सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 272, कुल 280 में से
संदर्भ में पढ़ें२६४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थं वर्षफल खण्ड
चन्द्र नष्ट बली-धन ध्रमं का नाश, स्वजनों से विरोध, अपवाद से भय, ज्वर
कफ खांसी आदि रोग, दुष्ट स्थान प्राप्ति, बुरा भोजन, पाप की ओर झुकाव ।
विचार-पदि निदित हीन बली भी चन्द्र ६-५-१२ स्थानों को छोड़ कर भिन्न
स्थान में हो तो अपनी दशा में धन और सुख देता है । यदि हीन बली भी चन्द्र इन
भिन्न स्थानों में हो तो मध्यम फल देता है और पूर्ण वली विशेष शुभ फल देता है ।
(३) मंगल पूर्ण वली-युद्ध में जय, धन मिले, राजा के यहाँ अधिकार, सेनापति
बने, प्रिय कार्य के लिए साहस, सोना मू गा रत्न वस्त्र आदि का लाभ ।
मंगल मध्यम वल्ली-राजा से अधिकार प्राप्ति, कुल अनुमान से धन मिले,संग्राम
में जय, कांति और बल वढे ।
मंगल हीन बल-शत्रु से भव, वंधन, अपने जनों से विरोध, मुख से रक्त पात,
शरीर में पित्त रोग, गर्मी के रोग, चित्त विकलता ।
मंगल नष्ट वल्ली-लड़ाई, झगड़ा, चोर भय, पर धन हरण, रक्त विकार, ज्वर
खाज खुजली, विवाद विपत्ति ।
विचार-नष्ट मंगल ३-६-११ धर में हो तो आधा शुभ फल देता है। हीन बली=मध्यम फल । मध्यम वली शुभ फल और पुर्ण बली अति शुभ फल देता है। (४) बुध पूर्ण बली-गणित तथा उत्तम शिल्प विद्या से यश, राजा की सेवा से लाभ राजदूत हो, पांडित्य की वृद्धि, धन का लाभ हो, वड़ा यश ।
बुध मध्य वली-गुरु से मित्रों से लेख कविता कारीगरी से धन लाभ, वांधवों के
समागम से सामान्य सुख, धर्म की सिद्धि ।
बुध स्वल्प वली-बिना कायं निरर्थक क्रोध, धनहानि, रोग भय, गिरने आदि से
अनिष्ट, अपमान स्वजनों से कलंक ।
बुध हीन बली-अपनी बुद्धि का दोष, बंधन का भय, प्राण भय, देशान्तर गमन, बात और कफ रोग, धन हानि, मान नाश कष्ट । विशेष-तष्ठ बली बुध ६-८-१२ धर में न हो तो आधा फल शुभ । हीन बली= मध्यम फल मध्यबळी शुभ । शुभ हो तो अतिशुभ । (५) गुरु पूणं बली-राजा, मित्र और गुरुओं से गौरव प्राप्ति, यश, धन, छाभ की वृद्धि, शत्रु नाश, रोग नाश, पुत्र लाभ, राज्य लाभ, सुख, तेजस्वी मंडल का स्वामी या राजा हो।
गुरु भध्यवली-र्म में वृद्धि, राजा या मंत्रियों से मित्रता, अच्छा उत्साह और बळ से काये सिद्धि, समान धन सुख की अभिलाषा, राज्य का अधिकार प्राप्त, ्ारंत्र की प्राप्ति।
गुर न्यून बळी-शत्रु भय, रोग, दरिद्रता, धन धमं नाझ, वैराग्य, कर्ण रोग, न तो धन या गुण ही देता है । चित्त में संताप । गुर नष्ट बछ-हर प्रकार का दुःख व रोग, धन और धर्म का नाश, देह पीड़ा । स्त्री पुत्र बन्धु शत्रुओं से भय ।