समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्व)
प्रश्नकर्ता : बात सही है, लेकिन उस विकारी किनारे से निर्विकारी किनारे तक पहुँचने के लिए कोई तो नाव होनी चाहिए न?
दादाश्री : हाँ, उसके लिए ज्ञान है। उसके लिए वैसे गुरु मिलने चाहिए। गुरु विकारी नहीं होने चाहिए। गुरु विकारी होंगे तो पूरा समूह नर्क में जाएगा। फिर से मनुष्यगति भी नहीं देख पाएँगे। गुरु में विकार शोभा नहीं देता।
किसी भी धर्म ने विकार को स्वीकार नहीं किया है। जो विकार को स्वीकार करे, वह वाम मार्गी कहलाता है। पहले के जमाने में वाम मार्गी थे, विकार में रहते हुए भी ब्रह्म ढूँढ़ने निकले थे।
प्रश्नकर्ता : वह भी एक विकृत रूप ही हो गया, ऐसा कहा जाएगा न?
दादाश्री : हाँ, विकृत ही न! इसलिए वाम मार्गी कहा न! वाम मार्गी यानी मोक्ष में नहीं जाते और लोगों को भी मोक्ष में नहीं जाने देते। खुद अधोगति में जाते हैं और लोगों को भी अधोगति में ले जाते हैं।
प्रश्नकर्ता : हर एक युग में ऐसे वाम मार्ग रहे होंगे न?
दादाश्री : हाँ, हर एक युग में वाम मार्ग तो होता ही है। कम या ज्यादा, वाम मार्ग होता तो है। पहले बहुत कम था। अभी कलियुग में बहुत ही ज्यादा है।
जब तक जरा सा भी विकारी संबंधवाला हो न, तब तक वह दुनिया में किसी को नहीं सुधार सकता। विकारी स्वभाव आत्मघाती स्वभाव ही है। अभी तक किसी ने सिखाया नहीं कुछ भी?
ब्रह्मचर्य, प्रोजेक्ट का परिणाम
प्रश्नकर्ता : कुदरत को यदि स्त्री-पुरुष की जरूरत नहीं होती, तो वह क्यों दिया?
विकारों से विमुक्त की राह (खं-1-2)
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दादाश्री : स्त्री-पुरुष वह कुदरती है और ब्रह्मचर्य का हिसाब वह भी कुदरती है। इंसान जिस तरह से जीना चाहे, वह खुद जैसी भावना करता है, उसी भावना के फल स्वरूप यह जगत् है। ब्रह्मचर्य की भावना पिछले जन्म में की होगी तो इस जन्म में ब्रह्मचर्य का उदय आएगा। यह जगत् प्रोजेक्ट है।
प्रश्नकर्ता : लेकिन अभी भी मुझे यह बात समझ में नहीं आ रही है कि इंसान को ब्रह्मचर्य पालन क्यों करना चाहिए?
दादाश्री : उसे लेट गो करो आप। ब्रह्मचर्य पालन नहीं करना है। मैं कुछ ऐसे मत का नहीं हूँ। मैं तो लोगों से कहता हूँ कि शादी कर लो। कोई शादी करे तो उसमें मुझे हर्ज नहीं है।
ऐसा है, जिसे सांसारिक सुखों की ज़रूरत है, भौतिक सुखों की जिसे इच्छा है, उसे शादी करनी चाहिए। सबकुछ करना चाहिए और जिसे भौतिक सुख अच्छे ही नहीं लगते और सनातन सुख चाहिए, उसे नहीं।
प्रश्नकर्ता : 'ब्रह्मचर्य पालन करना ही नहीं है' ऐसा मेरा चैलेन्ज नहीं है, लेकिन उस बात की समझ नहीं है।
दादाश्री : ठीक है। बात सही है। आपका चैलेन्ज नहीं है, वह बात सच है, और चैलेन्ज दिया जा सके, ऐसा है भी नहीं। क्योंकि इस दुनिया में किसी ने किस तरह के भाव किए हैं, उसने क्या प्रोजेक्ट किया है, वह क्या हम बता सकते हैं? किसी ने पूरी जिंदगी भक्ति का ही प्रोजेक्ट किया होगा तो पूरी जिंदगी भक्ति ही करता रहेगा। किसी ने दान देने का ही प्रोजेक्ट किया होगा तो दान देता रहेगा। किसी ने ऑब्लाइज़िंग नेचर का किया हो तो ऑब्लाइज़ करता रहेगा। कोई विकारी नेचर का हो, वह खुद की स्त्री का सुख भोगता है लेकिन अन्य कई लड़कियों का गलत फायदा उठाता है। वे सब भले ही कैसे भी लोग हों लेकिन
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
जैसा प्रोजेक्ट किया होगा, वैसा यह फल मिला है। उसके कड़वे फल मिलते हैं। उसे भुगतने नर्कगति में जाना पड़ता है।
उसके हेतु पर आधारित है
अगर विषय विकार होगा तो कितना ही योग करने पर भी वह फलदायी नहीं होगा।
प्रश्नकर्ता : विषय जो होता है, विकार अंदर भरा होता है, छोटे से बड़े जीव तक में, हर एक का विषय पुत्रदान के लिए ही होता है न?
दादाश्री : पुत्र या पुत्री कुछ भी हो, लेकिन वह संसार बढ़ाने के लिए ही है न! वंश बढ़ाने के लिए ही है न!
प्रश्नकर्ता : विषय करता है वह इच्छा से नहीं, सिर्फ संतान प्राप्ति के लिए ही विषय होना चाहिए, वह ठीक है?
दादाश्री : ऐसा है न, पुत्र के हेतु के लिए जो अब्रह्मचर्य करता है, उसका और ब्रह्मचर्य का कोई लेना-देना नहीं है। ब्रह्मचर्य तो बहुत ऊँची चीज है। प्रजा की उत्पत्ति के लिए अब्रह्मचर्य का इस्तेमाल करने की कोई जरूरत नहीं है। प्रजा की उत्पत्ति के लिए तो ये सभी जानवर भी करते ही रहते हैं न! उसमें नया क्या है? उससे तो मौज-मस्ती के लिए इस्तेमाल करे वह अच्छा। मौज-मस्ती के लिए हो रहा है और संतानोत्पत्ति के लिए करने से तो ऐसा लगता है कि मुझे यह फल मिला है। यह तो निम्नतम कक्षा की बात है। जैसा मेरी दृष्टि में हैं, वह आपको बता रहा हूँ। बाद में आपको जो ठीक लगे, वैसा समझना।
प्रश्नकर्ता : उसमें दोष है क्या?
दादाश्री : दोष तो है ही न! वह प्रजा उत्पत्ति के लिए नहीं होना चाहिए। उससे अच्छा तो आप अगर शौक के लिए कर रहे हो तो आखिर में उसका धक्का लगेगा, तब वापस पलटेंगा
विकारों से विमुक्ति की राह (खं-1-2)
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और इसमें तो प्रजा की उत्पत्ति में नौ बच्चे हो जाए फिर भी पलटेगा ही नहीं न!
प्रश्नकर्ता : आज के विकारमय वातावरण में, घर में रहकर भी आत्मा का, भगवान का अनुभव कैसे हो सकता है?
दादाश्री : घर में रहकर मतलब घर आपत्ति उठाता है?
प्रश्नकर्ता : वातावरण विकारी है।
दादाश्री : हाँ, लेकिन कहाँ पर विकारी नहीं है? जहाँ मन है, उस जगह पर विकारी वातावरण होता ही है। आप जहाँ जाओ, वहाँ मन तो साथ में रहेगा ही न? गुफाओं में जाने से तो घर अच्छा है। वहाँ गुफाओं में नई तरह के विकार खड़े होंगे। उससे तो ये पुराने विकार अच्छे, पुराने तो बूढ़े हो चुके होते हैं। वे विकार मर जाएँगे कभी न कभी। जबकि ये नए विकार नहीं मरेंगे।
प्रश्नकर्ता : क्या घर में रहकर मन के विकार छूट सकते हैं?
दादाश्री : हाँ, सबकुछ छूट ही जाता है न! घर में रहकर तो क्या, कहीं भी रहकर छूट सकता है, यदि 'ज्ञानीपुरुष' मिल जाएँ तो। 'ज्ञानीपुरुष' के मिलने पर भी यदि विकार नहीं छूटें तो वे ज्ञानी हैं ही नहीं। आप ज्ञानी से कहना, कि 'आप कैसे मिले हमें कि हमें यह विकार उत्पन्न हुए?' लेकिन लोग विनयी हैं न, इसलिए ऐसा नहीं कहते बेचारे। अंदर-अंदर परेशान होते रहते हैं, फिर भी नहीं कहते।
नहीं समझा जगत् ने, स्वरूप वासना का
प्रश्नकर्ता : कामवासना का सुख क्षणिक है, ऐसा समझने के बावजूद भी कभी कभार उसकी प्रबल इच्छा होने का कारण क्या है? और उस पर कैसे अंकुश लगाया जा सकता है?
दादाश्री : कामवासना का स्वरूप जगत् ने जाना ही नहीं।
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
कामवासना उत्पन्न क्यों होती है, यदि यह जान ले तो उसे क्राबू में लाया जा सकता है। लेकिन वस्तुस्थिति में वह कहाँ से उत्पन्न होती है, यह जानता ही नहीं। फिर क्राबू में कैसे ले सकता है? कोई क्राबू में नहीं ले सकता। जिसका ऐसा दिखता है, कि क्राबू में कर लिया है, वह तो पूर्व की भावना का फल है, बाकी कामवासना का स्वरूप कहाँ से उत्पन्न हुआ, उस उत्पन्न दशा को समझ ले और वहीं पर ताला लगा दिया जाए तभी उसे क्राबू में ले सकते हैं। इसके सिवा भले ही वह ताला लगाए या कुछ और करे फिर भी उसका कुछ चलेगा नहीं। काम-वासना नहीं करनी हो तो हम रास्ता दिखाएँगे।
अज्ञान की गलतियों की सजा इन्द्रियों को
प्रश्नकर्ता : ये जो इन्द्रियाँ हैं, वे भोगे बिना शांत नहीं होती। तो इसके अलावा और कोई उपाय है ?
दादाश्री : ऐसा कुछ भी नहीं है। बेचारी इन्द्रियाँ तो ठेठ तक भोग भोगती ही रहती हैं। उनमें जब तक सत्व रहे, तब तक। जीभ में अगर बरकत हो न तब उस पर हम कोई भी चीज रखे कि तुरंत उसका स्वाद हमें बता देगी, और बड़ी उम्र हो जाए और जीभ में बरकत नहीं रहे तो नहीं बताती। आखों में बरकत हो तो सभी, कोई भी चीज हो उसे बता देती है। बूढ़ापे की वजह से अगर बरकत जरा कम हो गई हो, तो नहीं बता सकती। अतः उम्र होने पर बेचारी इन्द्रियाँ तो अपने आप ही फीकी पड़ जाती हैं लेकिन ये विषय फीके नहीं पड़ते। ये इन्द्रियाँ विषयी नहीं हैं।
विषय इन इन्द्रियों का दोष नहीं है। इन्द्रियों को बिना वजह सजा देते हैं लोग। इन्द्रियों को, शरीर को सजा देते हैं न, सभी? वे भैंस की भूल पर चरवाहे को मारते हैं। भूल भैंस की और मारते हैं चरवाहे को। भूखा मारते हैं, बिना वजह। उनका क्यों नाम देता है तू? सीधा रह न। तेरा टेढ़ा है अंदर, नीयत चोर
विकारों से विमुक्त की राह (खं-1-2)
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हैं, और उस पर भी ज्ञानी नहीं मिले हैं, ज्ञानी मिल जाएँ तो सीधे रास्ते पर ले जाएँगे, देर ही नहीं लगेगी।
प्रश्नकर्ता : विषयों में से निकलने के लिए ज्ञान महत्वपूर्ण चीज है।
दादाश्री : सभी विषयों से छूटने के लिए ज्ञान ही जरूरी है। अज्ञान से ही विषय चिपके हुए हैं। कितने ही ताले लगाएँ, फिर भी विषय बंध नहीं होते। इन्द्रियों को ताला लगानेवाले मैंने देखे हैं, लेकिन विषय कहीं ऐसे बंद नहीं होते।
ज्ञान से सब चला जाता है। अपने यहाँ इन सभी ब्रह्मचारियों को विचार तक नहीं आता, ज्ञान से।
विषय का शौक, बढ़ाए विषय
प्रश्नकर्ता : हमारे जो सभी शौक हैं, उन्हें पूरे करने से हमें टेम्पररी आनंद मिलता है?
दादाश्री : लेकिन अभी आइस्क्रिम हो तो अच्छा नहीं लगता पेट में? लेकिन बाद में क्या, खा लेने के बाद? फिर, लाओ जरा सुपारी! क्यों वापस? यह आइस्क्रिम है फिर भी सुपारी की जरूरत? तब कहता है, 'नहीं, वह तो मुँह साफ करना पड़ता है न!' और सुपारी खाने के बाद क्या? जैसा था वैसा ही!
प्रश्नकर्ता : साइकॉलॉजी ऐसा कहती है कि आप एक बार पेट भरकर आइस्क्रिम खा लो। फिर आपको खाने का मन ही नहीं करेगा।
दादाश्री : दुनिया में ऐसा हो ही नहीं सकता। नहीं, पेट भरकर खाने से तो खाने का मन होगा ही लेकिन जो आपको नहीं खाना हो वही खिलाते रहते हैं, डालते रहते हैं, उसके बाद जब उल्टियाँ होती हैं तब फिर बंद हो जाता है। पेट भरकर खाने से तो वापस भूख जागेगी वह तो। यह विषय तो, हमेशा ही जैसे-
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
जैसे विषय भोगता जाता है, वैसे-वैसे ज्यादा सुलगता है। विषय तो ज्यादा सुलगते जाते हैं।
जो भी सुख भोगते हैं, उसकी प्यास बढ़ती जाती है। भोगने से प्यास बढ़ती जाती है। नहीं भोगने से प्यास मिट जाती है। उसे कहते हैं तृष्णा। नहीं भोगने से थोड़े दिन परेशान रहेंगे, शायद महीने-दो महीने लेकिन अपरिचय से फिर बिल्कुल भूल ही जाएँगे। और इस बात में दम नहीं है कि भोगनेवाला इंसान, वासना निकाल सकेगा। इसलिए लोगों की, शास्त्रों की खोज है कि यह ब्रह्मचर्य का रास्ता ही उत्तम है। अतः सबसे बड़ा उपाय है अपरिचय! ताकि जब विचार आएँ, तो उन्हें तौल सके और उसके परिणामों का पता चले। परिचय से तो पता ही नहीं चलता कि क्या दोष है! और अपरिचय से विषय छूट जाता है। हिन्दुस्तान में लोग यही नहीं समझते कि ब्रह्मचर्य किसे कहते हैं। अपरिचय से विषय पूरा खत्म हो जाता है।
और एक बार उस चीज़ से दूर रहे न, बारह महीने या दो साल तक दूर रहे तो उस चीज़ को भूल ही जाता है फिर। मन का स्वभाव कैसा है? दूर रहा कि भूल जाता है। नज़दीक जाएं तो फिर कोचता रहता है! मन का परिचय छूट गया। 'हम' अलग रहे, इसलिए मन भी उस चीज़ से दूर रहा, इसलिए फिर भूल जाता है, हमेशा के लिए। उसे याद तक नहीं आती। बाद में, कहने पर भी उस तरफ नहीं जाता। ऐसा तुझे समझ में आता है? तू तेरे दोस्त से दो साल दूर रहेगा तो फिर तेरा मन भूल जाएगा। महीने-दो महीने तक किच-किच करता रहेगा, मन का स्वभाव ऐसा है और अपना ज्ञान तो मन की सुनता ही नहीं है न?
नहीं रोकना चाहिए मन को
प्रश्नकर्ता : मन को जब विषय भोगने की छूट देते हैं,
विकारों से विमुक्ति की राह (खं-1-2)
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तब वह नीरस रहता है और जब हम उसे विषय भोगने में कंट्रोल करते हैं, तब वह ज्यादा उछलता है। आकर्षण रहता है, तो उसका क्या कारण है?
दादाश्री : ऐसा है न, इसे मन का कंट्रोल नहीं कहते। जो अपने कंट्रोल को नहीं स्वीकारे, वह कंट्रोल है ही नहीं। कंट्रोलर होना चाहिए न! खुद यदि कंट्रोलर होगा तो कंट्रोल को स्वीकार करेगा। खुद कंट्रोलर है ही नहीं, मन नहीं मानता, मन आपकी सुनता नहीं है न?
मन को रोकना नहीं है। मन के कॉंजेज़ को रोकना है। मन तो खुद एक परिणाम है। वह परिणाम बताए बगैर नहीं रहेगा। वह परीक्षा का रिज़ल्ट है। परिणाम नहीं बदलता, परीक्षा बदलनी है। जिससे वह परिणाम उत्पन्न होता है, उन कारणों को बंद करना है। तो वह पकड़ में कैसे आएगा? किस वजह से उत्पन्न हुआ है मन? तब कहते हैं, विषय में चिपका हुआ है। 'कहाँ चिपका है' यह दृढ़ निकालना चाहिए और फिर वहाँ पर काटना है।
प्रश्नकर्ता : उन विषयों में जाने से मन को कैसे रोकें?
दादाश्री : विषयों में जाने से रोकना नहीं है। जिन विषयों को मन खड़ा करता है, वही मन फिर पकड़ पकड़ता है। उन विषयों को हमें जहाँ तहाँ धीरे धीरे कम करना चाहिए। यानी उसके कॉंजेज़ बंद करने चाहिए।
हम पड़ोसी से कहें कि 'भाई, आप हमारे साथ झगड़ा मत करना। हमारे साथ तकरार मत करना।' फिर भी तकरार होती रहती हो तो हम नहीं समझ जाएँगे कि गलती कुछ और ही है। समझ जाएँगे या नहीं? तब पूछते हैं, 'कौन सी गलती?' तब कहता है, 'यह झगड़ा नहीं हो ऐसे कारण खड़े करो।' यानी वह झगड़ा तो होगा ही कुछ दिनों तक, लेकिन झगड़ा नहीं होने के कारणों का जब सेवन होगा, तब फिर वैसे परिणाम आएँगे। झगड़े के कारणों
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
का सेवन करें और झगड़ा बंद कर सकें, क्या ऐसा हो सकता है?
प्रश्नकर्ता : नहीं हो सकता।
दादाश्री : अतः उसके कारण बंद करने पड़ेंगे। मैंने कहा है न, कि मन-वचन-काया इफेक्टिव चीजें हैं। उनके कॉंजेज बंद करो!
प्रश्नकर्ता : कारण बंद करना यानी? ऐसा नहीं हो, ऐसे भाव करना, यही न?
दादाश्री : हमें कारण बंद करना है, यानी कल अगर पुलिसवाले ने अपना नाम लिख लिया हो, बगैर लाइटवाली साइकल पर जा रहे हों और नाम लिख ले तो दूसरे दिन हम कॉंजेज बंद कर लेंगे या नहीं? कि भई आज तो लाइट डालो। तो क्या फिर वह नाम लिखेगा? वह कारण बंद हो गया न? उसी तरह ये कॉंजेज बंद करने हैं। सबकुछ सीखा जा सकता है। सिर्फ 'चाय' की आदत पड़ गई है, झंझट इतनी ही है।
लाओ, जरा 'चाय' पी लेते हैं। अंदर अकुलाएगा, उस समय चाय पीने की जरूरत नहीं है। सोचने की जरूरत है। जबकि वहाँ पर चाय पी लेता है। जहाँ सोचने का स्कोप मिले दिमाग उलझ जाए तब कहेगा, 'चाय पीनी चाहिए'। अरे, अभी तो सोचने की जरूरत है। चाय अभी रहने दे, सुबह पीना। कॉंजेज बंद करेंगे तो हो सकेगा या नहीं?
प्रश्नकर्ता : समझ में आया।
दादाश्री : एक बार किसी के साथ हमने अविनय किया हो, कि दूर हट यहाँ से, और वह गाली दे दे तो दूसरी बार हम ऐसा नहीं करेंगे न?
प्रश्नकर्ता : नहीं।
विकारों से विमुक्त की राह (खं-1-2)
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दादाश्री : वह तो बंद नहीं होगा। आप यह रास्ता बदल लो। वह कहलाता है ज्ञान। उसे बंद करने का प्रयत्न करना, वही भ्रांति कहलाती है। भ्रांति हमेशा इफेक्ट को ही तोड़ने जाती है, जबकि ज्ञान कॉन्जेज को बंद करने जाता है।
वासना, वस्तु नहीं, लेकिन रस
प्रश्नकर्ता : मनुष्य की वासनाओं का मोक्ष कब होगा?
दादाश्री : वासनाओं का तो हो ही जाएगा। वासनाएँ तो आप ने खड़ी की हैं, आप ही उसके जन्मदाता हो और विलय करनेवाले भी आप ही हो।
आपकी वासना अलग और इस भाई की वासना अलग। हर एक की अलग-अलग वासनाएँ हैं न? और वासना तो साइंटिफिक सरकारमस्टेशियल एविडेन्स है। अभी अगर कोई मांसाहारी व्यक्ति मित्र बन जाए न, तो फिर मांस खाना भी सीख जाएगा। अब यह वासना कहाँ से लाए थे? तब कहते हैं, साइंटिफिक सरकारमस्टेशियल एविडेन्स इकट्टा होते हैं और वह नया नहीं है, यह गप्प नहीं है, और फिर पहले के कॉन्जेज के हिसाब से हैं, यह सब। इसलिए खाना सीख जाता है। दूसरा, संजोगो की वजह से वासनाएँ खड़ी होती है। बाकी एक लड़का है कि जो ऐसी जगह पर बड़ा होता है कि जहाँ कोई भी इंसान दिखे तक नहीं तो फिर वह विषय को नहीं समझ सकेगा। खाना-पीना समझ सकेगा। लेकिन वहाँ पर कोई जानवर भी नहीं होना चाहिए। उसे नजर नहीं आना चाहिए। तो उसे कोई वासना नहीं होगी। यह तो सब वासनाओं का संग्रहस्थान है और वहाँ पर जन्म होता है तो फिर क्या होगा उस संग्रहस्थान में से! वह नजर आया कि तभी से वासना खड़ी हो जाती है, और यह भी आश्चर्य है कि जब ज्ञान प्राप्त होता है, तब वासनाएँ कहाँ से कहाँ गायब हो जाती है, वही समझ में नहीं आता।
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)
प्रश्नकर्ता : अंदर का रस(रुचि) सूख जाता है।
दादाश्री : हाँ। वस्तु को वासना नहीं कहते, रस को वासना कहते हैं। यदि रस नहीं होगा तो वह वासना मानी ही नहीं जाएगी। यानि कि वासना कहाँ से कहाँ गायब हो जाती है। अब वह भी एक ही घंटे के प्रयोग से, ज्यादा प्रयोग नहीं, इस ज्ञान के बाद वासना चली जाती है न! रस चला जाता है न? बाकी सब स्थूल है।
ज्ञानी ही छुड़वाते हैं, वासना आसानी से
प्रश्नकर्ता : वासना छोड़ने का सबसे आसान रास्ता कौन सा?
दादाश्री : मेरे पास आना, वही उपाय है। और कौन सा उपाय? आप खुद वासना छोड़ने जाओगे तो दूसरी घुस जाएगी। क्योंकि खाली अवकाश रहता ही नहीं। आप वासना छोड़ते हो तो वहाँ अवकाश हो जाता है और वहाँ फिर दूसरी वासना घुस जाएगी।
प्रश्नकर्ता : इस वासना के बदले और कोई अच्छी वासना आ जाए तो क्या वह अच्छी चीज़ नहीं कहलाएगी?
दादाश्री : वासना चेन्ज हो सकती है। खराब वासना के बदले अच्छी वासना भीतर घुस सकती है, लेकिन अच्छी वासना भीतर घुस जाए तो वापस खराब तैयार कर रही होती है। यदि हमेशा के लिए अच्छी वासना रह सके, ऐसा हो तो यह जगत् बहुत अच्छा है लेकिन वैसा रह नहीं सकता। इसलिए इससे छुटकारा पाना अच्छा है। वासना को कन्वर्ट करें, और अच्छी वासना इकट्ठी करें, ऐसा हो ही नहीं सकता। यह पॉसिबल है ही नहीं। बिल्कुल शुभ वासनावाला इंसान मिलना ही मुश्किल है!
प्रश्नकर्ता : यानी सामान्य रूप से पुरुष को स्त्री के प्रति जो झुकाव रहता है, उससे कैसे मुक्ति पा सकते हैं?
विकारों से विमुक्ति की राह (खं-1-2)
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दादाश्री : ऐसा है न, जब तक खुद पुरुष है, तब तक स्त्री के प्रति झुकाव रहेगा ही, जब तक जवानी है, तब तक। अब अस्सी साल के बूढ़े को नहीं होगा! दुकान का दिवाला निकल जाने के बाद क्या होगा? दिवालिया दुकान में कुछ माल होगा क्या? बच्चों को नौ साल तक नहीं होता। यह बीचवाली दुकान जरा जबरदस्त चलती है, जोरदार। तभी यह सब होता है। जब तक पुरुष हैं, तब तक यह वासना रहेगी और स्त्रियाँ हैं, तब तक वासना रहेगी लेकिन अगर पुरुष ही खत्म हो जाएँ तो?
प्रश्नकर्ता : उसे कैसे मिटा सकते हैं?
दादाश्री : जो वासनावाला है, वह चंद्रेश है और आप तो 'माइ नेम इज चंद्रेश' कहते हो। इसलिए आप अलग हो इससे। इस बात पर भरोसा है? तो वह आप कौन हो? इतना ही आपको मैं रियलाइज करवा देता हूँ तो आपकी वासना छूट जाएगी।
अब ये वासनाएँ क्या हैं? 'मैं चंद्रेश हूँ' यह मिटेगा, तभी वासनाएँ जाएँगी, वनाँ वासनाएँ नहीं जाएँगी। मैं तो क्या कहता हूँ कि 'आत्मा क्या है' वह जानो, 'अनात्मा क्या है' वह जानो। इतना जानते ही वासनाएँ गायब हो जाएँगी।
जितना डेवेलपमेन्ट ऊँचा, उतनी मूर्च्छा कम। इसमें क्या भोगना है? सबकुछ भोगकर ही आएँ हैं। जिसने कम भोगा है, उसे मूर्च्छा ज्यादा है।
विषय और कषाय की भेदरेखा
प्रश्नकर्ता : आप ने ये क्रोध-मान-माया-लोभ बताए हैं न, तो यह विषय किस में आता है? 'काम' किस में आता है?
दादाश्री : विषय अलग है और ये कषाय अलग हैं। विषयों की यदि हम हद पार करें, हद से ज्यादा माँगे तो वह लोभ है।
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
प्रश्नकर्ता : स्त्री-पुरुष के विषय के बारे में प्रश्न है।
दादाश्री : हाँ, वही न! विषय के अतिरेक को लोभ कहा है।
प्रश्नकर्ता : कोई इंसान विषय भूखा होता है, वह क्या 'व्यवस्थित' के हिसाब से होता है?
दादाश्री : नहीं। ऐसा है न, कि यह बड़ी कड़ाही हो, और उसमें कढ़ी बनाई हो, उसमें हींग का बघार लगाया। अब छः महीने बाद उस कड़ाही को फिर से मांजकर उसमें खीर बनाओ, फिर भी अंदर हींग की गंध आएगी। क्यों? क्योंकि हींग का स्पर्श हो गया है। उसी तरह विषय का स्पर्श अंदर पड़ा है।
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[ ३ ]
माहात्म्य ब्रह्मचर्य का
विषय की कीमत कितनी ?
प्रश्नकर्ता : अगर विषय में से विरक्त होने की तीव्र भावना हो, तो फिर क्या उसमें से धीरे-धीरे निकला जा सकता है ?
दादाश्री : हाँ। वह जो तमना है, वही इसमें से छुड़वाती है। लेकिन विषय की कीमत समझ लेनी चाहिए कि इसकी कीमत कितनी है ? बिगड़ी हुई दाल की कीमत है, बिगड़ी हुई कढ़ी की कीमत है, लेकिन विषय की कीमत नहीं है लेकिन यह बात पूरे जगत् को समझ में नहीं आती न !
प्रश्नकर्ता : यानी वह तो शून्य हुआ न ?
दादाश्री : शून्य तो अच्छा है, लेकिन यह तो निरा माइनस ही है।
इंसान को बैक(पीछे का) देखने की शक्ति ही नहीं है न ! इसलिए विषय चलता रहा है। देखो न, ऊपर से रौब से चलते भी हैं न ? इसलिए अगर ज्ञानीपुरुष से बात को समझ ले तो विषय जाएगा और मुक्ति होगी। विषय की वजह से ही तो यह सब(मोक्ष) रुका हुआ है।
विषय से जर्जरित हुए जीवन
प्रश्नकर्ता : जो बालब्रह्मचारी होते हैं, वह अधिक उत्तम
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
कहलाता है या शादी के बाद ब्रह्मचर्य पालन करना, वह उत्तम कहलाएगा?
दादाश्री : बालब्रह्मचारी की बात ही अलग है न! लेकिन आजकल के बालब्रह्मचारी कैसे हैं? यह जमाना खराब है। अभी तक का जो हुआ है, अगर उनका वह जीवन आप पढ़ो तो पढ़ते ही आपका सिर चकरा जाएगा।
प्रश्नकर्ता : हम खुद का ही जीवन देखें तो सिर चकरा जाए, तो भला उनके जीवन की क्या बात करें?
दादाश्री : फिर भी अगर अभी भी वे पालन करेंगे, अगर अभी भी बाड़ बॉथेंगे तो इसका कुछ इलाज हो सकेगा। ज्ञानीपुरुष की छत्रछाया तो कभी होती ही नहीं, और दिन बदलते नहीं। ज्ञानीपुरुष हों, तब इसका पालन हो सकता है, वरना कैसे पालन कर सकेंगे? ज्ञानीपुरुष की कृपा चाहिए। चारों ओर से जब उलझ जाए, तब मार्गदर्शन बतानेवाला चाहिए। इसमें से किस तरह छूटा जाए? इसकी सभी चाबियाँ ज्ञानीपुरुष को पता होती हैं।
ब्रह्मचर्य पालन करने की सीढ़ियाँ
प्रश्नकर्ता : स्वभाव की वजह से, प्राकृतिक गुणधर्म की वजह से अन्य कहीं दृष्टि बिगड़ जाए उस चीज़ को कैसे खत्म कर सकते हैं?
दादाश्री : हमारे पास उसे मिटाने की सभी दवाईयाँ हैं। इस वर्ल्ड में ऐसी कोई दवाई नहीं है कि जो हमारे पास नहीं हो। इन लड़कों को हमने ब्रह्मचर्यव्रत दिया है। अब ब्रह्मचर्यव्रत लेने के बावजूद भी यदि कोई स्त्री उसके सामने आ जाए और उसकी दृष्टि आकृष्ट हो जाए, और उसका मन भी बिगड़ जाए, तो इसे मैं दोष नहीं कहता लेकिन अगर ऐसा हो जाए तो उसे फिर तुरंत मिटा देना है। क्योंकि हमने साबुन दिया है। मैं रास्ते
माहात्म्य ब्रह्मचर्य का (खं-1-3)
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पर से गुजर रहा होऊँ और मेरे कपड़े पर दाग लग जाए अगर मुझे उसे तुरंत धोना आता हो, तो फिर मैं आपके यहाँ साफ-सुथरा होकर आऊँगा या नहीं?
प्रश्नकर्ता : हाँ, आ सकते हैं।
दादाश्री : उसी तरह इन्हें सभी साधन दिए हुए हैं। वर्ना मन-वचन-काया से ब्रह्मचर्यव्रत का पालन कैसे किया जा सकेगा? और वह भी ऐसे अंतरदाहवाले काल में!
यदि आपको ब्रह्मचर्य पालन करना हो तो आपको उपाय बताता हूँ। वह उपाय आपको करना पड़ेगा, नहीं तो फिर आपको ब्रह्मचर्य पालन करना ही चाहिए, यह ऐसी कोई अनिवार्य चीज़ नहीं है। वह तो जिसे अंदर कर्म का उदय होता है, तभी हो सकता है। शादी करने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन इन लोगों को शादी में सुख दिखता ही नहीं है। उन्हें पुसाता ही नहीं है। जब वे मना करते हैं, तब हम ब्रह्मचर्यव्रत देते हैं, वर्ना मैं किसी को ऐसा ब्रह्मचर्यव्रत लेने के लिए नहीं कहता। क्योंकि व्रत लेना, व्रत का पालन करना, वह कोई ऐसी वैसी बात नहीं है। ब्रह्मचर्यव्रत लेना, वह तो अगर उसका पूर्वकर्म का उदय होगा तो संभाल सकता है। पूर्व में भावना की होगी तो संभाल सकता है, या फिर अगर आप संभालने का निश्चय करोगे तो संभाल सकोगे। हम क्या कहते हैं कि आपका निश्चय होना चाहिए और हमारा वचनबल साथ में हैं, तो यह संभाला जा सके, ऐसा है।
व्रत के परिणाम
प्रश्नकर्ता : वह तो उसकी भूमिका के अनुसार होगा न? सभी चीज़ें मनोबल पर आधारित नहीं हो सकतीं। उसकी आध्यात्मिक स्टेज की भूमिका होनी चाहिए, तभी यह चीज़ संभव है न?
दादाश्री : वह संभव हो या न हो, लेकिन अभी संभव हो गया है। कितने ही स्त्री-पुरुष हमारे पास हमेशा के लिए
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
ब्रह्मचर्यव्रत लेते हैं। इन भाई ने और इनकी वाइफ ने छोटी उम्र से ब्रह्मचर्य व्रत लिया है। मुंबई में ऐसा कई लोगों ने लिया है। क्योंकि अंदर गजब का सुख बर्तता है। इतना सुख बर्तता है कि विषय उन्हें याद ही नहीं आता।
प्रश्नकर्ता : देह के साथ जो कर्म चार्ज होकर आए हुए हैं, वे बदल तो नहीं सकते न?
दादाश्री : नहीं, कुछ भी नहीं बदल सकता। फिर भी विषय ऐसी चीज है न, कि ज्ञानीपुरुष की आज्ञा से सिर्फ इतना ही बदल सकता है। फिर भी यह व्रत सभी को नहीं दे सकते। हमने कुछ ही लोगों को यह दिया है। ज्ञानी की आज्ञा से सबकुछ बदल सकता है। सामनेवाले को सिर्फ निश्चय ही करना है कि कुछ भी हो जाए, लेकिन मुझे यह चाहिए ही नहीं। तो फिर हम उसे आज्ञा दे देते हैं और हमारा वचनबल काम करता है। इसलिए फिर उसका चित्त और कहीं नहीं जाता।
ब्रह्मचर्य का यदि कोई पालन करे न, यदि ठेठ तक पार निकल गया न, तो ब्रह्मचर्य तो बहुत बड़ी चीज है। यह 'दादाई ज्ञान', 'अक्रम विज्ञान' और साथ-साथ ब्रह्मचर्य वगैरह हो तो फिर उन्हें क्या चाहिए? एक तो यह 'अक्रम विज्ञान' ही ऐसा है कि यदि वह अनुभव कभी विशेष परिणाम पा गया तो वह राजाओं का राजा है। पूरी दुनिया के राजाओं को भी वहाँ नमस्कार करना पड़ेगा!
प्रश्नकर्ता: अभी तो पड़ोसी भी नमस्कार नहीं करता!
दादाश्री : पड़ोसी कैसे करेगा? जब तक अभी भी पराप खेत में घुस जाता है, तब तक ऐसा कैसे हो पाएगा?
आज्ञासहित व्रत ही सही
प्रश्नकर्ता : कोई विधवा हो, या विधुर हो, वे ब्रह्मचर्यव्रत
माहात्म्य ब्रह्मचर्य का (खं-1-3)
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पालन करते हैं, इसके बजाय आपका दिया हुआ ब्रह्मचर्यव्रत पालन करे तो बहुत फर्क पड़ेगा न?
दादाश्री : वह ब्रह्मचर्यव्रत कहलाता ही नहीं है न! जहाँ मन से ब्रह्मचर्य नहीं है, वह ब्रह्मचर्य नहीं कहलाता और बिना ज्ञान के किस ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे? खुद को ज्ञान नहीं है। यह तो ‘मैं कौन हूँ’ इसी का ठिकाना नहीं है न?
प्रश्नकर्ता : मेडिटेशनवाले में ऐसा कहते हैं कि आप ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करो।
दादाश्री : हाँ, लेकिन इतना कुछ आसान नहीं है। उसे कहना, ‘तू ही पालन कर न, मुझे क्यों कह रहा है?’ यों तो सभी से कहेंगे लेकिन खुद तो पोल मारते हैं। ब्रह्मचर्य पालन तो कौन कर सकता है? जो ज्ञानीपुरुष की छत्रछाया में हों, वे सभी ब्रह्मचर्य का पालन कर सकते हैं। अतः यदि ब्रह्मचर्य का यों ही पालन करने गया और यदि सँभालना नहीं आया तो इंसान मैड हो जाएगा। हमारी यह खोज बहुत सुंदर है, पूरा विज्ञान बहुत सुंदर है और पूरा वर्ल्ड एक्सेप्ट करे, ऐसा है। इन साइन्टिस्ट वगैरह को भी यह एक्सेप्ट करना पड़ेगा।
ब्रह्मचर्य तो कैसा होना चाहिए?
यह ‘अक्रम विज्ञान’ है। यह तो बहुत ग़ज़ब का विज्ञान है। जगत् जब इसे समझेगा तब नाच उठेगा।
आपको स्त्री पर वैराग आ गया या नहीं? कितनी देर में? अभी पंद्रह मिनिट में ही? तो फिर ज्ञानियों की चाबियों से कैसा वैराग आ जाता है! और यों पहरा लगाएँ तो कब अंत आएगा? यहाँ से पहरा लगाएँ तो उस ओर से घुस जाएगा। हम किसी पर भी पहरा लगाते ही नहीं न! हम कहाँ पहरा लगाएँ? जिसे इस गंदगी में डूबना ही है, उसे फिर हम छोड़ देते हैं!
यहाँ पर ये लड़के जो ब्रह्मचर्य पालन करते हैं, वह तो सहज
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
स्वभाव से रहता है, एक क्षण भी चूके बिना, निरंतर रहता है।
सातवीं नर्क का तो सिर्फ वर्णन तक किया जाए तो इंसान सुनते ही मर जाए। तो बोलो, वहाँ कितना भोगवटा (सुख या दुःख का असर) रहता होगा? कि फिर से संसार भोगने से तो बिल्कुल इन्कार! सिर्फ विषय की वजह से यह संसार खड़ा है। अगर यह स्त्री विषय नहीं होता न, तो बाकी सभी विषय तो कभी भी बाधा नहीं डालते। सिर्फ इस विषय का अभाव रहे तो भी देवगति मिल जाए। इस विषय का अभाव हुआ कि बाकी सभी विषय ऋषू में आ जाते हैं और इस विषय में पड़ा कि विषय से पहले जानवर गति में जाता है और यदि उससे अधिक विषयी हो तो नर्कगति में जाता है। विषय से बस अधोगति ही है। क्योंकि एक बार के विषय में तो कई करोड़ जीव मर जाते हैं! समझ नहीं है फिर भी जोखिमदारी मोल लेते हैं न! अतः जहाँ हिंसा है, वहाँ धर्म जैसा कुछ है ही नहीं।
प्रश्नकर्ता : समझते हैं फिर भी जगत् के विषयों में मन आकर्षित रहता है, समझते हैं कि सही-गलत क्या है, फिर भी विषयों से मुक्त नहीं हो पाते। तो इसका क्या उपाय?
दादाश्री : जो समझ क्रियाकारी हो वही सही समझ कहलाती है। बाकी सब बंजर समझ कहलाती है। अगर दो शीशियाँ हों और एक शीशे में विटामिन का पाउडर हो व दूसरी शीशे में पोइजन हो, दोनों में सफेद पाउडर हो और हम बच्चे को समझाएँ कि यह विटामिन है, यह लेना और इस दूसरी शीशे में से मत लेना। दूसरी शीशे में से लेगा तो मर जाएगा। उस बच्चे ने 'मर जाएगा' शब्द सुना इसका मतलब यह नहीं कि वह समझ गया। कहेगा जरूर कि यह दवाई लेने से मर जाते हैं, लेकिन मर जाना यानी क्या, उस बात को नहीं समझता। हमें उसे बताना पड़ता है, कि फलाने चाचा उस दिन मर गए थे न? फिर सभी ने उन्हें वहाँ जला दिया था, इस दवाई से वैसा ही हो जाता है।
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जब एक्जेक्टली ऐसा समझ में आ जाता है तब वह समझ ही क्रियाकारी हो जाती है। फिर वह पोइजन को छूएगा ही नहीं। अभी उसे इस समझ की एक्जेक्टनेस नहीं आई है। लोगों द्वारा सिखाई गई यह समझ तो लोन की तरह है।
प्रश्नकर्ता : वह समझ क्रियाकारी हो, उसके लिए क्या प्रयत्न करने चाहिए?
दादाश्री : मैं आपको विस्तार से समझाता हूँ। फिर वह समझ ही क्रियाकारी हो जाएगी। आपको कुछ भी नहीं करना है। बल्कि आप देखल करने जाओगे तो बिगड़ जाएगा। जो ज्ञान, जो समझ क्रियाकारी हो, वही सही समझ है और वही सही ज्ञान है।
मेरी बात आप पर थोपनी नहीं है। खुद आपको आपकी समझ में आना चाहिए। मेरी समझ मेरे पास और वह समझ आप पर थोप नहीं सकते और थोपने से तो कुछ काम होगा ही नहीं। आपमें वह समझ फिट हो जाए और आप अपनी समझ से चलो।
इस दुनिया में अगर किसी चीज की निंदा करने जैसी हो तो वह है अब्रह्मचर्य। अन्य सभी चीजें इतनी निंदा करने जैसी नहीं हैं।
ब्रह्मचर्य का पालन नहीं हो सके तो, वह अलग बात है, लेकिन ब्रह्मचर्य के विरोधी तो होना ही नहीं चाहिए। ब्रह्मचर्य तो सबसे बड़ा साधन है। अपना ब्रह्मचर्य, वह पवित्र चीज होनी चाहिए। ब्रह्मचर्य, वह मानसिक चीज नहीं है, इस अब्रह्मचर्य का बीड़ी के व्यसन जैसा नहीं है। विषय से संबंधित नासमझी की वजह से ब्रह्मचर्य नहीं टिक पाता। ब्रह्मचर्य के बारे में ज्ञानीपुरुष से यदि समझ ले तो ब्रह्मचर्य बहुत अच्छी तरह टिक सकेगा। समझने की ही जरूरत है इसमें। यह व्यसन अलग चीज है और अब्रह्मचर्य वह अलग चीज है। यह तो अनादि से लोक प्रवाह ऐसा ही चलता आ रहा है और उससे लौकिक ज्ञान खड़ा हो गया है