समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ेंदृष्टि उखड़े, 'श्री विज्ञान' से (खं-2-२)
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दादाश्री : खाने के साथ मांस रखा हुआ हो तो तुझे खाना भाएगा या नहीं?
प्रश्नकर्ता : नहीं भाएगा।
दादाश्री : लेकिन अगर वह मांस ढका हुआ हो तो?
प्रश्नकर्ता : तो गलती से शायद खा भी जाऊँ।
दादाश्री : इस देह पर चादर ढकी हुई है और वह खुला मांस है।
प्रश्नकर्ता : वह खुला तो दिखता है, लेकिन यह ढका हुआ है तो नहीं दिखता।
दादाश्री : अभी चादर हटा दें तो?
प्रश्नकर्ता : मांस आदि सब देखकर धिन आएगी।
दादाश्री : और नहीं दिखे तो?
प्रश्नकर्ता : तो फिर पता नहीं चलेगा।
दादाश्री : ये आँखें कैसी है अपनी, कि हैं फिर भी नहीं दिखता? हम जानते हैं कि यह चादर से बंधा हुआ है फिर भी वह दिखता क्यों नहीं? यों बुद्धि तो कहती है कि है अंदर, फिर भी नहीं दिखता, तो वे कैसी आँखें? यह जो चादर है, इसकी वजह से यह सब सुंदर लगता है। चादर खिसक जाए तो कैसा लगेगा?
प्रश्नकर्ता : खून-मांस जैसा।
दादाश्री : तो वहाँ धिन नहीं आएगी?
प्रश्नकर्ता : आएगी।
दादाश्री : किसी को यहाँ पर जल गया हो और पीप निकल रहा हो, तो क्या वहाँ पर हाथ फेरना अच्छा लगेगा?