भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 280 में से

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ताजिक के १६ योग : २६१

शुक्र चंद्र मंगळ यदि सायंकाळ में उदित हों तो बलवान होते हैं । गुरु शनि अर्द्धरात्रि के उपरांत वली होते हैं।

पुरुष ग्रह सूर्य मंगल गुरु दिन में बलवान होते हैं । स्त्री ग्रह चंद्र बुध शुक्र रात्रि में बलवान होते हैं । स्त्री ग्रह ४ से ९ भाव तक, पुरुष ग्रह १९ से ३ भाव तक बली' “होते हैं । सबसे बलवान लग्नस्थ ग्रह है। उसके अभाव से केन्द्रस्थ (४-७-१०) ग्रह उपरोक्त से कम वली है । पणफर (२-५-८-११) का ग्रह उससे कम वली, आपोबिलम (३-६-९-१२) का ग्रह उपरोक्त से कम वली है । मध्यगति वाळा ग्रह “बलवान होता है । मध्यम गति ५९-५” है ।

ग्रह छग्नगत पणफर आपोक्लिममें संधि में इसी वळू पूर्ण ६०० ३० १५१ अनुपात से बल

सूये जिस नवांश में हो उस नवांश की राशि में कोई ग्रह स्थित हो तो वह्‌ -वळवान होता है। जैसे सूर्यं वृष के १०° पर है तो मीन का नवांश हुआ | यदि "कोई ग्रह मीन में हो तो वह बलवान समझा जायगा ।

'बल का प्रयोजन

कई प्रकार के बल कहने का प्रयोजन यह है कि इस्थशार कर्ता व इत्यशाल

"जिस ग्रह से हो ये जैसे बली हों वैसा फल देंगे । यह उक्त भेदों से किसी प्रकार वळी “जो इत्यश्षाली ग्रह है उसी को कुत्य योग कहते हैं। कुत्थ दाव्द से बली प्रह

नहीं समझना ।

(१६) इुरुफ या दुरित योग । दुरित=वना काम विगाड़ना ।

इभमें ग्रह वलहीन होते हैं । इस्थशाल योग में वे इच्छित कार्य करने में समर्थ नहीं होते ।

(१) जो ग्रह ६-५-११ स्थानों में हों (२) अस्तंगत हों (३) तत्रुक्षेत्री हों

(४) नीच राशि में हों। स्वगृही या उच्च का न हो। (५) वक्री हो । (६) वक्रा-

भिलाषी हो। (७) क्रूर ग्रहों से युक्त हो (८) पाप ग्रह नीच या शात्रुक्षेत्री ग्रह से इत्थशाल करता हो (९) क्रूर ग्रहों से क्षुत दृष्टि (१-४६-१०) से दृष्ट हो (१०) १२-६-८ स्थानों में स्थित ग्रह से इत्यशाल करने वाळा हो। (११) अपने

स्वग्रृह से सप्तम स्थान में स्थित हो, जैसे वृष राशि का शुक्र स्वगृही है उससे सप्तम

वृश्चिक राशि में यदि हो। (१२) जो ग्रह राहु के पुच्छ या मुख में हो (राहु का

पुच्छ=राहु का भुक्तांश । राहु का मुख-भोग्यांश) (१३) जो ग्रह लग्न को न देखे ।

चन्द्रमा--सुयं से १२वें स्थान में चन्द्र हो या तुला के उत्तरार्ध (६रा-१५०) के

-बाद और वृश्चिक के पूर्वाद्धं (७-१५०) तक में स्थित हो या क्षीण चन्द्र हो तो चन्द्र

-बलहीन होता है। चन्द्र जिस राशि में हो उसका स्वामी उसे न देखे । या चंद्र को

कोई ग्रह न देखे । या चन्द्रमा शून्याध्वग हो अर्थात्‌ स्व उच्च आदि शुभ अधिकार से

“रहित (पदहीन) हो तो चन्द्रमा निर्बेल होता है ।

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