य २९० पर राशि

के अन्त में कुंभ राशि में है। वह आगे

मीन राशि में जाने वाला है जहाँ स्वग्रही

(बलवान) गुरु है। मीन में सूर्य जाने

पर भविष्य में लग्नेश से इत्थशाल करेगा और वह गुरु से भी इत्यशाल करेगा ।

यह तंवीर योग हो गया । सूर्य ने अपना तेज गुरु को दे दिया । इस योग से अभीष्ट

कार्यं की सिद्धि होगी ।

(१५) कुत्थ योग-कुब्व-बलिष्ठ-शुभ ।

बल वा बहुत प्रकार से विचार होता है ।

(१) जो ग्रह स्वग्रही, उच्च, स्वनवांश, स्व. हृददा, स्व द्रेष्काण में हो । (२) केन्द्र में हो । (३) ग्रह जो लग्न में हों या लग्न को देखते हों । (४) ग्रह जो अच्छे ग्रहों (शुभ ग्रह) से युक्त या दृष्ट हों । (५) पाप ग्रहों का १, ४, ७, १० में योग या दृष्टि

से रहित हो, (६) उदयी हो, (७) जो काल बळ से युक्त हो । (८) जो ग्रह वक्री

होकर मार्गी हुआ हो ।