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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

और ऊपर से उसकी उल्टी समझ बैठ गई। अब जैसी समझ बैठ गई, फिर वैसा ही वर्तन में आए बिना रहेगा नहीं।

व्यवहार में भी ब्रह्मचर्य का पालन करने को क्यों कहते हैं कि नॉर्मलिटी में रहे। उससे देह, मन वगैरह स्वस्थ रहते हैं। जगत् के लोग तो मन-वचन-काया से ब्रह्मचर्य पालन कर ही नहीं सकते न? यह तो सिर्फ अपने यहीं पर पालन किया जा सकता है। ये लोग व्रत लेते हैं। व्रत लेने से क्या होता है कि उसके बाद मन ठिकाने रहता है। मन बाउन्ड्री में रहता है और जो व्रत नहीं लेते तो उनका चित्त सारा भटकता ही रहता है! फिर भी, संसार में भी यदि कभी दृष्टि का ध्यान रखे तो वह आगे ही आगे बढ़ता जाएगा और उसे भी मोक्ष का रास्ता मिल जाएगा। यह तो बाहर के उन लोगों के लिए कह रहा हूँ जो मुझसे नहीं मिले हैं!

ब्रह्मचर्य का यदि कभी सिर्फ छः महीने सच्चे दिल से पालन किया हो, मन-वचन-काया से, तो वे गुलाब इतने-इतने बड़े हो जाते हैं। ब्रह्मचर्य तो सबसे बड़ी खाद है। जिस तरह गुलाब में खाद डालने से जो इतने छोटे होते हैं, वे फिर इतने बड़े हो जाते हैं। अतः सिर्फ छः महीनों के लिए ही जिसे पालन करना हो वह करे! छः महीने के ब्रह्मचर्य से तो शरीर में कितना बदलाव आ जाता है। फिर वाणी बोले तो जैसे बम गिर रहा हो, ऐसी निकलती है! जब तक संसार के किसी भी विषय में मन घुसा हुआ रहेगा, तब तक सभी डिपार्टमेंट पर फुल शक्ति नहीं चलेगी! किसी भी दिशा में प्रवहन करना, वह मन का स्वभाव है! इसी वजह से मन को जैसा चाहें वैसे मोड़ा जा सकता है। उसे डाइवर्ट किया जा सकता है। दो-पाँच साल तक ही यदि मन को ब्रह्मचर्य की ओर मोड़े, इस एक ही दिशा में वहन करे तो उसके सामने कोई आँख भी नहीं गड़ा सकेगा!

अब्रह्मचर्य से ही सभी रोग खड़े होते हैं। इसलिए यह सिद्धांत रखना चाहिए कि ब्रह्मचर्य पालन करना है, और उसे पहले से ही समझ लेना अच्छा। अस्सी की उम्र में इस सिद्धांत को समझें तो

माहात्म्य ब्रह्मचर्य का (खं-1-3)

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वह किस काम का? अपना अस्तित्व(अस्तित्वपना) एक ही जगह पर रहना चाहिए, दो जगह पर नहीं रहना चाहिए। अतः जब तक हो सके तब तक सिद्धांत का पालन करना। आजकल चारित्र की कीमत ही खत्म हो गई है। ब्रह्मचर्य की तो कीमत ही खत्म हो गई है न? स्वच्छ जीवन जीने की कीमत ही खत्म हो गई है! पवित्र जीवन ही जीना है।

अभिप्राय बदलते ही निकलना शुरू

प्रश्नकर्ता : लेकिन मानसशास्त्री कहते हैं कि विषय बंद हो ही नहीं सकता, अंत तक रहता है। तो फिर वीर्य का ऊर्ध्वगमन होगा ही नहीं न?

दादाश्री : मैं क्या कहता हूँ कि विषय के प्रति अभिप्राय बदल जाए तो फिर विषय रहेगा ही नहीं! जब तक अभिप्राय नहीं बदलेगा, तब तक वीर्य का ऊर्ध्वगमन होगा ही नहीं। अपने यहाँ तो सीधा आत्मा में ही डाल देना है, वही ऊर्ध्वगमन है! विषय बंद करने से उसे आत्मा का सुख बर्तता है और विषय बंद हो जाए तो वीर्य का ऊर्ध्वगमन होता ही है। हमारी आज्ञा ही ऐसी है कि विषय बंद हो जाता है।

प्रश्नकर्ता : आज्ञा में क्या होता है? स्थूल बंद करना?

दादाश्री : स्थूल के लिए हम कुछ कहते ही नहीं। मन-बुद्धि-चित्त और अहंकार ब्रह्मचर्य में रहें, ऐसा होना चाहिए व यदि मन-बुद्धि-चित्त और अहंकार ब्रह्मचर्य के पक्ष में आ गए तो स्थूल(ब्रह्मचर्य) तो अपने आप आ ही जाएगा। तेरे मन-बुद्धि-चित्त और अहंकार को पलट। हमारी आज्ञा ऐसी है कि ये चारों पलट ही जाते हैं।

ग़ज़ब के वे ब्रह्मचारी

‘यह’ ‘पब्लिक ट्रस्ट’ ऐसा है कि संपूर्ण रूप से निरोगी है। वर्ल्ड का टॉपमोस्ट है यह! आपको जो भी रोग निकालने हों, वे निकाले जा सकते हैं! जो सुंदर ब्रह्मचर्य पालन करते हैं, उनके

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

अधीन रहकर ब्रह्मचर्य पालन किया जा सकता है। वर्ना जो खुद पालन नहीं करते हों, खुद के अंदर गुप्त 'डिफेक्ट' हो तो खुद को ही पालन करना मुश्किल हो जाता है। इसलिए पूरे हिन्दुस्तान में कहीं भी ब्रह्मचर्य से संबंधित बातें कोई करता ही नहीं है न? मैं जिसमें 'हन्ट्रेड परसेन्ट' कोरक्ट होऊँगा, उसी का आपको उपदेश दे सकता हूँ। तभी मेरा वचनबल फलदायी होगा। खुद में जरा सा भी 'डिफेक्ट' हो तो औरों को कैसे उपदेश दिया जा सकता है?

विषय की जोखिमदारी बहुत बड़ी है। सबसे बड़ी जोखिमदारी हो तो वह विषय की है। उससे पाँचों महाव्रत और अणुव्रत टूट जाते हैं।

प्रश्नकर्ता : ज्ञानीपुरुष के वाक्य किस प्रकार से विषय का विरेचन करवाते हैं?

दादाश्री : हर दिन विषय बंद होता जाता है। वर्ना लाख जन्मों तक किताबें पढ़ें, फिर भी कुछ नहीं होता।

प्रश्नकर्ता : उनका वाक्य इतना असरकारक क्यों होता है?

दादाश्री : उनका वाक्य बहुत जबरदस्त होता है, जोरदार होता है! 'जुलाब करवा दें ऐसे शब्द' कहा गया है। तभी से नहीं समझ जाना चाहिए कि उनके शब्दों में कितना बल है!

प्रश्नकर्ता : वह वचनबल ज्ञानी को कैसे प्राप्त हुआ?

दादाश्री : खुद निर्विषयी हो, तभी वचनबल प्राप्त होता है। वर्ना जो विषय का विरेचन करवा दे, ऐसा वचनबल कहीं होता ही नहीं न! जब मन-वचन-काया से संपूर्ण रूप से निर्विषयी हो, तब उनके शब्दों से विषय का विरेचन होता है।

'ज्ञानीपुरुष' के वाक्य विषय का विरेचन करवानेवाले होते हैं। जो विषय का विरेचन नहीं करवाए, वह 'ज्ञानीपुरुष' है ही नहीं।

खंड : २

‘शादी नहीं करने’ के निश्चयवालों के लिए राह

[ १ ]

किस समझ से विषय में से छूटा जा सकता है?

शादी नहीं करने के निश्चयवाले को

प्रश्नकर्ता : मुझे शादी करने की इच्छा नहीं है, लेकिन माँ-बाप और अन्य रिश्तेदार शादी के लिए दबाव डाल रहे हैं। तो मुझे शादी करनी चाहिए या नहीं?

दादाश्री : यदि शादी करने की इच्छा ही नहीं हो तो, क्योंकि आपने अपना यह ‘ज्ञान’ लिया है इसलिए आप पार उतर सकोगे। इस ज्ञान के प्रताप से सबकुछ हो सकता है। मैं आपको यह समझाऊँगा कि किस तरह रहना है, और यदि पार उतर गए तब तो अति उत्तम है। आपका कल्याण हो जाएगा!

प्रश्नकर्ता : शादी करवाने के लिए सभी लोग बहुत फोर्स कर रहे हैं।

दादाश्री : आपको ‘व्यवस्थित’ समझ में आ गया है या नहीं?

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : व्यवस्थित तो समझ में आ गया है।

दादाश्री : तो 'व्यवस्थित' के बाहर किसी का भी चलनेवाला नहीं है। इसलिए 'व्यवस्थित' पर छोड़कर तय रखो, दृढ़ निश्चय करो कि मुझे शादी करनी ही नहीं है।

लेकिन शादी किए बिना तुझे कैसे चलेगा?

प्रश्नकर्ता : कौन से जन्म में अनुभव नहीं किया है?

दादाश्री : सच कह रहा है कि किस जन्म में अनुभव नहीं किया! बकरी में, कुत्ते में, गधे में, बाघ में, जहाँ गए वहाँ यही अनुभव किए हैं न? ! लेकिन शादी करना यदि ध्येयपूर्वक छूटे तो अच्छा। 'लोगों को जो अनुभव हुए हैं, वे मुझे ही हुए हैं', अब ऐसा सेट कर लेना पड़ेगा न? वर्ना जगत् के लोग तुझे अनुभवहीन कहेंगे। शादी होगी या नहीं, वह 'व्यवस्थित' के अधीन है, लेकिन अभी यदि पाँच साल इस ज्ञान के आधार पर ब्रह्मचर्य पालन करे तो कितनी शक्तियाँ प्रकट हो जाएँगी और इस देह की रचना भी कितनी अच्छी हो जाएगी! पूरी जिंदगी बुखार आदि आयागा ही नहीं न!!

अपना यह विज्ञान ऐसा है कि थोड़े समय में सेफ साइड करवा दे। जिसे भगवान भी नहीं पूछ सकें, ऐसी सेफ साइड कर दे, ऐसा यह विज्ञान है। खाने-पीने की सभी छूट दी है न? मैंने यदि खाने-पीने में एतराज उठाया होता तो काफी कुछ लोग यहाँ पर आए ही नहीं होते। इसलिए हमने छूट दी है।

इस संसारचक्र का आधार विषय पर है। हैं तो पाँच ही विषय, लेकिन स्त्री से संबंधित विषय तो बहुत ही भारी है। उसके तो बाद में भारी स्पंदन उड़ते हैं। अपना ज्ञान इतना अच्छा है कि उसमें रहे तो उसे कुछ भी स्पर्श नहीं करेगा और पिछला सब धुल जाएगा लेकिन विषय के बारे में जागृत रहना पड़ेगा। वहाँ तो 'इसमें सुख है ही नहीं और यह फँसाव ही है।' ऐसा

किस समझ से विषय में... (खं-2-1)

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अभिप्राय रहना चाहिए। यह बगीचा नहीं है। यह फँसाव ही है। ऐसा भान रहेगा तो छूटा जा सकेगा। लेकिन यहाँ ऐसा भान नहीं रहता है न? फँसाव हो तो वहाँ कैसा रहता है? और बगीचे में घूम रहे हों, तब कैसा रहता है? बगीचे में तो यों उल्लास रहता है, जबकि फँसाव में तो कब इसमें से छूट जाऊँ, ऐसा रहता है न? इसलिए 'हमें' 'चंद्रेश' से कहना है कि 'चंद्रेश इसमें से कब छूटोगे! यह तो फँसाव है। इसमें पड़ने जैसा नहीं है।' लेकिन इसमें फँसाव जैसा नहीं लगता और वहाँ मुक्त भाव हो जाता है न? अब यदि पूरी समझ बदल दें, तो हल आएगा।

समझकर दखिल होना इसमें...

प्रश्नकर्ता : यह जो डिसीजन ले लिया है, लेकिन पिछला माल बहुत है। तो डिसीजन के आधार पर मैं इसमें से निकल पाऊँगा?

दादाश्री : डिसीजन सही होगा तो जरूर निकल पाओगे, निश्चय मुख्य चीज है। जिसने निश्चय को पकड़ा है, दुनिया में कोई उसका नाम नहीं देगा। तुझे क्यों शंका हो रही है? शंका हो रही है, वही अनिश्चय कहलाता है।

प्रश्नकर्ता : आपसे पूछकर पक्का कर रहा हूँ।

दादाश्री : नहीं, लेकिन शंका हो रही है, वही अनिश्चय है। कुछ भी नहीं होगा। दादा की छत्रछाया है, फिर क्या होनेवाला है? इसलिए शंका रखने जैसा नहीं है। यह ज्ञान है इसलिए ब्रह्मचर्य में रहा जा सकेगा, वर्ना मैं ही तुम्हें मना कर दूँ। मैं तो आज्ञा दे दूँ कि तुम्हें शादी करनी पड़ेगी। वह तो 'यह' ज्ञान है इसलिए तुम्हें अनुमति देता हूँ। क्योंकि इंसान को सुख का साधन चाहिए न? मरता हुआ इंसान किस सुख के सहारे जीएगा? यह ज्ञान ऐसा है कि आप इस ज्ञान से आत्मा के ध्यान में रहोगे तो तुरंत आनंद में आ जाओगे। या फिर अगर घंटे भर सभी के

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शुद्धात्मा देखो, रियल और रिलेटिव देखो तो सबकुछ रेग्युलर।

ब्रह्मचर्य का पालन आधी जिंदगी तक करोगे या फिर शादी कर लोगे?! बाद में तो शादी कर ही नहीं सकते। और बाद में तो शादी का विचार तक नहीं आना चाहिए। वह विचार भी गुनाह है। मैं कहता हूँ कि कोई किसी की नकल मत करना। अरे, जरा सोचो तो सही। यह कोई नकल करने जैसी चीज नहीं है। इससे अच्छा शादी कर ले न! शादी करने से कहीं मोक्ष खो नहीं जाएगा। दूसरे धर्मों में तो शादी करने से मोक्ष खो देता है। शादी नहीं करने से भी कहीं मोक्ष नहीं मिल जाता और शादी करने से भी मोक्ष नहीं मिलता। अनंत जन्मों से साधु बने हैं, फिर भी मोक्ष नहीं हुआ। वह ब्रह्मचर्य का पालन कर रहा है, इसलिए मुझे भी वैसा ही करना चाहिए। ऐसा सब मत करना। इसमें ऐसा नहीं चलेगा। खुद को बहुत अच्छी तरह परख लेना चाहिए। हमने कुछ लड़कों को परखकर देखा है, उन्हें तो स्त्री की बात कहते ही वे घबरा जाते हैं। शादी की बात करने से पहले ही उन्हें घबराहट हो जाती है। इसलिए फिर हम समझ गए कि इनके उदय में स्त्री है ही नहीं।

यह ब्रह्मचर्य का जो पकड़ा है, वह बहुत अच्छा किया है लेकिन जोश में आकर पकड़ो, वैसा मत पकड़ना। पकड़ो तो समझकर पकड़ना। अब यदि कुसंग में गया तो अंदर तुरंत दही बन जाएगा। जिस दूध से चाय बनानी है, वह दूध फट जाएगा। अंदर दही डाले बिना पूरी रात पिंजरे में दूध और दही साथ-साथ रखा हो तो सुबह दूध फट जाएगा या नहीं? ऐसा होता है या नहीं? इतने असरवाला यह जगत् है। दही डाले बिना फट जाता है। इसलिए बहुत स्ट्रोंग रहना। इस ब्रह्मचर्य की लाइन में सुख भी बेहद है। बेहद सुख आपको मिलता रहेगा लेकिन यदि उसमें जरा भी उलझ गए और फिसल गए तो मार भी उतनी ही पड़ेगी। इसलिए हम आपको सावधान कर रहे हैं। विषय तो

किस समझ से विषय में... (खं-2-1)

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ऐसी चीज है न कि वह इंसान को फिसला देता है। अगर फिसल जाओ तो उसका खेद मत करना। लेकिन इस जगह पर फिसल सकते हैं, इसलिए वहाँ पर जागृत रहना।

बार-बार करना निश्चय दृढ़

ब्रह्मचर्यव्रत लेने के विचार आएँ और यदि उसका निश्चय हो जाए तो उस जैसी बड़ी चीज और कौन सी कहलाएगी? वह सभी शास्त्र समझ गया! जिसे निश्चय हो गया कि मुझे अब छूटना ही है, वह सभी शास्त्र समझ गया। विषय का मोह ऐसा है कि किसी निर्माही को भी मोही बना दे। अरे, साधु-आचार्यों को भी विचलित कर दे!

प्रश्नकर्ता : ब्रह्मचर्य का जो निश्चय किया है, उसे ज्यादा मजबूत करने के लिए क्या करना चाहिए?

दादाश्री : हमें 'निश्चय मजबूत करना है' ऐसा तय करना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : एक बार इतना बोलने के बाद हमें हैन्डल तो बार-बार मारना पड़ेगा न?

दादाश्री : हाँ, बार-बार वही निश्चय करना है और 'हे दादा भगवान! मैं निश्चय मजबूत कर रहा हूँ, मुझे निश्चय मजबूत करने की शक्ति दीजिए।' ऐसा बोलने से शक्ति बढ़ेगी।

प्रश्नकर्ता : इस जन्म में तो ब्रह्मचर्य उदय में आया है। फिर अगले जन्म में वह कैसा होगा?

दादाश्री : अगले जन्म में भी ऐसा ही आएगा। अभी वह ऐसा ही कहता है कि यह ब्रह्मचर्य तो बहुत अच्छा है, ऐसा ही चाहिए। तो अगले जन्म में भी वह होगा।

प्रश्नकर्ता : हमें विचारों पर से पता तो चल जाता है न, कि उदय में कैसा आ रहा है?

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दादाश्री : जिसका निश्चय होता है, उसे कुछ भी नहीं छूता। वह कुछ भी करे या उसे कैसे भी विचार आएँ, फिर भी उसे स्पर्श नहीं करता। वर्ना कम विषयवाले को भी 'विषय' उदय में आ जाता है। इसलिए निश्चय होना चाहिए! जिसका निश्चय नहीं डगमगाता, उसे कुछ नहीं होता, जिसका निश्चय डगमगा जाए उसमें सभी भूत घुस जाते हैं, सभी रोग घुस जाते हैं।

प्रश्नकर्ता : यदि निश्चय मजबूत हो और तब विचार आएँ तो उसमें हर्ज नहीं है?

दादाश्री : नहीं, वह विचार आ नहीं पाएगा, उसे। क्योंकि आत्मज्ञान प्राप्त हुआ है इसलिए उस से निश्चय हो सकता है, वर्ना निश्चय हो ही नहीं सकता।

हे विषय! अब तेरे पक्ष में नहीं

प्रश्नकर्ता : इन विचारों को दबा दूँ, ऐसा करता हूँ फिर भी विचार आते हैं।

दादाश्री : मेरा कहना है कि विचार आते हैं, उसमें हर्ज नहीं है, लेकिन जो विचार आते हैं, उन्हें देखते रहो लेकिन तुम उनके अमल में एकाकार मत होना। जो विचार आते हैं, उनके अमल में आप हस्ताक्षर मत कर देना। वे कहेंगे 'हस्ताक्षर करो' तो आप कहना, 'नहीं, अब हस्ताक्षर नहीं होंगे। बहुत दिनों तक हमने हस्ताक्षर किए, अब नहीं करेंगे।' हम ऐसा कहते हैं कि तू ऐसा तय कर कि इसमें तन्मयाकार होना ही नहीं है। जुदा रहकर देखता रह, तो एक दिन तू छूट जाएगा।

प्रश्नकर्ता : विषय के विचार आएँ तो भी देखते रहना है?

दादाश्री : देखते ही रहना है। तब क्या उन्हें संभालकर रखना है?

प्रश्नकर्ता : हटा नहीं देना है?

किस समझ से विषय में... (खं-2-1)

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दादाश्री : देखते ही रहना है, देखने के बाद चंद्रेश से कहना है कि इनके प्रतिक्रमण करो। मन-वचन-काया से विकारी दोष, इच्छाएँ, चेष्टाएँ, वे सभी दोष जो हुए हैं, उनका प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। विषय के विचार आएँ लेकिन फिर भी खुद उनसे मुक्त रहे तो कितना आनंद होगा? तो अगर विषय से हमेशा के लिए छूट जाएगा तो कितना आनंद होगा?

मोक्ष जाने के चार स्तंभ हैं। ज्ञान-दर्शन-चारित्र और तप। अब तप कब करना होता है? मन में विषय के विचार आ रहे हों और खुद का स्ट्रॉंग निश्चय हो कि मुझे विषय भोगना ही नहीं है, तो इसे भगवान ने तप कहा है। खुद की किंचित्मात्र भी इच्छा नहीं हो, फिर भी विचार आते रहें तो वहाँ तप करना है।

अब्रह्मचर्य के विचार आएँ लेकिन ब्रह्मचर्य की शक्तियाँ माँगता रहे तो वह बहुत बड़ी बात है। ब्रह्मचर्य की शक्तियाँ माँगते रहने से किसी को दो साल में, किसी को पाँच साल में, लेकिन वैसा उदय आ जाता है। जिसने अब्रह्मचर्य जीत लिया, उसने पूरा जगत् जीत लिया। ब्रह्मचर्यवाले पर तो शासन देवी-देवता बहुत खुश रहते हैं।

लोकदृष्टि से उल्टा ही चलता रहता है न? लेकिन जब ज्ञानीपुरुष की मौजूदगी होती है, तब ब्रह्मचर्य पालन किया जा सकता है, वर्ना नहीं कर सकते। एक भी विचार बिगड़ना नहीं चाहिए। विचार बदला कि सबकुछ बिगड़ा। किसी भी तरह एक भी विचार नहीं बदलना चाहिए। यह ज्ञान है इसलिए जागृति तो है ही हमें! जागृति है इसलिए अगर विचार नहीं बदलेगा तो कुछ भी नहीं होगा। फिर भी विचार बदल जाए तो प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। क्योंकि वह पिछला हिसाब है। वह एक जन्म में जो बिगड़ गया है, उसे चुका दो।

यदि सावधान रहने जैसा हो तो वह सिर्फ विषय से। सिर्फ विषय को जीत ले तो बहुत हो गया। उसका विचार आने से पहले ही उखाड़ देना पड़ेगा। अंदर विचार उगा कि तुरंत ही उखाड़

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देना पड़ेगा। दूसरा, यों अगर नजर मिल गई किसी से तो तुरंत हटा देनी पड़ेगी। वर्ना वह पौधा जरा भी बड़ा हुआ कि तुरंत उसमें से वापस बीज डलेंगे। इसलिए उस पौधे को तो उगते ही निकाल देना पड़ेगा। तुम्हें पता चले कि यह गुलाब का पौधा नहीं है, यह कुछ और है, तो तुरंत उखाड़कर फेंक देना।

जिस संग में ऐसा लगे कि हम फँस जाएँगे तो उस संग से बहुत ही दूर रहना, वर्ना एक बार फँस गए तो बार-बार फँसते ही जाओगे, इसलिए वहाँ से भाग जाना। फिसलनवाली जगह हो और वहाँ से भाग जाओगे तो फिसलोगे नहीं। सत्संग में तो दूसरी ‘फाइलें’ नहीं मिलेंगी न? सभी एक जैसे विचारवाले मिलते हैं न?

अंकुर फूटते ही उसे उखाड़ देना

मन में विषय का विचार आया कि तुरंत उसे उखाड़ देना चाहिए और कहीं आकर्षण हुआ कि तुरंत ही प्रतिक्रमण करना चाहिए। जो इन दो शब्दों को पकड़ ले, उसका ब्रह्मचर्य हमेशा रहेगा। हमें ऐसा लगता है कि यह विषय-विकार का आकर्षण हुआ कि तुरंत प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए और कोई विषय-विकार का विचार अंदर से उगा तो वह पौधा तुरंत ही उखाड़कर बाहर फेंक देना। बस, जो ये दो चीजें करे, उसे फिर दिक्कत नहीं होगी।

प्रश्नकर्ता : लेकिन जागृति और यह, दोनों एक साथ रह सकते हैं ?

दादाश्री : नहीं, जागृति होगी तभी यह हो पाएगा, वर्ना नहीं हो पाएगा न!

यह पौधा उगने लगे तभी से समझ जाना कि यह पौधा कट्टेदार है। इसलिए उसे उगते ही उखाड़कर फेंक देना। वर्ना अगर चिपक जाएगा तो उसके कांटों से पूरे शरीर पर जलन होगी। इसलिए फिर से नहीं उगे उस तरह से फेंक देना। उसी तरह जब इस

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मिश्रचेतन के विचार आएँ तो उगने ही मत देना। उन्हें तो उखाड़ ही देना, तो एक दिन इससे हल आएगा। वर्ना यदि एक भी उगा तो कितने ही जन्म बिगाड़ देगा। भगवान ने विषय के पौधे को ही उखाड़ देने को कहा है। अन्य पौधे तो भले ही उगें, वे जोखिमवाले नहीं हैं लेकिन मिश्रचेतन जोखिमवाला है। अनादिकाल का अभ्यास है, इसलिए मन वापस यही चिंतवन करता रहता है। उससे वापस विषय का पौधा उगता है। मूंग में पानी डालें तो उग जाता है, वह नीचे जड़ डालेगा। तभी से हम समझ जाते हैं कि यह तो पौधा बनेगा। उसी तरह इसमें विचार आते ही उसे उखाड़कर फेंक देना। सिर्फ यह विषय ही ऐसा है कि छोट सा पौधा बनने के बाद फिर वह जाता नहीं है। इसीलिए उसे जड़ से ही उखाड़कर खींच निकालना चाहिए।

अब यदि ऐसी जागृति रहे तो इंसान आरपार जा सकेगा, वर्ना यह तो अभानता है। यह तो चादर में लिपटा हुआ मांस है। पूरी दुनिया का सारा कचरा इस शरीर में हैं, फिर भी इस चादर की वजह से कितना मोह होता है! वह मोह किस से उत्पन्न होता है? अजागृति से! फिर बाद में पछताना भी पड़ता है न? पछताना यानी क्या? पश्चाताप। पश्चाताप यानी अंदर चुभता रहे। उसके बजाय तो जागृति रहे तो कितना अच्छा! जागृति यदि नहीं रह पाए तो फिर शादी कर। हमें उसमें हर्ज नहीं है। शादी यानी निकाली चीज़ । नहीं तो फिर जागृति रखनी पड़ेगी। अभी तक निरी अजागृति ही थी। यह तो उसमें से यह जागृति रखना बाकी रहा। एक सौ आठ दीये हों, उनमें से बारह दीये तो जलाए। बाद में तेरहवाँ, चौदहवाँ ऐसे जलाते जाना।

प्रश्नकर्ता : जागृतिपूर्वक भान में होने के बावजूद आकृष्ट हो गए, और अपना वहाँ कुछ चला नहीं, तो क्या करना चाहिए? उसका कितना दोष लगता है?

दादाश्री : दोष तो है ही न! वैद्य ने कहा हो कि मिर्च

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

मत खाना और हम मिर्च खा लें, तो क्या होगा? लेकिन फूलिशा बहुत नहीं होते, कुछ ही होते हैं और यदि उसने मिर्च खाई तो फिर उसका रोग बढ़ेगा।

प्रश्नकर्ता : लेकिन अब उसे क्या करना चाहिए? उपाय तो होना चाहिए न?

दादाश्री : प्रतिक्रमण करना है। और क्या?

प्रश्नकर्ता : लेकिन क्या ज्ञानी को नहीं बताना चाहिए? जिन्होंने आज्ञा दी हो, उन्हें बताना तो पड़ेगा न?

दादाश्री : हाँ, बता दिया, फिर भी प्रतिक्रमण करने हैं। बाकी, अगर वह मिर्च खा ले तो, उसमें ज्ञानी थोड़े ही जहर खा लेंगे?

कभी अंदर खराब विचार उगे और उसे निकाल देने में देर हो जाए तो जरा बड़ा प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। वर्ना विचार उगते ही तुरंत निकाल देना चाहिए। उखाड़कर तुरंत फेंक देना चाहिए। बाकी, यह विषय-विकार ऐसा है कि जिसे एक सेकन्ड के लिए भी, जरा सा भी नहीं रहने देना चाहिए। वर्ना पेड़ बनते देर नहीं लगेगी। इसलिए उगते ही तुरंत उखाड़कर फेंक देना। जैसे कि अगर हमें गेहूँ बोने हों और तंबाकू का पौधा उग जाए तो उसे तुरंत निकाल देते हैं, उसी तरह इसमें भी विषय को उखाड़ देना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : विषय का अज्ञान, वह क्या है?

दादाश्री : बगीचे में क्या बोया है, वह जब उगे तब पता चलता है कि यह तो धनिया उगा है, यह तो मेथी उगी है, उसके पत्तों से पता चलता है न? वैसा ही विषय के बीज का है, उगते ही उसे वहाँ से खींच लेना चाहिए।

जो पड़े हुए बीज उखाड़ देता है, उन्हें उखाड़ देने के बाद जो विषय रहे, वह विषय है ही नहीं। पेड़ है तो भले ही रहा, बारिश हो तो भले ही हो। ऐसा मान लेना कि अगर यहाँ पर

किस समझ से विषय में... (खंड-2-1)

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बेरी हो तो उसका बीज तो एक फर्लाँग की दूरी पर जाकर भी उग सकता है। उस बीज को हवा कहीं पर भी खींचकर ले जा सकती है, इसलिए हमें बेरी के नीचे ही नहीं, लेकिन आसपास की सभी जगह पर उगे हुए बीजों को उखाड़ देना चाहिए। बीज किसे कहते हैं? जब अन्य संयोग मिल जाएँ, तब पड़ा हुआ बीज उग निकलता है, उगते ही उसे उखाड़ देना चाहिए।

दो प्रकार के विषय हैं, एक चार्ज और दूसरा डिस्चार्ज। चार्ज बीज को धो देना चाहिए। वास्तव में तो विचार आना ही नहीं चाहिए। ज्ञानीपुरुष को लक्ष्मी के और विषय के विचार ही नहीं आते, तो फिर बीज गिरने की और उगने की बात ही कहाँ रही? यदि आपको विचार आएँ तो आप उन्हें उखाड़ देना, तो फिर विचार नहीं उगेगे। एक-एक को ऐसे उखाड़ देना। यह तो अक्रम ज्ञान है, उससे अज्ञान चला गया, लेकिन पिछला माल है, इसलिए चेतावनी देनी पड़ती है। इन बीजों का स्वभाव कैसा है कि गिरते ही रहते हैं। आखें तो तरह तरह का देखती हैं, उससे अंदर बीज गिरते हैं तो फिर उन्हें उखाड़ देना चाहिए। होटल को देखने से खाने की इच्छा होती है न? उसके जैसा है। हमें तो मोक्ष में जाना है इसलिए सावधान रहना है। आखों से देखने पर अगर जरा सा भी आकर्षण होता है तो वह भयंकर रोग है, ऐसा समझना। जब तक बीज के रूप में है, तब तक उपाय है, बाद में कुछ नहीं हो सकता।

चित्त आकृष्ट होता है, रास्ते चलते...

प्रश्नकर्ता : यहाँ घर में बैठे हुए हों तो चित्त इधर-उधर नहीं होता, लेकिन बाहर रास्ते पर जरा निकलें तो रास्ते तो स्त्री रहित होते नहीं और इस तरफ विषय की गाँठ फूटे बिना रहतीं नहीं।

दादाश्री : और आपको बाहर निकले बिना चलेगा नहीं! बाहर कुछ लेने जाना पड़ता है, नौकरी-व्यापार के लिए जाना पड़ता

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)

है और विषय खड़े हुए बिना रहता नहीं और इसलिए उसका प्रतिक्रमण किए बिना चलता नहीं। प्रतिक्रमण करेंगे तो हल जाएगा, वर्ना जो आकर्षण हुआ था वह तो फिर चिपक ही जाएगा। बाहर आना-जाना पड़ता है, उसके बिना चलेगा नहीं, घर बैठे रहे तो दुनिया में चलेगा नहीं। 'व्यवस्थित' के हिसाब से जाना पड़ता है और वह चिपके बिना नहीं रहता। जागृति तो होती है, फिर भी पिछले जन्म के सारे मेल हैं न, इसलिए आकर्षण होता है और वापस से झंझट हुए बिना नहीं रहता। अतः अगर घर आकर प्रतिक्रमण करें तो वह उखड़ जाएगा।

प्रश्नकर्ता : प्रतिक्रमण ठीक से नहीं हो पाते।

दादाश्री : प्रतिक्रमण करने का निश्चय करोगे तो होगा। प्रतिक्रमण तो अवश्य करने ही चाहिए। प्रतिक्रमण करने के बाद मन साफ हो जाता है।

यह फिसलनवाला काल कहलाता है। सत्युग में से द्वापर, त्रेता ऐसे फिसलते फिसलते यह आखिरी काल आ रहा है। इसमें ब्रह्मचर्य का महत्व कम हो गया है, इसीलिए यह दशा हो गई है। ब्रह्मचर्य का यदि महत्व रहा होता तो यह दशा होती ही नहीं! संसारी स्थान में हर्ज नहीं, लेकिन लोगों ने ब्रह्मचर्य का महत्व ही उड़ा दिया। इससे फिर खुद की सारी जागृति मंद हो जाती है। हमने यह ज्ञान दिया है, फिर भी कितनों को जैसी होनी चाहिए वैसी जागृति रह नहीं पाती। वर्ना हमारा ज्ञान मिलने के बाद तो कैसी जागृति रहती है? भगवान जैसी जागृति रहती है। तुझे बहुत जागृति रहती है या मंद हो जाती है?

प्रश्नकर्ता : लिमिट का कुछ पता नहीं चलता।

दादाश्री : जागृति ज्यादा हो तो ठोकर नहीं लगेगी? गलती होती है तुझसे? गलती हो जाने के बाद पता चलता है न?

प्रश्नकर्ता : हाँ, बाद में पता चलता है।

किस समझ से विषय में... (खं-2-1)

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दादाश्री : यदि जागृति ज्यादा हो तो, गलती हो जाने के बाद भी पता नहीं चले, ऐसा नहीं होता बल्कि गलती होने से पहले ही पता चल जाता है और वह चीज़ वापस हो भी सकती है, लेकिन खुद को पहले ही पता चल जाता है और उसके बाद गलती होती है। मतलब कि चीज़ें नहीं रुकतीं लेकिन जागृति ज्यादा हो तो पहले से पता चल जाता है।

प्रश्नकर्ता : यदि हमें निरंतर ब्रह्मचर्य में रहना हो तो जागृति बहुत ज्यादा होनी चाहिए न?

दादाश्री : जागृति, वही आत्मा है और खुद यदि सो जाए तो दूसरे काम हो जाते हैं। अतः जागृति में कोई भी गलत काम नहीं होता और दूसरी गड़बड़ नहीं है न ज्यादा, लेकिन गड़बड़ नासमझी से खड़ी हो गई हैं तो मार खानी पड़ती है न?

प्रश्नकर्ता : यदि खुद विषय में सहमत नहीं होगा तो बचा जा सकता है, उस दिन ऐसी बात हुई थी। तो उसमें खुद की स्थिरता कैसे आ सकती है?

दादाश्री : हाँ लेकिन सहमत यानी कि निश्चय में से कभी भी सहमति न छूटे। ऐसी सहमति हो तो फिर कुछ नहीं होगा, लेकिन वह छूटे बिना रहता नहीं है न! क्योंकि कर्म के उदय से जब ऐसा होना होता है, तब निश्चय छूट जाता है और ऐसा हो जाता है। इसलिए तुझे क्या करना है? कि तुझे तो सिर्फ जागृति ही रखनी है कि 'इसमें कभी भी नहीं!' सहमति नहीं छूटे, उसके लिए 'केयरफुल' रहना पड़ेगा, फिर भी अगर उसके बाद गिर गए तो उसमें हर्ज नहीं है। हमें गाड़ी में से नहीं गिरना है, फिर भी गिर गए तो उसे हम 'व्यवस्थित' कहते हैं न? लेकिन क्या जान-बूझकर कोई गिरता है?

आँखें गड़ाएँगे तो दृष्टि बिगड़ेगी न

किसी भी एक तरफ हृदय तो लगा ही रहता है, या तो

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

इस तरफ लगा रहता है या उस तरफ रहता है। यहाँ से छूट जाए तो वहाँ लग जाता है, उसके लिए हमें बैठे नहीं रहना चाहिए। इसलिए बहुत सावधान रहने जैसा है। हम यहाँ से छोड़ेंगे, तभी वहाँ लगेगा न? और वहाँ चिपकने लगे उससे पहले ही सावधान हो जाना। आँखें तो गड़ानी ही नहीं चाहिए, नीचे देखकर ही चलना। तू किसी के सामने आँखें नहीं गड़ाना न?

प्रश्नकर्ता : नहीं।

दादाश्री : तब तो बहुत समझदार है, तू जीत गया। आँखें तो कभी भी मत गड़ाना, बहुत शोर मचाए फिर भी। वर्ना यहाँ इस सत्संग में जितना दिल लगा हुआ होगा तो वह भी हट जाएगा।

दूषमकाल में नजर को संभालना। यह दूषमकाल है, इसलिए सावधान रहो, अभी भी सावधान हो जाओ। दृष्टि तो बिल्कुल शुद्ध रहनी चाहिए। पहले के जमाने के सखा लोग तो आँखें फोड़ देते थे। हमें आँखें नहीं फोड़ देनी है, वह तो मूर्खता है। हमें आँखें फेर लेनी है, उसके बावजूद भी अगर देख लिया तो प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए। यह प्रतिक्रमण तो एक मिनिट के लिए भी मत चूकना। खाने-पीने में गलती हो जाए तो चलेगा, लेकिन आँखें गड़ाकर देख ही कैसे सकते हैं? संसार में सबसे बड़ा रोग यही है, इसी की वजह से संसार खड़ा है। विषय की नींव पर संसार खड़ा है, मूल में विषय ही है।

विषय तो किसी को भी अच्छा नहीं लगता, लेकिन ये पहले के हिसाब हो चुके हैं, और आँखें गड़ाई तभी से हिसाब शुरू हो गया। वह फिर छोड़ता नहीं है। ये सभी स्त्रियाँ कहीं हमें आकर्षित नहीं करती। जो आकर्षित करती हैं, वह अपना पिछला हिसाब है। इसलिए वहाँ से उखाड़कर फेंक दो, साफ कर दो। अपने ज्ञान के बाद कोई परेशानी नहीं आती, मात्र एक विषय के लिए ही हम सावधान करते हैं। आँखें गड़ाना ही गुनाह है

किस समझ से विषय में... (खं-2-1)

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और यह समझने के बाद जोखिमदारी बहुत बढ़ जाती है, इसलिए किसी के सामने आँखें मत गड़ाना। आँखें गड़ाने से ही सबकुछ बिगड़ता है। दृष्टि बिगड़ती है, वह भी एकदम से नहीं बिगड़ती। पहले का हिसाब हो तभी आकर्षण होता है। मूल दृष्टि नहीं बिगड़ती, बिगड़ी हुई दृष्टि ही बिगड़ती है।

प्रतिक्रमण के बाद, दंड का उपाय

पिछले जन्म में जो गलती हुई थी, उसी वजह से इस जन्म में नजर पड़ जाती है। हमें नजर नहीं डालनी हो फिर भी नजर पड़ जाती है। नजर पड़ने के बाद हमें आकर्षित नहीं होना हो, फिर भी वापस मन आकर्षित हो जाता है। यानी कि पिछला हिसाब है, इसलिए ऐसा सब हो रहा है। वहाँ पर हमें प्रतिक्रमण करके छूट जाना चाहिए, इसके बावजूद भी अगर वापस नजर पड़ जाए तो फिर से प्रतिक्रमण करना चाहिए, इस तरह सौं-सौ बार प्रतिक्रमण करेंगे तब छूटा जा सकेगा। कुछ पाँच प्रतिक्रमण से छूट जाती हैं। कुछ एक प्रतिक्रमण से छूट जाती हैं।

प्रश्नकर्ता : प्रतिक्रमण करने के बावजूद वहाँ चला जाए, तो वह कमजोरी ही है न? या फिर नीयत चोर हो जाती है? या फिर अंदर, मन-बुद्धि-चित्त और अहंकार खुद को ठगने लगे है?

दादाश्री : प्रतिक्रमण करने के बावजूद भी कार्य हो जाए, तब तो फिर वह 'व्यवस्थित' है। वह 'व्यवस्थित' के हाथ में आ गया ऐसा कहा जाएगा, वह व्यवस्थित की गलती है। फिर भी यदि ऐसा बहुत ज्यादा हो रहा हो, तब उसके लिए खास उपवास वगैरह दंड लेना चाहिए, इसे बौधना कहते हैं। जिस तरह गोली चलाई और एक्जेक्ट जगह पर लगे, उसी तरह इसे भी बौधना कहा जाता है। इससे कर्म नहीं बंधते। अतः वापस से यह गलती हो जाए तो वहाँ हमें प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए, साथ-साथ दूसरा

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)

कोई दंड लेना चाहिए। मन को जो भाता हो, उस दिन वह चीज कम खाना। ऐसा कोई दंड देना चाहिए।

देखना, सामान्य भाव से

स्त्री की तरफ तो सबसे पहले दृष्टि बिगड़ती है। दृष्टि बिगड़ने के बाद आगे बढ़ता है। जिसकी दृष्टि नहीं बिगड़ती उसे कुछ भी नहीं होता। अब अगर तुझे सेफ साइड करनी हो तो दृष्टि मत बिगड़ने देना और दृष्टि बिगड़ जाए तो प्रतिक्रमण करना।

प्रश्नकर्ता : इस विषय-विकारी दृष्टि के परिणाम क्या हैं?

दादाश्री : अधोगति। यह तो पूरे दिन 'चाय' याद आती है। 'चाय' देखते ही दृष्टि बिगड़े तो फिर वह चाय पीए बिना रहेगा क्या? दृष्टि का नहीं बिगड़ना, वह सबसे बड़ा गुण कहलाता है।

भगवान ने कहा है कि दुनिया में सभी चीजें खाना, लेकिन मनुष्य जाति की आँखों में मत देखना और उसके चेहरे को एकटक मत देखना। अगर देखो तो सामान्य भाव से देखना, विषय भाव से मत देखना। आँखों को देखकर पास में रखोगे तो पड़े रहेंगे। वह एक तरफा है, लेकिन यह जीता-जागता जीव तो चिपक जाएगा, उसके बाद एक तरफ रख दोगे तो दावा करेगी। शादी के समारोह में जब स्वागत द्वार पर खड़े रहते हो तो क्या हर एक आनेवाले को एकटक देखते हो? नहीं। वहाँ तो एक आता है और एक जाता है, यों सामान्य भाव से देखते हो। उसी तरह से देखना है। मैंने ज्ञान होने से पहले ही तय किया हुआ था कि सामान्य भाव से देखना है।

ये सभी लोग नहीं होते तो अच्छा होता न? अपने भाव ही नहीं बिगड़ते न?

प्रश्नकर्ता : नहीं, वह तो अपने अंदर भाव ही ऐसे हैं,

किस समझ से विषय में... (खं-2-1)

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इसीलिए सामने ऐसे निमित्त मिले हैं न? अतः हमें अपने भाव ही तोड़ देने चाहिए, तो फिर निमित्त गले नहीं पड़ेगा न!

दादाश्री : सच कहा है। इसीलिए हम कहते हैं कि भावनिद्रा टालो। ये ऐसे लोग हैं कि सभी तरह के भाव आएँ। उसमें भावनिद्रा नहीं आनी चाहिए, देहनिद्रा आएगी तो चलेगा।

प्रश्नकर्ता : लेकिन भावनिद्रा ही आती है न?

दादाश्री : ऐसा कैसे चलेगा? यदि ट्रेन सामने से आ रही हो तो भावनिद्रा नहीं रखते। ट्रेन से तो एक ही जन्म की मृत्यु है, लेकिन यह तो अनंत जन्मों का जोखिम है। जहाँ चित्र-विचित्र भाव उत्पन्न हों, ऐसा यह जगत् है। उसमें तुझे खुद ही समझ लेना है। भावनिद्रा आती है या नहीं? भावनिद्रा आएगी तो संसार तुझे बाँध लेगा। अब अगर भावनिद्रा आ जाए तो वही, उसी दुकान के शुद्धात्मा से ब्रह्मचर्य के लिए शक्तियाँ माँगना कि, 'हे शुद्धात्मा भगवान, मुझे पूरी दुनिया के साथ ब्रह्मचर्य पालन करने की शक्तियाँ दीजिए।' यदि हमसे शक्तियाँ माँगांगे तो उत्तम ही है, लेकिन वह तो डायरेक्ट, जिस दुकान से व्यवहार हुआ है, वही माँग लेना सबसे अच्छा।

सुंदर फूल हों तो वहाँ देखने का मन होता है न? वैसे ही इन सुंदर लोगों को देखने का मन हो जाता है और वहाँ पर थप्पड़ पड़ जाती है। इन फूलों को सूंधना, खाना-पीना, लेकिन 'इस' एक ही जगह पर देखने की जरूरत नहीं है, कहीं भी नजर मत मिलाना।

प्रश्नकर्ता : नहीं देखना हो फिर भी यदि सुंदर स्त्री दिख जाए, तब वहाँ क्या करना चाहिए?

दादाश्री : उस समय नजरें मत मिलाना।

प्रश्नकर्ता : नजरें मिल जाएँ तो क्या करना चाहिए?